चाणक्य ने हजारों साल पहले अर्थशास्त्र में लिख दिया था- राज चाहिए तो साम, दाम, दंड, भेद चारों आजमाने पड़ेंगे। राजस्थान के निकाय चुनाव में भाजपा ने इस सूत्र को हूबहू जी लिया। साम से जोड़ा, दाम से भरोसा जीता। जहां बात नहीं बनी, वहां निर्दलीयों से सहमति बना ली। जहां भरोसे की जरूरत थी, वहां ट्रिपल इंजन के विकास का वादा काम कर गया। भेद से परखा और दंड से बांधा। विपक्ष की बिखराव वाली रणनीति को पहले भांपा। फिर अपने पत्ते ऐसे चले कि अल्पमत भी बहुमत में बदल गया। और सबसे अहम- सख्त अनुशासन से बगावत नहीं होने दी। इसी चार-सूत्रीय नीति का नतीजा है कि 10 नगर निगमों में से 6 पर भाजपा का बोर्ड बन चुका है। तीन पर जीत तय है। यानी 10 में से 9 निगमों पर भगवा। ये सिर्फ जीत नहीं, शहरों की सियासत का नया भूगोल है। 309 निकायों के इस महासमर में अब तक 305 के रिजल्ट आए हैं। इसमें भाजपा की स्ट्राइक रेट 65 प्रतिशत से अधिक है। कांग्रेस का खाता 1 नगर निगम पर अटका है। दरअसल, दो साल से कांग्रेस चुनाव में देरी को हथियार बना रही थी। भाजपा ने शोर का जवाब प्रबंधन से दिया। नतीजा सबके सामने है। आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, पर सियासत का सच यही है कि अंत में सिकंदर वही कहलाता है, जो जीतता है। और कांग्रेस के लिए आईना है पाली – जहां 29 पार्षद जीत कर भी आपसी खींचतान में सिर्फ 3 वोटों पर सिमट गए। सीटें थीं, बोर्ड नहीं बना। जीत के बाद भी हार कैसे मिलती है, इसका इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता। भाजपा की जीत के पांच रणनीतिक कारण सरकार बनते ही फोकस राजस्थान में भाजपा की 2023 में सरकार बनी। भाजपा ने वन स्टेट-वन इलेक्शन का नारा देकर करीब दो साल तक चुनाव टाले। ये रणनीतिक हिस्सा था। इससे भाजपा के दो काम हुए। एक तो उसे चुनावी तैयारी के लिए पूरा समय मिल गया। दूसरा जो पार्टी ने घोषणा पत्र में वादा किया था, वो पूरा कर लिया। इस दौरान ग्राउंड से सर्वे किया। सर्वे के आधार पर जो चीजें सामने आई, उस आधार पर चुनावी रणनीति बनाई। शायद ये ही कारण था कि इस बार मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा तक रोड शो में उतर आए। केंद्रीय मंत्रियों ने प्रचार किया। विपक्ष ने खूब तंज कसे। लेकिन परिणामों के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को ये कहना पड़ा कि हम रोड शो का जवाब रोड शो से देते और सभी नेता मिलकर कैंपेन करते तो ज्यादा सीटें जीतते। यानी प्लान और अग्रेसिव चुनाव प्रचार ने भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाई। कांग्रेस इस मामले में पिछड़ गई। माइक्रो मैनेजमेंट श्लोक है “प्रबंधनं हि जयस्य मूलम्” यानी प्रबंधन ही जीत का मूल है। वैसे भाजपा के लिए कहा जाता है कि चुनाव खत्म होते ही भाजपा दूसरे चुनाव की तैयारियों में जुट जाती है। वे कभी नहीं रुकते। इसका कारण होता है माइक्रो मैनेजमेंट। भाजपा ने वोट से ज्यादा मैनेजमेंट से चुनाव लड़ा। चुनाव जीतते ही अपने पार्षदों को इस तरह कंट्रोल में किया कि कोई इधर-उधर नहीं हो पाया। निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के वोटों में मात्र एक प्रतिशत से कम का फर्क है, लेकिन निकाय प्रमुखों में इस 0.94 प्रतिशत को 33 के अंतर में बदल दिया। 309 शहरी निकायों में भाजपा ने 10,235 वार्डों में से 4,179 वार्ड जीते थे। कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 2,273 वार्ड जीते। भाजपा को 35.18% वोट मिले, कांग्रेस को 34.24% वोट मिले। दोनों के बीच मात्र 0.94 प्रतिशत का अंतर था, लेकिन कांग्रेस मैनेजमेंट में मात खा गई। इसके कारण 100 से ज्यादा निकायों में बहुमत नहीं होने के बावजूद भी भाजपा ने अपना बोर्ड बना लिया। खुद के ही नहीं विपक्ष के बागियों को भी साधा चाणक्य ने कहा था – राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है, न स्थायी शत्रु, व्यवहार से मित्र और शत्रु बनते हैं। चुनाव टिकट बंटने के बाद भाजपा और कांग्रेस में कई बागी पैदा हो गए। वो चुनाव भी जीत गए। भाजपा ने न केवल खुद के बल्कि बिना शोर-शराबे के कांग्रेस के बागियों को भी अपने साथ ले लिया। अजमेर इसका बड़ा उदाहरण है। कांग्रेस लीड में थी। कांग्रेस के पास 37 और भाजपा के पास 32 सीटें थीं। 11 निर्दलीय जीते थे, जो दोनों पार्टियों के थे। कांग्रेस इन्हें नहीं साध पाई, लेकिन भाजपा ने इन्हें अपना मित्र बना लिया और 6 वोटों से यहां अनामिका मेयर बन गईं। ये बताता है कि भाजपा ने इस तरह की रणनीति से जहां अल्पमत है, वहां बहुमत बनाने में कामयाब हो गई। पॉलिटिक्स में मैनेजमेंट और मिस मैनेजमेंट झुंझुनूं जिले की डूंडलोद नगर पालिका का उदाहरण देखिए। इससे आप पॉलिटिक्स में मैनेजमेंट और मिस मैनेजमेंट देख सकते हैं। डूंडलोद में कुल 20 पार्षद हैं। भाजपा ने महज 2 पार्षद जीते, कांग्रेस ने 8 और 10 निर्दलीय जीते। इन नतीजों को देखकर कोई भी कहेगा कि भाजपा किसी सूरत में बोर्ड नहीं बना सकती, लेकिन महज 2 पार्षदों के बूते भाजपा बोर्ड बनाने में कामयाब हो गई। ऐसा भाजपा ने कई जगह किया। कांग्रेस में मिस मैनेजमेंट किस कदर था, ये छह दिन पहले पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने स्वीकार कर लिया, लेकिन अभी तक कोई नेता ये स्वीकार नहीं कर पा रहा है कि चुनावी रणनीति में कोई तो खामी थी। कांग्रेस की कमजोरी को भांपना भाजपा ने कांग्रेस की कमजोरी को भांप लिया था। उसे पता था कांग्रेस चुनाव को ट्रेडिशनल (परंपरागत) तरीके से लड़ेंगी। लोकल मुद्दे होंगे। लोकल नेता होंगे। कांग्रेस ने किया भी वैसे ही। भाजपा ने इसके उलट विधानसभा और लोकसभा चुनाव वाली रणनीति अपनाई। उसी तरह चुनाव को लड़ा । ऐसा कोई नेता नहीं था, जो चुनाव प्रचार में नहीं था। दूसरा, निकाय चुनाव के नतीजे के दौरान पार्टी के नेता एक-एक पार्षद के लिए संघर्ष करते दिखे। जिन चार निकायों में रणनीतिकारों को कमजोरी दिखाई दी, वहां इस स्थानीय कैडर ने ऐसा माहौल बनाया कि री-पोलिंग की नौबत आ गई। बीजेपी को समीकरण साधने के लिए अतिरिक्त समय मिल गया। ये सब टॉप टू बॉटम मैनेजमेंट का ही नतीजा है। …और इन नतीजों में भविष्य के लिए क्या छुपा वार्डवार नतीजों से जो नेरेटिव बना था, निकाय प्रमुखों में बढ़त लेकर भाजपा अपने पक्ष में नेरेटिव सेट करने में कामयाब रही। इससे सरकार और भाजपा नेता ट्रिपल इंजन सरकार के नारे को नीचे तक ले जाने में कामयाब हो जाएंगे। दूसरा ये मॉडल अगले पंचायती राज चुनाव में मोरल बूस्टर काम करेंगे। विपक्ष के आक्रामक सियासी हमलों को का जवाब भी दे दिया है। अब सरकार और भाजपा नेताओं के पास जवाब देने के लिए नतीजे काफी है। क्योंकि नंबर खुद बोलते हैं। कुल मिलाकर कह सकते हैं, वोटों से चुनाव लड़ा गया था, बोर्ड मैनेजमेंट से बनाए गए। विपक्ष में 32.65%, इस बार 65% निकायों में सरकार निकाय प्रमुखों में भाजपा विपक्ष में रहते हुए 32.65 प्रतिशत निकायों में ही प्रमुख बना पाई थी। इस बार ये आंकड़ा 65 प्रतिशत को पार गया है। पिछली बार 2019 से 2021 के बीच हुए निकाय चुनाव में कांग्रेस का स्ट्राइक रेट 63 फीसदी से अधिक था। कुल 196 निकायों में से 125 पर कांग्रेस ने कब्जा किया था। 64 पर बीजेपी ने अपने अध्यक्ष बनाए थे। 7 अध्यक्ष अन्य या निर्दलीय बने थे। 2019 से 21 के बीच हुए चुनावों में 10 में से 6 निगम में कांग्रेस और 4 निगम में भाजपा का बोर्ड था। ….. ये खबर भी पढ़ें… 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