जयपुर के युवा किसान और एंटरप्रेन्योर संदीप मीणा (25) के सक्सेस की जर्नी 5 बकरियों से शुरू हुई। कोरोनाकाल में पिता का निधन हो गया। इसके बाद घर पर ही रहने के प्रेशर में प्राइवेट नौकरी भी संकट में आ गई। तब लगा कि खुद का कोई काम करना चाहिए। कोरोना में बकरी के दूध की डिमांड देखकर उन्हें स्टार्टअप का आइडिया आया। धीरे-धीरे बाजार और ग्राहकों को समझा। किसानों को अपने साथ जोड़ा और ऑनलाइन मार्केट तक पहुंचे। आज इसी काम से उनकी कंपनी का टर्नओवर 18 लाख से ज्यादा पहुंच गया है। आखिर युवा संदीप (25) ने छोटी सी शुरुआत को कैसे स्टार्टअप में बदला और किस तरह कमाई कर रहे हैं? म्हारे देश की खेती में इस बार बात जयपुर के किसान की … जयपुर के पास जोबनेर के डूंगरीकलां गांव के रहने वाले संदीप कुमार मीणा (25) खेती और बकरी पालन के साथ अपना स्टार्टअप चला रहे हैं। उनके पास साढ़े तीन बीघा जमीन है। खेत में तारबंदी कर बकरियों को खुला छोड़ते हैं। जयपुर की रजिस्टर्ड ब्रीड गुर्जर और सिरोही नस्ल की 20 बकरियां हैं। एक बकरी से रोजाना करीब एक से डेढ़ लीटर दूध मिलता है। संदीप के साथ 25 किसान जुड़े हुए हैं। मां कमला (38) भी स्टार्टअप में उनका सहयोग करती हैं। छोटा भाई बृजेश (21) ग्रेजुएशन कर रहा है। पिता जीवन राम मीणा (40) पत्थर का काम करते थे और सिलिकोसिस बीमारी से पीड़ित थे। कोरोना काल में 2021 में उनका निधन हो गया। पढ़ाई के बाद नौकरी का रास्ता चुना संदीप बताते हैं कि एग्रीकल्चर में बीएससी करना चाहते थे। लेकिन इसमें चार साल लगते और इसके बाद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए भी समय चाहिए था। इसलिए उन्होंने वेटेनरी में दो साल का डिप्लोमा किया। उम्मीद थी कि इसके बाद पशुधन सहायक की नौकरी आसानी से मिल जाएगी। घर के हालात को देखते हुए 2020 में वेटेनरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिसंबर 2020 में प्राइवेट कंपनी में नौकरी शुरू कर दी। कोरोना के कारण शुरुआत में वर्क फ्रॉम होम किया। पिता के निधन के बाद बढ़ीं जिम्मेदारियां पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ गईं। नौकरी के दौरान कंपनी ने उन्हें गुरुग्राम ऑफिस में जॉइन करने के लिए कहा। परिवार को छोड़कर गुरुग्राम जाना आसान नहीं था। इसलिए करीब तीन साल तक ऑफिस जॉइनिंग टालते रहे। इसी दौरान साल 2022 से ही वर्क फ्रॉम होम के साथ उन्होंने अपने स्टार्टअप पर भी काम शुरू कर दिया। कोरोना के हालात से आया स्टार्टअप का आइडिया संदीप बताते हैं – कोरोना के समय बकरी के दूध की डिमांड देखकर संदीप को स्टार्टअप का आइडिया आया। उस समय उनके पास करीब 5 बकरियां थीं। आसपास के लगभग हर घर में बकरियां पाली जाती हैं। जयपुर में चित्रकूट स्टेडियम के पास लगने वाले ऑर्गेनिक मार्केट में दूध की स्टॉल लगाकर शुरुआत की। 250 रुपए लीटर के हिसाब से दूध बेचा। इसी दौरान शुरुआती ग्राहक मिले और उन्हें बाजार का अनुभव हुआ। बकरी का दूध महंगा होने के कारण इसकी डिमांड कम रही। महंगे दूध के कारण डिमांड कम रही, फिर प्रोडक्ट बनाए संदीप बताते हैं – ऑनलाइन मार्केट को समझकर दूध से पाउडर, घी और साबुन जैसे प्रोडक्ट में बदलकर बेचने का काम शुरू किया। प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए रुपए नहीं थे। ऐसे में बल्क में दूध इकट्ठा कर पाउडर बनाने बनाना शुरू किया। गोटवेदा नाम से रजिस्ट्रेशन करवाकर शुरुआत के बाद स्टार्टअप धीरे-धीरे सेट हुआ तो 2025 में नौकरी छोड़ दी। संदीप बताते हैं – अभी 25 किसान मेरे साथ जुड़े हुए हैं। जिनसे बाजार रेट से ज्यादा में दूध खरीदते हैं। पहले डिमांड नहीं होने के कारण नियमित दूध नहीं खरीद पाते थे, अब नियमित खरीद कर रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों को भी फायदा हो रहा है। बकरी पालन में दो तरीके, खेत में अरडू और फसलों का भी इस्तेमाल संदीप बताते हैं – बकरियों को दो तरीकों से पाला जाता है। फार्म में बांधकर ब्रीडिंग और मांस के लिए पालन करने में खर्च ज्यादा आता है, जबकि ग्रेजिंग में खर्च कम हो जाता है। बकरियों के लिए चारे की जरूरत और एक्स्ट्रा इनकम के लिए 2025 में अरडू के 100 पौधे लगाए। अभी 60 पौधे जिंदा है और इनकी ऊंचाई करीब 10 फीट हो गई है। ये पौधे तेजी से बढ़ते हैं और बकरियां इसकी पत्तियां चाव से खाती हैं। इससे बकरियों में दूध बढ़ता है। अरडू के पेड़ करीब 10 साल में तैयार होते हैं। बाजार में इसकी लकड़ी 1 हजार रुपए क्विंटल तक मिलती है और एक पौधे से करीब 15 क्विंटल लकड़ी मिल सकती है। इससे अतिरिक्त कमाई भी हो जाएगी। पानी की कमी के कारण बारिश की फसल लेते हैं। इस बार तीन बीघा में 5 क्विंटल बाजरा हुआ है। हालांकि पूरा बाजरा बकरियों को सर्दियों में खिलाते हैं। इससे सर्दियों में बकरियों को बचाव होता है। गर्मियों में जौ खिलाते हैं, क्योंकि इसकी तासीर ठंडी रहती है। बकरी के दूध में न्यूट्रीशन को समझ रहे लोग संदीप बताते हैं – बकरी का दूध खास तौर पर उन बच्चों के लिए लिया जाता है, जिन्हें दूसरे दूध से एलर्जी होती है। यह पचने में हल्का होता है। कुछ लोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए भी इसे खरीदते हैं। खासकर डेगूं जैसी बीमारियों में डॉक्टर भी बकरी का दूध बताते हैं। अभी अधिकतर ग्राहक साउथ इंडियन हैं, जो न्यूट्रिशनल वैल्यू को समझते हैं। आने वाले समय में बकरी के दूध का अच्छा मार्केट बनेगा, क्योंकि लोग न्यूट्रीशन को लेकर जागरूक हो रहे हैं। — खेती किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए…. दादा ने कहा-सभी नौकरी करेंगे तो खेती कौन करेगा?:नेचुरल फार्मिंग से 7 करोड़ का टर्नओवर, खेत से सीधे 200 घरों तक पहुंचा रहे प्रोडक्ट दादा ने खेती के लिए मोटिवेट किया। कहते थे- सभी नौकरी करेंगे तो खेती कौन करेगा? नौकरी छोड़कर खेती करना भी आसान नहीं था। पूरी खबर पढ़िए
