राजस्थान हाईकोर्ट ने मेघालय की महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन कंप्यूटर एप्लीकेशन करने वाले इन्फॉर्मेशन असिस्टेंट्स ( सूचना सहायकों) को नौकरी से निकालने के 11 साल पुराने आदेश को बुधवार को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने इन्फॉर्मेशन असिस्टेंट्स की चयन और नियुक्तियों को रद्ध करने के 27 मई 2015 के आदेश को रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणियां की हैं। सरकार ने डिप्लोमा को मान्यता नहीं होने के आधार पर नियुक्तियां रद्द की थीं। जस्टिस गणेशराम मीणा ने यह आदेश राजाराम मीणा और पांच अन्य की याचिका को मंजूर करते हुए दिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को उनकी नियुक्ति की तारीख से ही रेगुलर सेवा में माना जाए। उन्हें सभी वेतन, भत्ते और लाभ दिए जाएं। हाईकोर्ट ने 100 दिन में याचिकाकर्ता कर्मचारियों को सभी लाभ देने के आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट ने कहा- कई साल तक सफलतापूर्वक सेवा दे चुके याचिकाकर्ता कर्मचारियों को अचानक नौकरी से बाहर करना उनके जीवन को तबाह करने जैसा है। हाईकोर्ट ने कहा- याचिकाकर्ताओं का सलेक्शन और नियुक्ति दस्तावेजों के पूरी तरह सत्यापन के बाद हुई थी। ऐसे में सरकार का प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ जाकर याचिकाकर्ताओं को जांच रिपोर्ट दिए बिना अचानक नियुक्तियां रद्द करना अवैध,मनमाना और अनुचित था। मेघालय की यूनिवर्सिटी से पीजीडीसीए करने वालों के डिप्लोमा को सरकार ने गैर मान्यता प्राप्त बताया था, इसे चुनौती दी याचिकाकर्ताओं के एडवोकेट विभूतिभूषण शर्मा ने अदालत को बताया- मेघालय की महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी से डिस्टेंट एजुकेशन के जरिए पीजीडीसीए का डिप्लोमा किया था। इसी आधार पर 2013 में निकली भर्ती में आवेदन किया था। उस समय मेघालय की महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी डिस्टेंस एजुकेशन काउंसिल (DEC) और यूजीसी से मान्यता प्राप्त थी। कोटा या अन्य केंद्रों पर केवल फॉर्म जमा करने या फीस भरने मात्र से इसे अवैध स्टडी सेंटर से कोर्स पूरा करना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि परीक्षा और पठन-सामग्री यूनिवर्सिटी ही देती है। इसके अलावा सरकार ने जिस आंतरिक जांच रिपोर्ट को आधार बनाकर उनकी नियुक्ति रद्ध की हैं, उस रिपोर्ट की कॉपी भी उन्हें नहीं दी गई। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन था। सरकार का तर्क, यूनिवर्सिटी को राज्य की सीमा से बाहर अनुमति नहीं थी सरकार का कहना था कि नियुक्तियां देने के बाद यूजीसी ने पंचायतीराज विभाग को लिखा था कि स्टेट एक्ट के तहत स्थापित होने वाली यूनिवर्सिटी केवल संबंधित राज्य की सीमा के भीतर कैंपस में नियमित पढ़ने वालों को ही डिग्री या डिप्लोमा दे सकती हैं। राजस्थान पंचायतीराज विभाग की आंतरिम जांच में भी मेघालय की महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी सहित कुछ अन्य यूनिवर्सिटी का डिस्टेंट ऐजूकेशन के तहत डिग्री या डिप्लोमा देना संदिग्ध पाया गया। इसलिए याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति पर पुर्नविचार हुआ तो पाया गया कि याचिकाकर्ताओं और कुछ अन्य कैंडीडेट ने डिस्टेंट ऐजूकेशन के तहत डिग्री या डिप्लोमा किए हैं। ऐसी यूनिवर्सिटी से लिया गया डिप्लोमा या डिग्री सरकारी नौकरी के लिए वैध नहीं माने जा सकते। इसके बाद याचिकाकर्ताओं सहित ऐसे सभी कैंडिडेट्स को 26 नवंबर,2014 को नोटिस देकर पात्रता संबंधी अन्य दस्तावेज पेश करने को कहा था। याचिकाकर्ताओं ने इस नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने 12 जनवरी,2015 के अंतरिम आदेश से याचिकाकर्ताओं के खिलाफ किसी प्रकार की विपरीत कार्यवाही करने पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा- जांच रिपोर्ट की कॉपी तक नहीं दी गई, यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन हाईकोर्ट ने कहा- कई साल तक सफलतापूर्वक सेवा दे चुके याचिकाकर्ता कर्मचारियों को अचानक नौकरी से बाहर करना उनके जीवन को तबाह करने जैसा है। क्योंकि अब वे अन्य सरकारी नौकरियों के लिए आयु सीमा पार कर चुके हैं।
