झालावाड़ के कृषि अनुसंधान उप केंद्र खानपुर में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम “राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी मैदानी क्षेत्र में पोषण सुरक्षा के लिए दलहनी फसलों में जिंक और आयरन का शस्य संवर्धन” परियोजना का हिस्सा था। इस प्रशिक्षण का मुख्य विषय “खरीफ दलहनी फसलों में जिंक एवं आयरन की शस्य संवर्धन तकनीक एवं पोषण सुरक्षा” रहा। इसमें कुल 25 किसानों ने भाग लिया। कृषि विश्वविद्यालय कोटा के निदेशक अनुसंधान डॉ. एमसी जैन ने किसानों को संबोधित करते हुए जैव उर्वरकों के उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि जैव उर्वरकों के माध्यम से कृषि लागत कम की जा सकती है, जिससे उत्पादन और किसानों की आय में वृद्धि होगी। डॉ. जैन ने किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने के लिए भी प्रेरित किया। कृषि अनुसंधान उप केंद्र खानपुर के प्रभारी अधिकारी एवं परियोजना प्रभारी डॉ. शंकरलाल यादव ने सस्य संवर्धन के महत्व और दलहनी फसलों में आयरन (Fe) और जिंक (Zn) के संवर्धन की तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी। कीट वैज्ञानिक डॉ. कैलाश चंद्र अहीर ने दलहनी फसलों में कीट प्रबंधन की गैर-रासायनिक विधियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों को अग्निअस्त्र, ट्राइकोडर्मा और ट्राइकोग्रामा जैसे जैविक विकल्पों का उपयोग करने की सलाह दी। शस्य वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र गोचर ने दलहनी फसलों में अधिक पैदावार और बेहतर गुणवत्ता के लिए जिंक एवं आयरन की भूमिका समझाई। मृदा वैज्ञानिक डॉ. प्रवीण सिंह ने फसलों में जिंक और आयरन की मात्रा बढ़ाने के लिए जैविक उत्पादों के प्रयोग पर जोर दिया। सह आचार्य डॉ. एचपी मेघवाल ने खरीफ दलहनी फसलों की उत्पादन लागत कम करने के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन की जानकारी दी। कपिल कुमार नागर ने किसानों को जिंक एवं आयरन से समृद्ध जैव संवर्धित दलहनी किस्मों के उपयोग के बारे में बताया। कार्यक्रम के अंत में प्रभारी अधिकारी डॉ. शंकरलाल यादव ने किसानों से वैज्ञानिकों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखने और कृषि अनुसंधान उप केंद्र से जुड़े रहने का आग्रह किया। उन्होंने प्रशिक्षण में उपस्थित सभी किसानों एवं वैज्ञानिकों का आभार व्यक्त किया।