अजमेर विद्युत वितरण निगम (एवीवीएनएल) उदयपुर ने बकाया बिलों के भुगतान नहीं करने वाले उपभोक्ताओं के खिलाफ पिछले 10 माह से वसूली अभियान चला रखा है। इसके तहत उपभोक्ताओं को नोटिस देकर कनेक्शन काटने की कार्रवाई की जा रही है। एवीवीएनएल उदयपुर दिसंबर 2025 तक ही 1786 करोड़ वसूली लक्ष्य के मुकाबले 1770 करोड़ यानी 99 प्रतिशत से ज्यादा की वसूली कर चुका है। लेकिन, अब शेष 1 प्रतिशत की वसूली में सबसे ज्यादा पसीने छूट रहे हैं। क्योंकि, बाकायेदार कोई और नहीं, सरकारी विभाग ही हैं। यूडी टैक्स जमा नहीं कराने पर लोगों के मकान-दुकान सीज करने वाले नगर निगम पर सबसे बड़ा 20.54 करोड़ बकाया है। ऐसे ही पीएचईडी विभाग उदयपुर पर 1.04 करोड़ और लोगों को बात-बात पर नियमों का पाठ पढ़ाने वाले प्रशासनिक कार्यालयों पर 11.35 लाख बकाया है। 15 सरपंचों पर 50.82 लाख, जनता जल योजना की जिला परिषद पर 13.33 लाख, पुलिस विभाग पर 6.15 लाख रुपए की बाकीयात चल रही है। एवीवीएनएल इन सभी सरकारी विभागों को पिछले 6 माह से बार-बार नोटिस भेजकर बकाया बिलों के भुगतान की गुहार लगा रहा है। लेकिन, कोई सुनवाई नहीं हो रही है। नगर निगम उदयपुर ने तो अगस्त 2025 से अभी तक किसी भी माह के बिजली बिल का भुगतान नहीं किया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सभी सरकारी विभागों में प्री-पेड स्मार्ट मीटर प्राथमिकता से लगाकर इस समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जा रहा है? जबकि, एवीवीएनएल उदयपुर अकेले उदयपुर में ही 1 लाख से ज्यादा स्मार्ट मीटर लगा चुका है। एसई बोले- प्रयास जारी, विभाग रेस्पोंस नहीं दे रहे एसई केआर मीना का कहना है कि सरकारी विभागों से बकाया वसूली के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अच्छा रिस्पोंस नहीं मिल रहा है। वहीं, नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि वे स्वायत्त शासन विभाग को पत्र भेजकर बकाया बिलों के भुगतान कराने के लिए बजट देने का आग्रह कर चुके हैं, लेकिन अभी तक बजट नहीं मिला है। बता दें कि बिजली निगम बकाया बिलों की वसूली के लिए सख्ती कर रही है। हाल ही में निगम ने बकाया पर नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल तक का कनेक्शन काट दिया था। भास्कर एक्सपर्ट- यशवंत कुमार बोल्या, एवीवीएनएल के सेवानिवृत्त एसई समस्या क्यों… राजस्थान में कई सरकारी विभागों द्वारा बिजली बिल समय पर जमा नहीं कराने के पीछे मुख्य कारण प्रदेश सरकार के स्तर पर बजट आवंटन में देरी है। विभागीय स्वीकृति की लंबी प्रक्रिया और जिम्मेदारी तय न होना भी एक कारण है। अधिकांश विभागों में बिजली बिल का भुगतान एक नियमित प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि अतिरिक्त बोझ मानने की प्रवृत्ति भी है। वित्तीय वर्ष के अंत तक बजट खर्च की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। इससे बिजली जैसे अनिवार्य खर्च भी लंबित रह जाते हैं। कानून सबके लिए समान की बात जनतंत्र में सबके लिए आवश्यक समाधान यह… राज्य सरकार को विभागवार बिजली बिलों के लिए अलग से मासिक बजट का प्रावधान करना चाहिए। ऑनलाइन ऑटो-डेबिट सिस्टम लागू कर ट्रेजरी से सीधे भुगतान की व्यवस्था हो। लंबे समय तक बकाया रखने वाले विभाग प्रमुखों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो और आवश्यकता पड़ने पर गैर-आवश्यक कनेक्शनों को अस्थायी रूप से काटने का प्रावधान भी लागू किया जाए। सभी सरकारी विभागों में प्री-पेड स्मार्ट मीटर प्राथमिकता से लगाकर इस समस्या का स्थायी समाधान करने की जरूरत है। तभी कानून सबके लिए समान की बात व्यवहार में उतर सकेगी, जो जनतंत्र में आवश्यक है।