मेरे परदादा 10 साल इटली में रहे। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध लड़ा था।
मेरे दादा ने दूसरा विश्वयुद्ध लड़ा था।
मेरे ताऊजी को उनकी वीरता के लिए वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
मेरे पिताजी ने 71 की लड़ाई में अपना कौशल दिखाया। उन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ खुफिया नेटवर्क तैयार किया।
मैंने आतंकवादियों को उनके बीच रहकर ही मारा है।
मेरी पत्नी भारतीय सेवा में सेवाएं दे चुकी हैं। कैबिनेट मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कहा- उनका परिवार चार पीढ़ी से भारतीय सेना में है। उनके परदादा सूबेदार सरदूल सिंह गंगा ने प्रथम विश्व युद्ध में लड़े थे। राज्यवर्धन के दादा मेजर उदय सिंह ने द्वितीय विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया था। उनकी पत्नी (डॉ.) मेजर गायत्री राठौड़ भी ‘ऑपरेशन पराक्रम’ के दौरान प्रेग्नेंसी के बावजूद डिलीवरी से 10 दिन पहले तक सेना के साथ पाकिस्तान के खिलाफ मिशन पर रही। राठौड़ ने कहा- मेरी पत्नी के पिता भी पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना में अहम भूमिका निभा चुके हैं। साल 1971 की जंग में पाकिस्तान में 80 किलोमीटर अंदर तक जाकर रेड की थी। आज आर्मी डे पर कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का आर्मी का सफर… आतंकियों को उनके बीच जाकर किया खत्म राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कहा- पाकिस्तान के खिलाफ न सिर्फ मैंने बल्कि, मेरे जैसे कई जवानों ने काफी लंबे समय तक अलग-अलग मिशन पर काम किया। उस दौरान कानून नहीं कहता था, लेकिन इसके बावजूद हमने भारत की सुरक्षा और आतंकवाद के सफाए के लिए आतंकवादियों की वेशभूषा में उनकी तरह दाढ़ी रखते हुए कपड़े पहनकर उनके बीच जाकर उन्हें मारा था। उस वक्त हम छोटी-छोटी टुकड़ियों में जंगलों में रहकर आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन करते थे। हर परिस्थिति में आतंकवादियों को मारना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य होता था। 1992 में कश्मीर में आतंकवादियों का खात्मा किया तो भागने लगे थे राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने बताया- 1991 में कश्मीर में डर का माहौल तैयार हो गया था। लोग ऐसा कहने लगे थे कि कभी भी पाकिस्तान की सेना आकर कश्मीर को भारत से अलग कर देगी। तब 100-100 की संख्या में आतंकवादियों की टुकड़ियां कश्मीर में पैदल मार्च निकालती थीं। उन्होंने बताया- वर्ष 1992 में मेरी पोस्टिंग कश्मीर में हुई। जब हमारी सेना की टुकड़ी वहां पहुंची, तब हमने आतंकवादियों के खिलाफ विशेष अभियान की शुरुआत की। धीरे-धीरे हमने आतंकवादियों की टुकड़ियों का खात्मा किया। कुछ ही महीनों में आतंकवादी कश्मीर के हिस्से से भागने लगे थे। पहले बिना अनुमति आतंकवादियों पर कार्रवाई में चलता था केस राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने बताया- कश्मीर में रफियाबाद इलाका पाकिस्तान की सरहद से सिर्फ 30 किलोमीटर दूर था। उस समय पाकिस्तान की सेना ने आतंकवादियों की मदद के लिए सीमा पर काफी बमबारी और फायरिंग की। उस वक्त केंद्र सरकार की तरफ से तो हमें कोई आदेश नहीं मिलते थे। लेकिन भारत के सैनिकों ने तब पाकिस्तान में घुसकर सैनिकों और आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब दिया। उन्होंने कहा- हमारी एक विशेष टुकड़ी का गठन ही सिर्फ आतंकवादियों को सजा देने के लिए किया गया था। उसे सरहद पार कर पाकिस्तान भेजा जाता था। हम उनके बंकरों के साथ उन्हें खत्म करके आते थे। इसमें बड़ी रिस्क होती थी। कई बार हमारे सैनिकों और अधिकारियों के खिलाफ केस भी चलते थे। कहा जाता था- आखिर आप लोगों ने दिल्ली (तत्कालीन केंद्र सरकार) की बिना अनुमति के कार्रवाई कैसे की। परंतु आज हालात बदल चुके हैं। आज सेना आतंकवादियों के घर में घुसकर उन्हें मार रही है। मेजर गायत्री राठौड़ बोलीं- बेटी की डिलीवरी से 10 दिन पहले सेना के साथ काम किया कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की धर्मपत्नी डॉक्टर मेजर गायत्री राठौड़ ने बताया- मैं आर्मी मेडिकल कोर में बतौर मेजर काम कर रही थी। उस वक्त देश की पार्लियामेंट पर अटैक हुआ था। इसके बाद भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन पराक्रम’ शुरू किया था। उस वक्त मेरी प्रेग्नेंसी का चौथा महीना चल रहा था। मेरी बेटी की डिलीवरी से 10 दिन पहले तक मैं भारतीय सेना के साथ ही काम कर रही थी। हम लोग महाजन और सूरतगढ़ वाले एरिया में सेना के स्पेशल ऑपरेशन पर काम कर रहे थे। तब मुझे कभी भी प्रेग्नेंसी के बावजूद वहां अजीब नहीं लगा। बल्कि, सभी लोगों ने मेरा ध्यान रखा। हर भारतीय को सेना का हिस्सा होना चाहिए डॉक्टर मेजर गायत्री राठौड़ ने बताया- भारतीय सेवा में अपनी सेवा देकर मुझे गर्व महसूस होता है। मुझे लगता है कि हर भारतीय को सेना का हिस्सा होना चाहिए। उन्हें कुछ वक्त सेना के लिए जरूर काम करना चाहिए। क्योंकि सेना का जो जज्बा होता है, वह आपको जाति-धर्म-क्षेत्र से ऊपर उठकर सिर्फ देश के लिए सोचने का विचार देता है। जो हमारे राष्ट्र के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। राठौड़ ​​​​​​बोले- ​आर्मी डे अनकहे बलिदानों की याद दिलाने का दिन राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने बताया- आर्मी डे केवल एक तारीख या परेड का दिन नहीं है। यह उन अनगिनत खामोश रातों, अधूरी नींद, चौकस आंखों और अनकहे बलिदानों की याद दिलाने का दिन है, जो किसी भी सैनिक के जीवन का हिस्सा होते हैं। राजस्थान सरकार के कैबिनेट मंत्री कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ ने कह कि- कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों से लेकर खेल के मैदान और अब जनसेवा के मंच तक, उनका सफर इसी बात का इशारा करता है कि सैनिक की भूमिका बदल सकती है, लेकिन उसकी सोच, अनुशासन और सिद्धांत कभी नहीं बदलते। 1921 में नेशनल शूटिंग प्रतियोगिता में परदादा ने जीता था पदक राज्यवर्धन राठौड़ का जन्म जैसलमेर में हुआ। उनका परिवार चार पीढ़ियों से भारतीय सेना से जुड़ा रहा है। उनके परदादा सूबेदार सरदूल सिंह गंगा जैसलमेर रिसाला में कार्यरत रहे। साल 1921 में राष्ट्रीय शूटिंग प्रतियोगिता में उन्होंने एक रजत और एक कांस्य पदक जीता और उत्कृष्ट सेवा के लिए इंडियन डिस्टिंग्विश्ड सर्विस मेडल से सम्मानित हुए। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने सोमालि लैंड और मिस्र में सेवाएं दीं। करीब 9 सालों तक इटली में युद्धबंदी भी रहे। उनके दादा मेजर उदय सिंह ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बलूचिस्तान के चमन क्षेत्र में सेवाएं दीं। ताऊजी ब्रिगेडियर जगमाल सिंह 13 ग्रेनेडियर्स में रहे और वर्ष 1965 के युद्ध में हिस्सा लिया। वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में अद्वितीय वीरता के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। राज्यवर्धन के पिता कर्नल लक्ष्मण सिंह कमांडिंग ऑफिसर रहे कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ के पिता कर्नल लक्ष्मण सिंह राठौड़ 9 ग्रेनेडियर्स (मेवाड़) के कमांडिंग ऑफिसर रहे। उन्होंने 1965 और 1971 के युद्धों में अग्रिम मोर्चों पर नेतृत्व किया। पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान के भीतर तक रणधार अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं उनके नाना धूम सिंह आईपीएस राजस्थान पुलिस में सेवाएं दे चुके हैं। उन्हें राष्ट्रपति पदक से सम्मानित भी किया जा चुका है। राज्यवर्धन राठौड़ को मिला था स्वॉर्ड ऑफ ऑनर राज्यवर्धन राठौड़ ने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी पुणे से प्रशिक्षण लिया है। जहां उन्हें सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया और प्रतिष्ठित ब्लेजर सम्मान मिला। इसके बाद इंडियन मिलिट्री अकादमी में सर्वश्रेष्ठ कैडेट रहने पर उन्हें स्वॉर्ड ऑफ ऑनर दिया गया। 9 ग्रेनेडियर्स (मेवाड़) के साथ कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में शामिल रहे। इसके लिए पलटन को गवर्नर साइटेशन और आर्मी चीफ साइटेशन जैसे सम्मान मिले। …. आर्मी डे पर राजस्थान के वीर जवानों से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… 1. राजस्थान के मेजर ने चीनी सैनिकों की लाशें बिछा दीं:तीन महीने बाद भी फायरिंग की पोजीशन 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