सरकार या कोई भी विश्वविद्यालय लोगों को हमेशा के लिए कॉन्ट्रैक्ट (ठेके पर) नौकरी पर नहीं रख सकता। ऐसा पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट मे जस्टिस जगमोहन बंसल ने निशी द्बारा पंजाब यूनिवर्सिटी के खिलाफ दायर केस की सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने पंजाब यूनिवर्सिटी को आदेश दिया कि जो असिस्टेंट प्रोफेसर 2012 से एडहॉक (अस्थायी) तौर पर काम कर रहे हैं, उन्हें 6 हफ्तों के अंदर नियमित किया जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो उन्हें अपने आप नियमित माना जाएगा और वे नियमित कर्मचारियों की तरह वेतन और वरिष्ठता के हकदार होंगे। आदेश में आगे कहा कि ऐसा करना संविधान और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने कहा सरकार अपने नागरिकों का शोषण नहीं कर सकती और बेरोजगारी का फायदा उठाकर उन्हें अस्थायी नौकरी में नहीं रख सकती। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का गलत फायदा उठा रहे जस्टिस बंसल ने कहा कि कई राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश, सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का गलत फायदा उठा रहे हैं। अब तो हर विभाग यहां तक कि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी कॉन्ट्रैक्ट, अस्थायी या पार्ट टाइम कर्मचारियों पर ही निर्भर हो गया है। कोर्ट ने कहा कई शिक्षकों को इतना कम वेतन दिया जा रहा है कि वह नियमित चपरासी से भी कम है। सरकारें नियमित कर्मचारियों की भर्ती करने और उन्हें वेतन देने की बजाय पैसा सब्सिडी में खर्च कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल जरूरी परिस्थितियों में ही कॉन्ट्रैक्ट पर भर्ती की इजाजत दी थी, इसे आम प्रथा बनाने की नहीं। कोर्ट ने याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सभी नियुक्तियां नियमित भर्ती प्रक्रिया से ही की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा “राज्य एक आदर्श नियोक्ता होता है। वह अपने नागरिकों का शोषण नहीं कर सकता और बेरोजगारी का डर दिखाकर उन्हें अस्थायी रखने का हकदार नहीं है।”
