राजस्थान में बीजेपी वोटर लिस्ट को अपने हिसाब से बनाकर पंचायती राज और नगर निकाय के चुनाव प्रभावित करना चाहती है। मैं आज भी दावा कर सकता हूं कि विधायकों को बुला-बुलाकर हर विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से एक पेन ड्राइव दी गई। राजस्थान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत में ये आरोप लगाए। उन्होंने कहा- SIR प्रक्रिया के नाम पर राज्य में मतदाता सूची के नाम पर बड़े स्तर पर गड़बड़ी की जा रही है। खासकर उन इलाकों में जहां कांग्रेस का प्रभाव अधिक है। डोटासरा ने चुनाव आयोग पर भी सवाल उठाए। मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए पढ़िए- पूरा इंटरव्यू… सवाल : एसआईआर को लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों हो रहा है? जवाब: देखिए, ‘SIR’ के नाम से हर राज्य में ये लोग (बीजेपी) गड़बड़ी कर रहे हैं। चुनाव आयोग पूरी तरह सरकार की कठपुतली बना हुआ है। विशेष रूप से बीजेपी और गृह मंत्री अमित शाह जी के दबाव में। राजस्थान में विधानसभा चुनाव में अभी 3 साल बाकी है, लेकिन पंचायती राज और नगर निकाय के चुनाव कराने हैं। इसलिए ये वोटर लिस्ट को अपने हिसाब से बनाकर चुनाव प्रभावित करना चाहते हैं। 45 लाख वोटर्स के नाम ये कहकर काट दिए कि वे शिफ्टेड हैं या ऐबसेंट हैं। अंतिम दिनों में अचानक जगह-जगह पर फर्जी कम्प्यूटराइज्ड हस्ताक्षर, टाइप किए हुए फॉर्म और हजारों की संख्या में आवेदन भेजे गए। ये खासकर उन्हीं क्षेत्रों में किया गया, जहां कांग्रेस मजबूत है या बहुत कम मार्जिन से जीती-हारी है। इन क्षेत्रों में अंधाधुंध फॉर्म वितरित किए गए। केवल फॉर्म ही नहीं, बल्कि एक पेन ड्राइव भी दी गई, जिसमें बाकायदा डेटा उपलब्ध कराया गया। सवाल : जिस पेन ड्राइव की बात कर रहे हैं, उसमें ऐसा क्या था?
जवाब : पेन ड्राइव में यह जानकारी दी गई है कि कौन-कौन लोग बीजेपी से असंतुष्ट हैं, कौन राजीव गांधी युवा मित्र रहे हैं, कौन अरावली आंदोलन जैसे जन आंदोलनों से जुड़े रहे हैं। इसके अलावा विदेश में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का डेटा भी शामिल था। यह डेटा भारत सरकार के पास पहले से उपलब्ध रहता है- पासपोर्ट और अन्य सरकारी रिकॉर्ड के जरिए। आरोप यह है कि इस डेटा को सुनियोजित और षड्यंत्र पूर्वक इकट्ठा किया गया और फिर राजस्थान बीजेपी की इकाई को सौंप दिया गया, जिसके आधार पर नाम काटने का एक पूरा कैंपेन चलाया गया। जैसे ही हमें इस साजिश की जानकारी मिली, हमने तुरंत इसका विरोध किया। मैंने और टीकाराम जूली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और हम मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास भी गए। वहां हमें कहा गया- ‘जो हो रहा है, उसे दिखाया जाएगा।’ लेकिन चुनाव प्रक्रिया के नियम बिल्कुल साफ हैं। ड्राफ्ट प्रकाशन के बाद एक BLA (बूथ लेवल एजेंट) एक दिन में केवल 10 फॉर्म ही बढ़ाने या घटाने के लिए दे सकता है, वह भी सीधे BLO को, न कि जिला कलेक्टर के कार्यालय में। इसके बावजूद हकीकत यह है कि वोटर्स के नाम हटाने के लिए 15-15 हजार फॉर्म जमा कराए गए। टीकाराम जूली के विधानसभा क्षेत्र (अलवर ग्रामीण) में 27 हजार फॉर्म दिए गए, क्योंकि वे 27 हजार वोटों से चुनाव जीते थे। रफीक खान (आदर्श नगर) के क्षेत्र में 17 हजार फॉर्म जमा कराए गए। मेरे क्षेत्र में पहले 600 फॉर्म फेंक कर चले गए, फिर 2000 फॉर्म लेकर पहुंचे। जब हमने आपत्ति दर्ज कराई, तो एसडीएम ने ही फॉर्म लेने से मना कर दिया। खंडेला में तो 700-800 ऑफलाइन फॉर्म एक ही व्यक्ति के पास से पकड़े गए, जो खुद को बीजेपी का BLA बता रहा था। वह यह कहकर पल्ला झाड़ रहा था कि ‘मैंने तो किसी फॉर्म पर साइन ही नहीं किया।’ दूसरी तरफ सरकारी कर्मचारी, खासकर BLO पर बीजेपी के लोग लगातार फोन करके दबाव बना रहे हैं, धमकियां दे रहे हैं। एक BLO ने तो यहां तक कहा कि ‘मैं गलत काम नहीं करूंगा, चाहे मुझे आत्महत्या ही क्यों न करनी पड़े।’ अब आप ही बताइए- 2002 के दस्तावेजों के आधार पर, चुनाव आयोग के नियमों के तहत सरकारी कर्मचारियों ने जो मैपिंग की, उसी के आधार पर ड्राफ्ट प्रकाशन हुआ। उसके बाद उन्हीं मैपिंग के आधार पर सही, वैध और वर्षों से दर्ज मतदाताओं के नाम काटने के लिए आवेदन देना- लोकतंत्र पर इससे बड़ा हमला और क्या हो सकता है? सवाल : आपने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह के नाम पर एक पेन ड्राइव दी गई, ये क्या मामला है?
जवाब : यह पूरा मामला बीएल संतोष और अमित शाह के आने के बाद तेज हुआ। मैं आज भी दावा कर सकता हूं कि मुख्यमंत्री निवास से विधायकों को बुलाकर हर विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से एक पेन ड्राइव दी गई। उसमें यह बताया गया कि किस इलाके में किन लोगों के वोट काटने हैं। मैंने यह भी सुना है कि बीजेपी कार्यालय और उनकी टीम ने कई जगह प्रिंटेड फॉर्म भी उपलब्ध कराए। एक ही पेन से हजारों फॉर्म पर एक जैसे हस्ताक्षर कराए गए। जब नियम है कि ड्राफ्ट प्रकाशन के बाद एक BLA एक दिन में सिर्फ 10 आवेदन दे सकता है, तो फिर ये 10,000-15,000 फॉर्म कहां से आ गए? कई फॉर्म में मोबाइल नंबर तक नहीं है, जबकि बिना मोबाइल नंबर के ऑनलाइन प्रक्रिया संभव नहीं होती। यह पूरी तरह बेईमानी है। सवाल : आपके पास क्या सबूत हैं?
जवाब: हमने कलेक्टर्स से जाकर पूछा। जब अलवर कलेक्टर से पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें जानकारी नहीं है, उनके ऑफिस में फॉर्म रखे हुए हैं। अब सवाल यह है कि सरकारी कार्यालय में किसी अधिकारी की टेबल पर गुमनाम व्यक्ति ऐसे कैसे फॉर्म रख सकता है? अगर यह प्रक्रिया सही है, तो मैं चुनाव आयोग से मांग करता हूं, कि वह अलग-अलग बताए- ऑफलाइन और ऑनलाइन कितने आवेदन आए। किस दिन किस BLA ने कितने फॉर्म दिए। लेकिन अब यह सब छुपाने के लिए एक ‘कंपाइल डेटा’ मंगवाया जा रहा है, जिससे ऑफलाइन-ऑनलाइन का फर्क ही पता न चले। नियम कहता है कि जिस व्यक्ति के नाम पर आपत्ति आती है, उसकी सूची चस्पा होगी, राजनीतिक दलों को जानकारी दी जाएगी, नोटिस जाएगा और 7 दिन का समय मिलेगा। लेकिन यह प्रक्रिया अपनाई ही नहीं जा रही। जयपुर में एक पार्षद के घर के 10 वोट कटवाने का फॉर्म दे दिया गया- उनकी मां, भाई और खुद पार्षद का भी। अब क्या वह पार्षद भी ‘अवैध’ हो गया? सवाल : बीजेपी का कहना है कि 100 वर्ग गज के मकान में 200-200 मतदाता हैं, नाम कटेंगे इसलिए कांग्रेस दबाव बना रही है।
जवाब : तो फिर ड्राफ्ट प्रकाशन किसने किया? सरकार ने ही किया। चुनाव आयोग के अंदर कौन बैठा है? इन्हीं के नॉमिनी लोग बैठे हैं। CJI को हटाकर कानून ऐसा बना दिया गया कि चुनाव आयोग पर कोई जवाबदेही ही न रहे। ये संस्थाओं को कैप्चर कर रहे हैं, जैसे असम और जम्मू-कश्मीर में परिसीमन हुआ। अगर वोटर ही नहीं रहेगा, तो चुनाव किस बात का? यह लोकतंत्र पर सीधा हमला है। ऐसे तो बर्मा और पाकिस्तान जैसी स्थिति कर रहे हैं। किस बात के चुनाव हैं फिर…एक प्रस्ताव पारित कर दो की जब तक मोदी और शाह हैं, वही सरकार में रहेंगे। सवाल : आपके पास सबसे ज्यादा शिकायतें किन विधानसभा क्षेत्रों/जिलों से आई हैं?
जवाब: इन्होंने प्रयास तो लगभग हर जगह किया है, जहां-जहां कांग्रेस मजबूत है या जहां हमारा वोट बैंक है। इनके पास पूरा डेटा है और उसी आधार पर योजनाबद्ध तरीके से वोटरों के नाम कटवाने की कार्रवाई की गई। इस पूरे खेल में बीजेपी के सभी नेता शामिल हैं। चुनाव आयोग की बैठकों में जाकर बीजेपी के प्रतिनिधि लक्ष्मीकांत दुबे और राव राजेंद्र सिंह खुलकर यह मांग करते हैं कि जो नियम BLA को एक दिन में सिर्फ 10 फॉर्म देने का है, उसे ‘अनलिमिटेड’ कर दिया जाए। अब अनलिमिटेड का मतलब क्या है? इसका मतलब है कि आखिरी तीन दिनों के लिए पूरी तरह से छूट दे दी जाए, ताकि हजारों फॉर्म एक साथ डाले जा सकें। इतना ही नहीं, SIR प्रक्रिया के बीच ही 7 हजार शिक्षकों के ट्रांसफर कर दिए गए, इसके लिए चुनाव आयोग से कोई अनुमति तक नहीं ली गई। मकसद साफ था- RSS की विचारधारा से जुड़े लोगों को वहां तैनात करना और फिर अपनी मर्जी से वोटर लिस्ट में नाम काटना या जोड़ना। यहां तक कि 50–50 वोट जोड़ने का भी अलग से ‘टास्क’ दिया गया। हम यह होने नहीं देंगे। लोकतंत्र के साथ यह बेईमानी हम स्वीकार नहीं करेंगे। सवाल : आपने कुछ अधिकारियों पर भी सवाल उठाए थे, वे कौन हैं?
जवाब : कई जगहों से शिकायतें आई हैं। मैं किसी को व्यक्तिगत रूप से टारगेट नहीं करना चाहता, लेकिन दो-तीन कलेक्टर ऐसे हैं, जिन्होंने इस पूरे मामले में संतोषजनक जवाब नहीं दिया। इनमें अजमेर जिला कलेक्टर और जयपुर जिला कलेक्टर भी शामिल हैं। उनका रवैया यह रहा कि ‘पंचायत चुनाव इससे नहीं हो रहे हैं, आप लोग क्यों पैनिक कर रहे हैं, हम जांच कर लेंगे, हम देख लेंगे।’ हमारा सवाल वही है- ड्राफ्ट प्रकाशन के बाद एक BLA एक दिन में 10 से ज्यादा फॉर्म ले ही नहीं सकता और अगर कोई उससे ज्यादा देता है तो आप उसे ले ही नहीं सकते, तो फिर आप किस बात की जांच करेंगे? यह जो नियम विरुद्ध बातें अधिकारी कर रहे हैं। हमें ऐसा लग रहा है कि वे बीजेपी की भाषा बोल रहे हैं, सिर्फ अपने पद पर बने रहने के लिए। आज अगर यही रवैया है, तो कल पंचायत राज और नगर निकाय चुनाव कैसे होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। हम साफ कह रहे हैं कि जैसे ही वोटर लिस्ट फाइनल होगी, हम राजस्थान हाई कोर्ट जाएंगे। सवाल : आगे कांग्रेस की रणनीति क्या रहेगी?
जवाब : हमारी जिला कांग्रेस कमेटी, ब्लॉक कांग्रेस कमेटी और मंडल स्तर के पदाधिकारी सभी SDM और कलेक्टरों के पास जाएंगे। हम मांग करेंगे कि ऑनलाइन और ऑफलाइन आवेदनों की सूची चस्पा की जाए। जहां गड़बड़ी मिलेगी, वहां हम आपत्ति दर्ज करेंगे। हमारे पास लगभग एक महीने का समय है और अगर चुनाव आयोग समय सीमा बढ़ाता है, तो हम हर दिन चौकसी करेंगे और इस बेईमानी को रोकेंगे। सवाल : बीजेपी कहती है पहले कांग्रेस एकजुट तो हो जाए।
जवाब: खेल महोत्सव में खेल मंत्री नहीं जा रहा, बजट बना रहे हैं उसमें वित्त मंत्री मौजूद नहीं है, उद्योग की समीक्षा बैठक में उद्योग मंत्री की सीट ही नहीं है। एक साथ पतंग उड़ाने से कुछ नहीं होता है। पतंग तो दिखावे के लिए उड़ाई जाती है। जब मुख्यमंत्री को बजट पेश नहीं करना है, वित्त मंत्री बजट पेश करेंगी तो बजट बनाने के लिए पूरी चर्चाएं मुख्यमंत्री क्यों कर रहे हैं? यह तो नैतिकता के आधार पर ही गलत है। आप क्या दिखाना चाहते हैं कि राजस्थान की वित्त मंत्री डमी है। उन्हें सिर्फ बजट पढ़ने के लिए बाबू की जगह रखा है। वित्त मंत्री के तौर पर क्या उन्हें बजट संबंधित सभी चर्चाओं में भाग नहीं लेना चाहिए। बजट की बंद अटैची तो वित्त मंत्री दिखाती हैं। लेकिन बजट की चर्चा और सुझाव मुख्यमंत्री सुन रहे हैं। यह तो हास्यास्पद है। सवाल: क्या गोविंद सिंह डोटासरा, सचिन पायलट, अशोक गहलोत और टीकाराम जूली एकजुट हैं, ये भी बीजेपी ही सवाल करती है?
जवाब : पूरी कांग्रेस एकजुट है- ऑलपिन की नोक जितना भी फर्क नहीं है। कांग्रेस की एकता पर सवाल उठाकर बीजेपी अपनी नाकामी छुपाने की कोशिश कर रही है। हकीकत यह है कि बीजेपी खुद पर्चियों पर सरकार चला रही है। उन्हें खुद को भी नहीं पता कि पंचायती राज परिसीमन हुए कितने दिन हो गए। नियम के मुताबिक 8 तारीख को वार्डों का प्रकाशन होना था, लेकिन 12 महीने की कवायद के बाद भी आज तक यह नहीं हो पाया। आज भी सीएमओ के अंदर पंचायती राज के अधिकारी हर जिले के एडीएम को बुला रहे हैं और कह रहे हैं- ‘इसमें संशोधन कर दो, उसमें संशोधन कर दो।’ राज्य निर्वाचन आयुक्त के पास से रोजाना संशोधन भेजे जा रहे हैं। जब चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी, तो आप अपने वार्डों का ही प्रकाशन नहीं कर पाएंगे। इतना ही नहीं, ओबीसी आयोग से आवश्यक रिपोर्ट तक नहीं ली गई, जो चुनाव प्रक्रिया के लिए अनिवार्य है। इसके बावजूद आप चुनाव कराने की बात कर रहे हैं। यह चुनाव नहीं, नौटंकी है। भरतपुर में दो साल से ज्यादा हो गए, अब तक प्रशासक बैठा हुआ है। कानून कहता है कि छह महीने से ज्यादा चुनाव नहीं रोके जा सकते, फिर भी जानबूझकर लोकतांत्रिक संस्थाओं को पंगु बनाया गया है। यह लोग बेईमान हैं, तानाशाही मानसिकता के लोग हैं। इन्होंने पूरे सिस्टम को कैप्चर कर लिया है।

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