राजस्थान हाईकोर्ट एक बार फिर अवकाश के दिन खुला। जस्टिस फरजंद अली ने अवकाश के दिन शुक्रवार को श्रीगंगानगर के सुरेंद्र डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट को आदेश दिया है कि बीकानेर निवासी छात्रा नंदिनी स्वामी के सभी मूल शैक्षणिक दस्तावेज 24 अक्टूबर को सुबह 11 बजे तक लौटाए जाएं। प्रथम वर्ष की स्टूडेंट नंदिनी को कॉलेज ने शेष चार साल की पूरी फीस जमा कराने की शर्त पर दस्तावेज लौटाने से इनकार कर दिया था। याचिका में कहा गया कि पूरी फीस वसूलने के लिए छात्रों के मूल दस्तावेज रोकना गलत है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के सक्षम अधिकारियों को आदेश की पालना के निर्देश दिए। जरूरत पड़ने पर श्रीगंगानगर के संबंधित उपखंड अधिकारी को दस्तावेज वापस दिलाने में सहायता करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर को होगी। बता दें कि इससे पहले 21 सितंबर और 18 अक्टूबर 2026 को अवकाश के दिन हाईकोर्ट खुला था। बीडीएस में लिया प्रवेश, बाद में एमबीबीएस का मिला अवसर याचिकाकर्ता ने श्रीगंगानगर स्थित सुरेंद्र डेंटल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में बीडीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। इसके लिए उसने कॉलेज में कुल 2 लाख 75 हजार रुपए जमा कराए। अपने मूल शैक्षणिक दस्तावेज भी जमा करवा दिए। बाद की काउंसलिंग में छात्रा को हरियाणा के झज्जर स्थित वर्ल्ड कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश का अवसर मिल गया। यह संस्थान पंडित बी.डी. शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय रोहतक से संबद्ध है। नए संस्थान में प्रवेश की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए छात्रा को अपने मूल शैक्षणिक दस्तावेजों की जरूरत थी। छात्रा ने पहले कॉलेज से प्रवेश वापस लेने, जमा फीस के निपटारे और मूल दस्तावेज लौटाने का अनुरोध किया। कॉलेज प्रशासन ने 21 अक्टूबर 2026 को लेटर जारी कर दस्तावेज लौटाने से इनकार कर दिया। कॉलेज प्रशासन ने कहा- उसकी नीति के अनुसार शेष चार साल के पाठ्यक्रम की पूरी निर्धारित फीस जमा कराने के बाद ही मूल दस्तावेज लौटाए जा सकते हैं। इस शर्त के चलते छात्रा ने राजस्थान हाईकोर्ट का खटखटाया दरवाजा याचिका में दलील दी गई कि किसी विद्यार्थी को पहले संस्थान में प्रवेश लेने के बाद बेहतर शैक्षणिक अवसर मिलता है, तो केवल इसी आधार पर उसे पुराने संस्थान में पढ़ाई जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट संजय माथुर, रचिता माथुर और हर्षित गोयल ने पैरवी करते हुए कोर्ट को बताया कि फीस संबंधी विवाद के कारण मूल दस्तावेज रोकना छात्रा के शैक्षणिक हितों के प्रतिकूल है। दस्तावेज नहीं मिलने से दूसरे संस्थान में प्रवेश लेने का अवसर भी प्रभावित हो सकता है। सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस फरजंद अली की विशेष एकलपीठ ने कहा- विद्यार्थी के शैक्षणिक हितों और संस्थान के आर्थिक हितों के बीच संतुलन जरूरी है। हालांकि फीस वापसी और मूल दस्तावेज लौटाने के सवाल को अलग-अलग देखा जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा- भले ही संस्थान का फीस या प्रवेश वापस लेने से संबंधित कोई वैध दावा हो, लेकिन केवल उस दावे के आधार पर विद्यार्थी के मूल दस्तावेज रोकने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता। हाईकोर्ट के अनुसार- मूल शैक्षणिक दस्तावेज किसी विवादित आर्थिक दावे की वसूली के लिए सुरक्षा के तौर पर इस्तेमाल नहीं किए जा सकते। संस्थान को अपनी बकाया फीस या अन्य वैध देनदारी की वसूली के लिए कानून में उपलब्ध उपाय अपनाने होंगे। शैक्षणिक दस्तावेज सामान्य सामान नहीं, विद्यार्थी के भविष्य की चाबी हाईकोर्ट ने कहा- विद्यार्थियों के मूल शैक्षणिक दस्तावेज सामान्य वस्तुएं या व्यावसायिक संपत्ति नहीं हैं। ये दूसरे संस्थान में प्रवेश लेने, आगे की पढ़ाई जारी रखने और नए शैक्षणिक अवसरों का लाभ उठाने के लिए जरूरी होते हैं। हाईकोर्ट ने डेंटल कॉलेज को आदेश दिया है कि कॉलेज छात्रा के सभी मूल शैक्षणिक दस्तावेज और पूरा मूल शैक्षणिक रिकॉर्ड 24 अक्टूबर को सुबह 11 बजे तक छात्रा या उसके अधिकृत प्रतिनिधि को सौंपें। कॉलेज अपने रिकॉर्ड के लिए दस्तावेजों की स्पष्ट छायाप्रतियां रख सकेगा। राज्य प्रशासन सुनिश्चित करेगा पालना हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार के सक्षम अधिकारी आदेश की सख्ती से पालना सुनिश्चित करेंगे। जरूरत पड़ने पर श्रीगंगानगर के संबंधित उपखंड अधिकारी दस्तावेज वापस दिलाने में सहायता करेंगे। छात्रा की सीट फिलहाल रिक्त मानी जाएगी। कॉलेज के रिकॉर्ड में आवंटित सीट के संबंध में छात्रा का नाम हटाकर सीट को रिक्त दर्शाया जाएगा।
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