कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के लिए भी इको सेंसिटिव जोन तय कर दिया गया है। अब संभाग की 6 सेंचुरी की तरह इस अभयारण्य की सीमा के चारों तरफ शून्य से एक किलोमीटर दायरे में नए होटल-रिसॉर्ट, खनन तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली अन्य किसी भी गतिविधि को नई स्वीकृति नहीं मिलेगी। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इसकी अधिसूचना 16 जनवरी को ही राजपत्र में प्रकाशित की है। इससे राजसमंद, पाली और उदयपुर के 94 गांव प्रभावित होंगे। इनमें उदयपुर की गोगुंदा तहसील के 23 गांव शामिल हैं। अरावली पर्वतमाला में अवस्थित कुंभलगढ़ अभयारण्य को देश के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में गिना जाता है। यह बनास और लूणी नदी प्रणालियों के जलग्रहण क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक विभाजक रेखा के रूप में कार्य करता है। यहां तेंदुए, लकड़बग्घे, सियार, नीलगाय, पैंगोलिन जैसे जीवों के साथ सैकड़ों प्रजातियों की वनस्पतियां पाई जाती हैं। खनन-ईंट भट्टे-नए उद्योग व नए होटल-रिसॉर्ट पर रहेगी रोक गोगुंदा के ये दायरे में : कड़ेच, रिछवाड़ा, पीपलसारी, चित्रावास, हेयला, बलबेरा, बरवाड़ी, मीठी बोर, सकरिया, भमरावद, मामादेव, गोदारा, ज्वारा का वाला, नेवार, चावड़ावास, बौखड़ा, मग्गा, कोलाजी चौतरा, दुदानी, राठौडों का गुड़ा, बागड़ के फले, भानपुरा के फले, बरावली, टोकरी आदि। अधिसूचना के प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी के लिए जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति गठित की गई है। इको-सेंसिटिव जोन में खनन एवं पत्थर उत्खनन, ईंट भट्टे और आरा मिल, नए प्रदूषणकारी उद्योग, बड़े पनबिजली प्रोजेक्ट, 1 कमी की परिधि में नए होटल-रिसॉर्ट तथा नई पवन चक्कियों के निर्माण जैसी गतिविधियों पर रोक रहेगी। सरकार पर्यावरण अनुकूल विकास को बढ़ावा देगी। इसके अंतर्गत वर्षा जल संचयन, जैविक खेती एवं कृषि-वनीकरण, सौर ऊर्जा और बायोगैस का उपयोग, कुटीर एवं ग्राम उद्योग, हरित प्रौद्योगिकी तथा कौशल विकास जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाएगा।
ये काम करवा सकेंगे, लेकिन लेनी होगी मंजूरी
स्थानीय निवासियों के लिए आवास निर्माण, सड़क चौड़ीकरण एवं अन्य बुनियादी ढांचा विकास, खेती, बागवानी और पशुपालन, क्षमता अध्ययन के बाद इको-टूरिज्म, नियंत्रित वाहन आवागमन और पर्यटन गतिविधियों जैसे काम हो सकेंगे। लेकिन इनके लिए निर्धारित शर्तों के तहत अनुमति दी जाएगी। भास्कर एक्सपर्ट- 10 साल पहले योजना, तब घोषणा होती तो बड़ा क्षेत्र संरक्षित होता
सेवानिवृत्त मुख्य वन संरक्षक और एनटीसीए सदस्य राहुल भटनागर का कहना है कि यदि 10 वर्ष पहले ही कुंभलगढ़ अभयारण्य का इको-सेंसिटिव जोन निर्धारित कर दिया गया होता तो आसपास के बड़े क्षेत्र को संरक्षित किया जा सकता था। आज अभयारण्य के आसपास कई जगह होटल और दूसरे निर्माण हो चुके हैं। वर्ष 2017 में सज्जनगढ़ अभयारण्य का इको-सेंसिटिव जोन घोषित किया गया था। तब कुंभलगढ़ के लिए भी प्रस्ताव भेजा था, लेकिन सभी अभयारण्यों के क्षेत्र तय होने के बाद अंततः यहां का जोन अधिसूचित किया गया है। अब आवश्यक है कि सभी विभाग विशेष निगरानी रखें, ताकि एक किलोमीटर दायरे में कोई नया निर्माण न हो सके।
