6 जनवरी 2007 की उस खूनी शाम के बाद पूरे इलाके में सिर्फ एक सवाल गूंज रहा था- आखिर गिरिराज जोशी को किसने मरवाया? शहर के चर्चित अधिवक्ता की दिनदहाड़े ऑफिस में घुसकर हत्या हुई थी। पुलिस के सामने गवाह थे, शक था, जमीन विवाद की कहानियां थीं, लेकिन कोई ऐसा सबूत नहीं था जो सीधे किसी एक चेहरे की तरफ इशारा कर सके। उधर, शहर में अफवाहों का बाजार गर्म था। कोई इसे धार्मिक विवाद बता रहा था, कोई करोड़ों की जमीन का खेल, तो कोई कह रहा था कि गिरिराज जोशी ने कुछ ऐसा जान लिया था, जिसके बाद उनका जिंदा रहना कुछ लोगों के लिए खतरा बन गया था। लेकिन असली कहानी इससे कहीं ज्यादा खतरनाक थी…क्योंकि हत्या की साजिश गुस्से में नहीं, बल्कि बेहद ठंडे दिमाग से बैठकर रची गई थी। जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, पुलिस बार-बार एक ही जमीन तक पहुंच रही थी- धार्मिक स्थल से सटी 10 बीघा जमीन। बाहर से देखने पर यह सिर्फ एक कृषि भूमि लगती थी, लेकिन अंदर ही अंदर यही जमीन प्रतापगढ़ के सबसे खूनी खेल का कारण बन चुकी थी। 25 लाख रुपए और एक बीघा जमीन देने की बात तय हुई इस जमीन की खरीद, बिक्री, कब्जे और समझौते में कई लोग शामिल थे। शाकिर बोहरा ने यह जमीन खरीदी थी और उसका पूरा कानूनी जिम्मा अधिवक्ता गिरिराज जोशी के पास था। गिरिराज सिर्फ वकील नहीं थे, बल्कि पूरे सौदे के सबसे भरोसेमंद आदमी माने जाते थे। दूसरी तरफ अंजुमन कमेटी भी इस जमीन को लेना चाहती थी क्योंकि वह धार्मिक स्थल से सटी हुई थी। इसके बाद बैठकों का दौर शुरू हुआ। कभी होटल में बातचीत होती, कभी बंद कमरों में, तो कभी शहर से बाहर समझौते की कोशिशें चलतीं। हर मीटिंग में करोड़ों की जमीन, लाखों के लेनदेन और हिस्सेदारी की बातें होतीं। हर बार मामला किसी न किसी मोड़ पर अटक जाता। फिर आया वह मोड़ जिसने पूरी कहानी बदल दी। अंतिम समझौते में 25 लाख रुपए और एक बीघा जमीन देने की बात तय हुई। ऊपर से सब शांत दिख रहा था, लेकिन अंदर ही अंदर कई लोग इस सौदे से नाराज थे। पुलिस जांच में सामने आया कि जमीन को लेकर 60-40 प्रतिशत हिस्सेदारी का फाॅर्मूला भी तैयार हुआ था। इसमें शाकिर बोहरा, अमीन खान, बबलू, रोशम और कुछ अन्य लोग शामिल थे। मगर समस्या सिर्फ पैसों की नहीं थी…समस्या थी गिरिराज जोशी। क्योंकि हर दस्तावेज, हर कानूनी प्रक्रिया और हर सौदे की चाबी उन्हीं के पास थी। अभियोजन के अनुसार कुछ लोगों को लगने लगा कि अगर गिरिराज जोशी बीच से हट जाएं, तो पूरा खेल उनके कब्जे में आ जाएगा। यहीं से शुरू हुई मौत की साजिश। हत्या से पहले कई गुप्त बैठकें हुईं पुलिस को बाद में पता चला कि हत्या से पहले कई गुप्त बैठकें हुई थीं। इनमें तय किया गया कि गिरिराज जोशी को डराकर नहीं, सीधे खत्म किया जाएगा। इसके लिए बाहर के लोगों को शामिल किया गया। शूटर चुने गए। आने-जाने के रास्ते देखे गए। यहां तक कि यह भी तय हुआ कि हमला किस वक्त करना है ताकि बचने का कोई मौका न रहे। साजिश इतनी खामोशी से रची गई कि शहर में किसी को भनक तक नहीं लगी। गिरिराज जोशी रोज की तरह अपने ऑफिस आते रहे…उन्हें शायद अंदाजा भी नहीं था कि उनके आसपास बैठे कुछ लोग ही उनकी मौत की पटकथा लिख चुके हैं और फिर आई 6 जनवरी 2007 की शाम। शाम 6 बजकर 45 मिनट। ऑफिस में गिरिराज जोशी अपने साथियों के साथ बैठे थे। तभी एक युवक अंदर आया। किसी ने उसे रोका नहीं क्योंकि वह बेहद सामान्य दिख रहा था। उसने कुछ सेकेंड तक गिरिराज को देखा…फिर अचानक हथियार निकाला। पहली गोली पसली में लगी। ऑफिस में बैठे लोग चीख भी नहीं पाए थे कि दूसरी गोली कनपटी में उतार दी गई। पूरा कमरा गोलियों की आवाज से गूंज उठा। गिरिराज कुर्सी से नीचे गिर पड़े। शूटर बाहर भागा, जहां उसका साथी बाइक स्टार्ट कर पहले से खड़ा था। दोनों कुछ सेकेंड में गायब हो गए। आंदोलन से पुलिस पर दबाव हत्या के बाद पुलिस पर भारी दबाव था। अधिवक्ताओं ने आंदोलन शुरू कर दिया। शहर बंद होने लगे। हर तरफ यही चर्चा थी कि अगर एक चर्चित वकील अपने ऑफिस में सुरक्षित नहीं है, तो आम आदमी कैसे सुरक्षित रहेगा? पुलिस ने मुखबिर लगाए, कॉल डिटेल निकाली, संदिग्धों से पूछताछ की, लेकिन मामला बेहद उलझा हुआ था। क्योंकि साजिश में शामिल लोग सीधे सामने नहीं आ रहे थे। कोई पैसों का इंतजाम कर रहा था, कोई शूटर तक पहुंच बना रहा था, तो कोई पर्दे के पीछे बैठकर पूरी चाल चला रहा था। फिर अचानक जांच में पहला बड़ा नाम सामने आया- भाउद्दीन उर्फ बाउद्दीन। उसके बाद वसीम खान, अमीन खान, चुन्नू उर्फ इमरान, मुस्तफा, बबलू उर्फ शराफत उल्लाह, रोशम खान, गुलाम अब्बास और प्रेम मोहन सोमानी के नाम एक-एक कर जुड़ते चले गए। पुलिस को शक था कि यही लोग उस साजिश की कड़ियां हैं, जिसने गिरिराज जोशी की जान ली। पुलिस ने हर छोटी-बड़ी चीज जोड़ना शुरू किया। गवाहों के बयान लिए गए। बैठकों की जानकारी जुटाई गई। पैसों के लेनदेन को खंगाला गया। कई लोगों ने बयान दिया कि हत्या से पहले जमीन को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा था और गिरिराज जोशी कुछ लोगों के लिए ‘रास्ते का सबसे बड़ा कांटा’ बन चुके थे। मामला इतना संवेदनशील हो चुका था कि बाद में हाईकोर्ट के निर्देश पर ट्रायल प्रतापगढ़ से हटाकर चित्तौड़गढ़ जिला एवं सत्र न्यायालय भेज दिया गया। साल गुजरते गए। कुछ आरोपी जेल में रहे, कुछ जमानत पर बाहर आ गए। इसी दौरान दो आरोपियों भाउद्दीन और अमीन खान की मौत हो गई। अदालत में सुनवाई जारी रही। पीड़ित (अभियोजन) पक्ष ने 183 दस्तावेज और 102 गवाह पेश किए। हर गवाही के साथ उस शाम की तस्वीर और साफ होती गई। 6 को उम्रकैद की सजा फिर आया 1 अक्टूबर 2021 का दिन। 14 साल बाद अदालत ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि गिरिराज जोशी की हत्या कोई अचानक हुआ अपराध नहीं, बल्कि सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र था। अदालत ने वसीम खान, चुन्नू उर्फ इमरान खान, मुस्तफा, गुलाम अब्बास, रोशम खान, बबलू उर्फ शराफत उल्लाह, प्रेम मोहन सोमानी और शाकिर बोहरा को दोषी माना। इनमें से छह को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। इमरान और रोशम को आर्म्स एक्ट में अतिरिक्त सजा भी मिली, जबकि फैसले के समय वसीम और शाकिर अदालत में मौजूद नहीं थे। इसके बाद कोर्ट ने उनकी जमानत रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी कर दिए। जमीन के विवाद में वकील की गोली मारकर हत्या:ऑफिस में हुआ हमला, बाहर बाइक स्टार्ट कर दूसरा युवक खड़ा था, पार्ट-1
