ईरान-इजराइल युद्ध के कारण पहली बार एक साथ 2200 स्टेपी ईगल (बाज) ने बीकानेर के जोड़बीड़ में ठिकाना बनाया है। यह संख्या पिछली बार से लगभग दोगुनी है। पिछली बार यहां करीब 1200 बाज देखे गए थे। स्टेपी ईगल रूस-मंगोलिया से उड़कर हर साल ईरान-इराक की तरफ रुख करते थे। बहुत कम संख्या में राजस्थान में रुकते थे। इस बार 25 दिन का सफर कर इनके दो बड़े झुंड बीकानेर के जोड़बीड़ और जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में रुके हैं। डेजर्ट नेशनल पार्क में इनकी संख्या करीब 1700 है। इतनी तादाद देखकर एक्सपर्ट भी हैरान हैं। खास बात यह है कि इनमें 70 फीसदी स्टेपी ईगल किशोर (जुवेनाइल) हैं। इनकी उम्र 2 साल से भी कम है। एक्सपर्ट का मानना है कि मिडिल ईस्ट में युद्ध से इनके आवास प्रभावित हुए हैं। इनके रहने की जगह खत्म हो चुकी है। इसी वजह से ये विदेशी पक्षी सबसे संरक्षित इन जगहों पर रुक गए हैं। 25 दिन का सफर तय करके भारत आए पिछले 20 साल से गिद्ध संरक्षण पर अनुसंधान कर रहे बीकानेर के वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट डॉ. दाऊ लाल बोहरा का कहना है- स्टेपी ईगल मध्य एशिया, रूस और मंगोलिया से हजारों किलोमीटर का प्रवास कर 25 दिन में भारत पहुंचता है। पहले इनकी सीमित संख्या होती थी। राजस्थान में बाज की यह प्रजाति पिछले 15 साल से नियमित आ रही है। पिछले तीन साल में इनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ी है। डॉ. दाऊ लाल बोहरा ने जनवरी 2026 में बीकानेर, चूरू के ताल छापर और गंगीतासर, जैसलमेर और फलोदी में सर्वे किया था। इस सर्वे में सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा बीकानेर के जोड़बीड़ से सामने आया है। जहां इस बार 2200 से ज्यादा स्टेपी ईगल की संख्या दर्ज की गई है। ईरान-इराक में आशियाने उजड़े डॉ. दाऊ लाल बोहरा का कहना है कि इस अचानक बढ़ोतरी की बड़ी वजह ईरान-इजराइल युद्ध के कारण उस क्षेत्र में चल रही अस्थिरता है। इसके कारण इन देशों में पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास प्रभावित हुए हैं और उन्होंने भारत की ओर रुख किया है। ईरान-इराक में भी स्टेपी ईगल पहुंचे हैं, लेकिन उनकी संख्या कम हुई है। बीकानेर को मिलेगी नई पहचान डॉ. बोहरा बताते हैं- स्टेपी ईगल अप्रैल के अंत तक यहां रुकेंगे। इसके बाद फिर से अपने इलाकों में लौट जाएंगे। हमारे लिए अच्छी बात ये है कि दक्षिण एशिया में गिद्धों के लिए प्रसिद्ध जोड़बीड़ अब स्टेपी ईगल के कारण भी अंतरराष्ट्रीय पहचान बना रहा है। यह क्षेत्र पहले से ही Important Bird Area (IBA) और Key Biodiversity Area (KBA) के रूप में मान्यता प्राप्त है। इतनी संख्या में आना रेड फ्लैग भी डॉ. बोहरा बताते हैं- इतने सारे ईगल का आना एक तरह से रेड फ्लैग भी है। वो इसलिए कि एक साथ इतने सारे पक्षियों का आने से यहां पारिस्थितिक असंतुलन हो सकता है। कुछ संक्रामक बीमारियों (जैसे बर्ड फ्लू) का खतरा बना रहेगा। यह आवास विनाश या बदलते मौसम के कारण भोजन और सुरक्षा की तलाश में सामूहिक पलायन की निशानी भी है। साल 2008 में बीकानेर में ही मरे थे स्टेपी ईगल इससे पहले साल 2008 में बीकानेर के जोड़बीड़ में 40 स्टेपी ईगल मर गए थे। दरअसल, जोड़बीड़ में मृत पशुओं को यहां डेरा जमाने वाले गिद्ध के भोजन के लिए डाला जाता है। पशुओं को न्यूमेसुलाइड, डायक्लोफिनेक, एसिक्लोफिनेक जैसी दवाएं दी जाती हैं। ऐसे मृत पशुओं का मांस खाने से स्टेपी ईगल की मौत होने की पुष्टि हुई थी। ऐसे में अब पर्यावरण प्रेमी डिमांड कर रहे हैं कि पशुओं को ये दवाएं नहीं दी जाएं। दुनिया में विलुप्त होने की कगार पर, राजस्थान में इनके लिए सुरक्षित दावा किया जाता है कि ये विलुप्त होने की कगार पर हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ ने रेड लिस्ट यानी विलुप्त प्राय (Endangered) श्रेणी में रखा है। इधर राजस्थान में हर साल इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। जैसलमेर और बीकानेर के अलावा ये चूरू, जोधपुर, बाड़मेर, हनुमानगढ़, नागौर और फलोदी में भी देखे जा चुके हैं। इनकी सबसे ज्यादा तादाद बीकानेर में देखी गई है। इसलिए 62 देशों की भागीदारी से 2025 में ग्लोबल एक्शन प्लान तैयार किया गया था। 2026 से 2035 तक लागू होने वाली इस योजना में जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व को संरक्षण स्थल के रूप में चिह्नित किया। भारत CMS (Convention on Migratory Species) का सदस्य होने के नाते इस अभियान में शामिल है। इसे ‘अम्ब्रेला स्पीशीज’ भी माना जाता है, यानी इसके संरक्षण से कई अन्य प्रजातियों को भी सुरक्षा मिलती है।
