नमस्कार, निकाय चुनाव का रिजल्ट आने के बाद से कहीं खुशी, कहीं गम और कहीं खुन्नस का माहौल है। जोधपुर में जमीन से आसमान तक जश्न है। निर्दलीयों में जोश है। राजधानी में डोटासरा जी ने कह दिया-जिसकी सरकार होती है, निकाय का परिणाम उसी के पक्ष में आता है। झुंझुनूं में गुढ़ाजी का ‘आदमी’ भी जीत गया, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा सेब वाले इन्फ्लूएंसर की है। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. हमें हरा सके, जमाने में ‘दम’ नहीं है फिल्म कलाकार राजकुमार साहब ने 1981 में ही कह दिया था- हमको मिटा सके ये जमाने में दम नहीं, जमाना खुद हमसे है जमाने से हम नहीं। यही बात जोधपुर के पीपाड़ में एक चचा ने कह दी। उनके हाथ में बीजेपी का झंडा था और गले में मालाएं। यहां वार्ड 13 से भाजपा प्रत्याशी अनिल राठी की जीत पर चचा जान खुश। अपने साथी की जीत पर चचा बोले- हमको हरा सके जमाने में दम नहीं, जमाना हमसे है हम जमाने से नहीं। भाजपा भले मुस्लिमों को टिकट न दे चुनावी मैदान में न उतारे, लेकिन धरातल पर भाईचारे में कहीं कोई कमी नहीं है। ऐसी तस्वीरें सुखद। हालांकि पीपाड़ में दोनों प्रमुख दलों को बहुमत नहीं मिला है। तो निर्दलीयों में एक्स्ट्रा जोश नजर आ रहा है। जीते हुए निर्दलीय प्रत्याशी स्वरूप सिंह ने कार पर चढ़कर ऐलान किया- जो उम्मीदें आपको मुझ से हैं, वो मां भगवती पूरा करेंगी। 2. कांग्रेस का ‘सफाई अभियान’ निकाय चुनाव से पहले चीफ साहब ने बड़े दावे किए थे। लेकिन रिजल्ट आने के बाद उनके सुर बदल गए। उन्होंने सत्ता वाली पार्टी पर कई तरह के आरोप लगाए। इसके बाद कहा- ये ट्रेंड है कि निकाय चुनाव में मतदाता का रुझान सत्ता वाली पार्टी की तरफ रहता है। उधर खाचरियावास जी ने तो दोबारा चुनाव कराने की मांग कर डाली। पाप-पुण्य की बात करने लगे। हारने वालों के साथ यही होता है। जीत का अतिआत्मविश्वास होता है। जब हार मिलती है तो वह पचती नहीं। हर चीज में शक नजर आता है। जयपुर में वार्ड 20 में एक प्रत्याशी के समर्थक ने हंगामा कर दिया। कहा- दोबारा गिनती कराओ। पुलिस के काबू में नहीं आया। प्रत्याशी की हार मामूली अंतर से हुई थी। उन्हें भरोसा था कि जैसे स्कूल-कॉलेज में रिचेकिंग में नंबर बढ़ जाते हैं, ऐसा ही रिकाउंटिंग में होगा। जयपुर में वार्ड एक से निर्दलीय प्रत्याशी मोहन कुमावत की जीत हुई तो समर्थक ने कार पर चढ़कर जोरदार डांस कर दिया। 3. राजेंद्र गुढ़ा का ‘आदमी’ यूं तो राजेंद्र गुढ़ा किसी का एहसान नहीं रखते। एहसान को लेकर उन्होंने समर्थकों को पंचतंत्र की एक कहानी सुनाई। कहानी इस प्रकार है- जंगल में शेरनी शिकार पर निकली। साथ में शावक भी था। शिकार की कोशिश में शेरनी खाई में गिरकर मर गई। शेरनी का बच्चा बेचारा अकेला रह गया। भूखा-प्यासा शावक भटकने लगा। तभी उधर से बकरी गुजरी। बकरी को बच्चे की दया पर तरस आया। उसने उसे दूध पिला लिया। अब रोजाना का यही क्रम। बकरी उधर से गुजरे और शेर के बच्चे को दूध पिला दे। वक्त बदला। शेर का बच्चा बड़ा हुआ। जंगल का राजा बन गया। राजा बनते ही उसने पहला फरमान सुनाया। बोला- हाथी महाराज आज से तुम्हारी ड्यूटी तय की जाती है। रोजाना एक घंटे इस बकरी को पीठ पर बैठाकर उन पेड़ों के पत्ते चराना, जहां बकरी का मुंह नहीं पहुंचता है। हाथी रोजाना बकरी चराने लगा। एक दिन हाथी पर चढ़कर पीपल के पत्ते खाती बकरी को आसमान से उड़ते बगुले ने देखा। वो हैरान। ये क्या सीन है? वह उतरकर हाथी के पास आया। पूछा- ये क्या है भाई? हाथी बोला- ये एहसान है। बकरी ने राजा पर एहसान किया है। राजा एहसान चुका रहा है। एहसान वाली बात बगुले के जंच गई। वह किसी पर एहसान करने को बेताब। बगुले ने देखा कि एक कुंड में चूहा गिर गया है। निकल नहीं पा रहा। एहसान का मौका सामने था। बगुला कुंड में उतरा और चूहे को निकालकर एक पंख में दबाकर उड़ लिया। हवा लगने से चूहा तरोताजा हो गया। आदत के मुताबिक चूहे ने बगुले का पंख कुतर लिया। चूहा नीचे गिर पड़ा और आधा कटा पंख लेकर बगुला उड़ते हुए हाथी के पास पहुंचा। कहा- एहसान वाली बात तो फर्जी निकली। हाथी बोला- तूने किसी चूहे पर एहसान किया होगा। चूहा तो ऐसा ही करेगा। एहसान ही करना था तो किसी शेर पर करता। कहानी चुनावी थी। समर्थकों को जंच गई। समझ में भी आ गई। राजेंद्र गुढ़ा के एक समर्थक बलाराम सैनी जीतकर पार्षद बन गए। पत्रकार ने उसने पूछा तो खुलकर बताया- मैं राजेंद्र गुढ़ा का आदमी हूं। पत्रकार ने पूछा- मतलब? बलाराम बोले- मतलब मैं काम का आदमी हूं। 4. चलते-चलते.. जो लोग ये सोचते हैं कि सोशल मीडिया पर कुछ लोग लाइक्स, कमेंट और सब्सक्राइबर्स के लिए ऊटपटांग हरकतें करते हैं। बेरोजगार होते हैं। टाइम और जीवन बर्बाद कर रहे हैं। तो ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि इन्हीं ऊटपटांग हरकतों के कारण वीडियो बनाने वाले इन्फ्लूएंसर बन जाते हैं। अगर वीडियो खूब चलने लगे तो सोशल मीडिया से कमाई होने लगती है। इतना ही नहीं। अब तो राजनीति के द्वार भी इन्फ्लूएंसरों के लिए खुलने लगे हैं। इनकी वैल्यू हो गई है। बीकानेर में सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर ने पार्षद का पर्चा भर दिया। इसके बाद प्रचार के लिए गाना बनाया। गाना हिट हो गया । चुनाव में इन्फ्लूएंसर की जीत हुई। राजनीति में इन्फ्लूएंसरों का भविष्य उज्ज्वल है। वैसे भी बड़े-बड़े नेता इन्फ्लूएंसर बन सकते हैं तो इन्फ्लूएंसर नेता क्यों नहीं बन सकता? इनपुट सहयोग- अनुराग हर्ष (बीकानेर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगाी।