राजस्थान हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय फुल बेंच ने रेलवे के कैजुअल कर्मचारियों की पेंशन से जुड़े पुराने कानूनी विवाद को खत्म कर दिया है। कोर्ट ने कहा- अगर अस्थायी दर्जा प्राप्त कैजुअल कर्मचारियों की नियमित या अस्थायी पद पर नियुक्ति से पहले मौत हो जाती है तो उनके परिजन या विधवाएं पेंशन का लाभ पाने के हकदार नहीं होंगे। मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल, न्यायाधीश विनीत कुमार माथुर और न्यायाधीश मुन्नुरी लक्ष्मण की फुल बेंच ने अल्मा और अन्य की याचिकाओं को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं के पति उत्तर रेलवे के जोधपुर मंडल में कैजुअल गैंगमैन और सब्स्टीट्यूट खलासी जैसे पदों पर काम करते थे। उनकी नौकरी के दौरान ही मौत हो गई थी। रेलवे ने जब पेंशन देने से मना कर दिया तो परिजनों ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का दरवाजा खटखटाया। वहां से राहत न मिलने पर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। साल 2003 में एक पुराने फैसले पर फिर से विचार करने के लिए इस मामले को फुल बेंच के पास भेजा गया था। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि सुप्रीम कोर्ट ने चंदा देवी मामले (2008) में इस बारे में स्थिति पहले ही साफ कर दी थी। इंडियन रेलवे एस्टेब्लिशमेंट मैनुअल के पैरा 1501 के मुताबिक, ‘अस्थाई रेलवे कर्मचारी’ की परिभाषा में कैजुअल लेबर (भले ही उन्हें अस्थाई दर्जा मिला हो) शामिल नहीं हैं। केंद्र सरकार की तरफ से सीनियर पैनल काउंसिल प्रकाश चौधरी ने अपना पक्ष रखा। हाईकोर्ट की फुल बेंच ने माना कि याचिकाकर्ताओं के पति किसी अस्थाई पद पर नियुक्त होने से पहले ही गुजर गए थे। इसलिए, वे रेलवे मैनुअल के तहत पेंशन के हकदार नहीं थे। इसी आधार पर कोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।