बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (BITS) पिलानी के रिसर्चर्स ने कंप्यूटर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल की है। संस्थान की टीम को स्टैटिक रैंडम-एक्सेस मेमोरी (SRAM) मैक्रो डिवाइस पर पेटेंट मिला है। यह नई टेक्नोलॉजी डुअल-पोर्ट इन-मेमोरी कंप्यूटिंग टेक्नोलॉजी पर तैयार है, जिससे भविष्य में तेज स्पीड, बेहतर परफॉर्मेंस और कम बिजली खर्च करने वाले कंप्यूटर सिस्टम्स के लिए काफी अहम साबित हो सकती है। एक साथ डेटा स्टोर और प्रोसेस करने की सुविधा इस टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें डेटा को स्टोर करने और प्रोसेस करने का काम पहले से कहीं ज्यादा तेज़ी से किया जा सकता है। इसमें मेमोरी तक पहुंचने के लिए दो अलग-अलग एक्सेस पाथ दिए गए हैं। इसकी वजह से एक ही समय में डेटा को पढ़ सकता है, लिख सकता है और जटिल जोड़-घटाना लगा सकता है। इससे पूरे सिस्टम की स्पीड और काम करने की क्षमता बढ़ जाती है। डेटा कम ट्रांसफर होगा, बिजली की भी होगी बचत आमतौर पर कंप्यूटर में डेटा को मेमोरी से प्रोसेसर तक बार-बार भेजना पड़ता है। इस प्रक्रिया में समय भी ज्यादा लगता है और बिजली की खपत भी बढ़ती है। लेकिन इस नई टेक्नोलॉजी में डेटा की प्रोसेसिंग मेमोरी के अंदर या उसके बिल्कुल पास ही हो जाती है। इससे डेटा ट्रांसफर कम होता है, सिस्टम तेज़ चलता है और कम बिजली में ज्यादा काम कर पाता है। साथ ही हार्डवेयर का भी बेहतर इस्तेमाल होता है। AI और हाई-स्पीड कंप्यूटिंग में होगा बड़ा इस्तेमाल यह टेक्नोलॉजी उन कंप्यूटर सिस्टम्स के लिए खास तौर पर उपयोगी मानी जा रही है, जहां कम बिजली खर्च करते हुए हाई परफॉर्मेंस की जरूरत होती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग, डेटा प्रोसेसिंग और हाई-स्पीड कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल भविष्य में काफी फायदेमंद हो सकता है। खासकर उन सिस्टम्स में, जहां मेमोरी की स्पीड और डेटा ट्रांसफर सबसे बड़ी चुनौती होती है। चार रिसर्चर्स की टीम ने किया यह इनोवेशन इस इनोवेशन के पीछे BITS पिलानी के चार रिसर्चर्स की टीम का योगदान है। इसमें डॉ. नितिन चतुर्वेदी, डॉ. कनिका मोंगा, प्रो. एस. गुरुनारायणन और डॉ. मीथा शेनॉय शामिल हैं। सभी के संयुक्त प्रयास से विकसित इस टेक्नोलॉजी को अब पेटेंट मिलने के बाद कंप्यूटर और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इस उपलब्धि के पीछे BITS पिलानी के शोधकर्ताओं की एक टीम है। इसमें डॉ. नितिन चतुर्वेदी, डॉ. कनिका मोंगा, प्रो. एस. गुरुनारायणन और डॉ. मीथा शेनॉय शामिल हैं। उनके संयुक्त प्रयासों से यह नवाचार संभव हो पाया है।
