91 करोड़ रुपए की लागत से बना 240 बेड का नया जिला अस्पताल करीब एक साल से तैयार खड़ा है, लेकिन मरीज आज भी वर्ष 1964 में बने 62 साल पुराने जर्जर आईपीडी भवन में इलाज कराने को मजबूर हैं। मानसून के बीच पुराने भवन की छतों से पानी टपक रहा है, दीवारों में सीलन और प्लास्टर उखड़ने जैसी समस्याएं फिर सामने आ गई हैं। दूसरी ओर, नए भवन में बिजली कनेक्शन जारी होने से मरीजों के पहुंचने से पहले ही सरकार बिजली बिल का भुगतान कर रही है। मानसून में बढ़ी मरीजों की परेशानी मानसून की शुरुआत के साथ पुराने आईपीडी भवन की हालत और खराब हो गई है। छतों से पानी टपकने, वार्डों में सीलन और जगह-जगह प्लास्टर उखड़ने के कारण मरीजों और उनके परिजनों को परेशानी उठानी पड़ रही है। इसी भवन में फिलहाल ऑर्थोपेडिक, सर्जिकल, आईसीयू, डायलिसिस, इमरजेंसी तथा मेल-फीमेल मेडिकल वार्ड संचालित हो रहे हैं। निरीक्षण के बाद भी दूर नहीं हुई कमियां जिला कलेक्टर बालमुकुंद असावा, एडीएम और मेडिकल कॉलेज प्रशासन कई बार नए अस्पताल भवन का निरीक्षण कर चुके हैं। करीब एक माह पहले हुए निरीक्षण में कूलिंग सिस्टम, एसटीपी प्लांट, ऑपरेशन थिएटर में स्लैब, रेलिंग पर सुरक्षा जाली और रैंप समेत कई कमियां चिन्हित की गई थीं। अधिकारियों के निर्देशों के बावजूद अब तक इन्हें दूर नहीं किया जा सका, जिससे शिफ्टिंग फिर टल गई। एजेंसी और मेडिकल कॉलेज के अलग-अलग दावे शिफ्टिंग में देरी की बड़ी वजह निर्माण एजेंसी और मेडिकल कॉलेज प्रशासन के बीच मतभेद भी है। मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. सी.पी. मीणा का कहना है कि कूलिंग सिस्टम और ऑपरेशन थिएटर सहित कुछ जरूरी कार्य बाकी हैं, जिनकी जानकारी आरएसआरडीसी को दे दी गई है। वहीं प्रोजेक्ट निदेशक अनुज मीणा का दावा है कि विभाग ने डीपीआर के अनुसार सभी कार्य पूरे कर दिए हैं। मेडिकल कॉलेज जिन सुविधाओं की मांग कर रहा है, वे मूल डीपीआर का हिस्सा नहीं थीं। उनके लिए पूरक प्रस्ताव मुख्यालय भेजा गया है और स्वीकृति मिलने के बाद टेंडर प्रक्रिया होगी। पुराने भवन को पीडब्ल्यूडी भी मान चुका है अनुपयोगी लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) इस भवन को मरम्मत योग्य नहीं मान चुका है। विभाग की योजना इसे ध्वस्त कर करीब 52 करोड़ रुपए की लागत से नया अस्पताल ब्लॉक बनाने की है। इसके बावजूद मरीजों का इलाज फिलहाल इसी जर्जर भवन में जारी है। खाली अस्पताल, फिर भी शुरू हो चुका सरकारी खर्च नए अस्पताल भवन का बिजली कनेक्शन जारी हो चुका है। भवन में अभी मरीजों की शिफ्टिंग नहीं हुई है, लेकिन अस्पताल प्रबंधन को नियमित रूप से बिजली बिल का भुगतान करना पड़ रहा है। यानी अस्पताल शुरू होने से पहले ही सरकारी खर्च शुरू हो चुका है।
