विज्ञान भले ही भूत-प्रेत जैसी अवधारणाओं को अंधविश्वास की श्रेणी में रखता हो, लेकिन जोधपुर के राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान(Rajasthan Oriental Research Institute – RORI) में सुरक्षित प्राचीन ग्रंथ और सरकारी रिकॉर्ड एक अलग ही कहानी बयां करते हैं। यहां 12वीं से 18वीं शताब्दी के बीच लिखी गई दुर्लभ पांडुलिपियों में भूत-प्रेत, पिशाच और अदृश्य शक्तियों से जुड़ी मान्यताओं, उनके प्रभाव और नियंत्रण की विधियों का विस्तार से जिक्र मिलता है। ये ग्रंथ न केवल उस दौर की तांत्रिक-आध्यात्मिक परंपराओं को दर्शाते हैं, बल्कि तत्कालीन शासन, समाज और लोक विश्वासों की गहराई को भी उजागर करते हैं। दरअसल, देश भर में पांडुलिपियों, ऐतिहासिक ग्रंथों को डिजिटलाइजेशन करने का काम किया जा रहा है। इसी क्रम में राजस्थान के प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में भी पुराने और ऐतिहासिक महत्व को पांडुलियों, दस्तावेजों का डिजिटलाइजेशन किया जा रहा है। प्रदेशभर में अब तक करीब डेढ़ लाख पांडुलिपियों का डिजिटलाइजेशन किया जा चुका है। जिसमें जोधपुर का ये संस्थान भी शामिल है। संस्थान की निदेशक गोमती शर्मा ने बताया कि संस्थान में कई महत्वपूर्ण पांडुलिपियां संरक्षित हैं, जिनमें से कई भारत के सांस्कृतिक इतिहास और लोक विश्वास के महत्त्वपूर्ण पन्ने समेटे हुए हैं। वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी डॉ. कमल किशोर सांखला ने बताया कि इन दुर्लभ पांडुलिपियों का गहन अध्ययन कर रहे हैं और उनके संरक्षण‑सुरक्षा की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं। तांत्रिक परंपराएं और पीर-नाम आज भी लोकसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा वरिष्ठ अनुसंधान अधिकारी ने बताया कि संस्थान के अभिलेख बताते हैं कि राजस्थान के कई इलाकों में तांत्रिक परंपराएं और पीर-नामा आज भी लोकसंस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। शोधकर्ताओं का मानना है, कि ये पांडुलिपियां न केवल धार्मिक धरोहर हैं, बल्कि भारत की पुरानी सोच और रहस्यमयी मान्यताओं को भी उजागर करती है। सांखला ने बताया कि राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में 12वीं से 20वीं शताब्दी तक के कई अलग-अलग पांडुलिपियों से लेकर ऐतिहासिक दस्तावेज और उससे संबंधित ग्रन्थ है। इसमें ताड़पत्र, भोजपत्र, आयुर्वेद से लेकर ऋषि मुनियों के 25 विषयों के ग्रंथ यहां पर मौजूद है। ‘पीर-नामा’ में दर्ज है भूत-पिशाच भगाने की विधि
संस्थान के ‘तंत्र-मंत्र’ सेक्शन में रखी पांडुलिपियां विशेष रूप से कौतूहल का विषय हैं। 18वीं शताब्दी के दौरान जब ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा विज्ञान आज की तरह विकसित नहीं था, तब लोग आस्था और इन प्राचीन विधियों पर अटूट विश्वास रखते थे। यहाँ के ‘पीर-नामा’ साहित्य में भूत, पिशाच और डाकिन जैसी बाधाओं को दूर करने के तरीकों का विस्तार से जिक्र किया गया है। लक्ष्मी प्राप्ति और बच्चों की सुरक्षा के भी मंत्र
इन पांडुलिपियों में केवल रहस्यमयी शक्तियां ही नहीं, बल्कि दैनिक जीवन की समस्याओं के समाधान भी मिलते हैं: रक्षा स्तोत्र: शत्रुओं और बाधाओं से सुरक्षा के लिए। लक्ष्मी प्राप्ति: आर्थिक समृद्धि के लिए विशेष मंत्र और यंत्र। बाल रोग: छोटे बच्चों की पीड़ा और नजर दोष को दूर करने के उपाय। सर्पदंश: सांप के काटने के असर को कम करने से संबंधित प्राचीन जानकारियां।

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