बालोतरा जिले का कोडुका गांव। तंग पगडंडियों के बीच भंवरलाल का घर। जहां मंगलवार की सुबह हुई तो एक हंसता खेलता परिवार था। आंगन में खेलते भंवरलाल के नन्हे पोते पोतियां और जल्दबाजी में खाना खाते उसके चार बेटे, उदाराम (39), रेखाराम (35), जोगाराम (31) और सबसे छोटा 29 साल का विशनाराम। एक सड़क हादसे ने चारों सगे भाइयों की मौत हो गई… और पलभर में पूरे परिवार की खुशियां उजड़ गईं। घर चलाने के लिए चारों खेती और मजदूरी करते। रोजाना किसी को एक जगह काम मिलता तो किसी को दूसरी जगह। सो अलग–अलग ही घर से निकलते। किस्मत से मंगलवार को 22 किमी दूर एक गांव में एक ही जगह काम मिल गया। घर में एक कार थी, चारों जल्दी-जल्दी तैयार होकर इसी कार से एक साथ रवाना हो गए, लेकिन किसे पता था किस्मत से एक ही जगह मिला ये काम बदकिस्मती में बदल जाएगा। अभी घर से निकले कोई तीन घंटे ही हुए थे कि पाटोदी गांव के पास इनकी कार एक रोडवेज बस से टकरा गई और मौके पर ही चारों भाइयों की मौत हो गई। हादसे से बेखबर पिता अपने खेत में काम कर रहा था। किसी की हिम्मत नहीं हुई उसे ये बताने कि अब उसके चारों बेटे नहीं रहे। रिश्तेदारों और गांव वालों ने उसे हिम्मत बंधाते हुए सबसे पहले यही कहा कि एक्सीडेंट में चारों के चोटें लगी है और फिर एक–एक कर चारों बेटों की मौत के बारे में बताया। बेटों की मौत की खबर सुनने बाद वह बदहवास सा हो गया। घर में कोहराम मच गया। हादसे के बाद भास्कर एप रिपोर्टर भंवरलाल के घर पहुंचा। जहां सभी रिश्तेदार और गांव वाले उसे ढांढ़स बंधाने बैठे थे। गांव वाले भंवरलाल को हिम्मत रखने की बात कह तो रहे थे, लेकिन फिर खुद ही फफक कर रो पड़ते। उसकी चीखें सुन हर किसी का कलेजा फट गया। घर में गूंज रही इन मातम की चीखों से महज कुछ घंटे पहले ही चारों बेटे राजीखुशी मजदूरी पर रवाना हुए थे। हमने जैसे तैसे कर भंवरलाल से ही बात कर जानने की कोशिश की कि सुबह घर में क्या कुछ हुआ था। खुद को संभालते हुए भंवरलाल ने बताया… चार बेटे थे। छोटे-छोटे पोते पोतियां हैं। सबसे छोटे बेटे विशनाराम की अभी शादी नहीं हुई थी। वह बोल भी नहीं सकता। कुछ दिन से मेरे साथ खेत में काम करवा रहा था, सो हम दोनों वहीं रहते थे। कल रात को उसने इशारों में कहा था कि मां से मिलकर आएंगे। इसलिए हम दोनों खेत से घर आ गए थे। मंगलवार सुबह तीनों बेटों को एक ही जगह काम था। वे विशनाराम को भी साथ लेकर चले गए। खुद की कार ले गए थे। छोटे वालो जाते-जाते भी मुझे इशारों में कह गया था कि जल्दी लौट आएंगे। इसके बाद मैं भी खेत पर चला गया। दो-तीन घंटे बीते होंगे। मुझे खबर मिली कि कार का एक्सीडेंट हो गया। मैं वापस आया तो घर के आसपास मेहमान दिखे। अंदेशा हो गया था कि ये लोग तो कभी ऐसे नहीं आते, बड़ी अनहोनी हो गई है। लोगों ने कहा- चारों के चोट लगी है। इसके बाद मुझे कहा कि एक बेटा नहीं रहा, बाकी का इलाज चल रहा है। ये सुनते ही जैसे मेरा खून सूख गया, ये क्या हो गया। भंवर लाल ने बताया- मैं बड़ी मुश्किल हिम्मत बांध कर थोड़ी देर के लिए बैठा था। फिर पड़ोसी ने बताया कि चारों ही नहीं रहे। इतना कहते ही भंवरलाल सुबक उठे। जोर-जोर से रोने लगे। कहते रहे…मेरे चारों बेटे चले गए। कल तक चार थे। आज एक भी नहीं है। कोई तो बच जाता। मेरे करम फूट गए। कोई कमाने वाला नहीं रहा। भंवरलाल कभी बेसुध हो जाते तो कभी दहाड़े मारकर रो पड़ते। जो हिम्मत बंधाने आते, वे ही रो पड़ते गांव के लोग घर के बाहर जुट रहे थे। ये सभी भंवरलाल और उसकी पत्नी को हिम्मत बंधाने आए थे, लेकिन खुद ही हिम्मत हारे हुए से लग रहे थे। चाहकर भी कोई भंवरलाल को चुप नहीं करवा सका। बस आकर बैठ जाते। जैसे किसी के पास कोई शब्द ही नहीं बचे थे। एक दूसरे को देखकर सब रोने लगते। अपने बेटों को खो चुकी मां की जुबान से बस यही निकल रहा था कि मेरे सारे बेटे मर गए… अब मैं क्या करूं? हर बार चारों अलग काम पर जाते थे। आज ही क्यों एक साथ गए ? इशारों में बात करता था सबसे छोटा बेटा भंवरलाल का सबसे छोटा बेटा जोगाराम बोल नहीं सकता था। वह इशारों में ही बात करता था। ज्यादातर वह खेत के काम में हाथ बंटाता था। कभी-कभी भाइयों के साथ मजदूरी पर चला जाता। पिता के पास भी वही सबसे ज्यादा रहता था। इसलिए उसके इशारे पिता भंवरलाल तुरंत समझ जाता था। सुबह मजदूरी पर जाते समय भी जोगाराम उसे इशारो में यही कहकर गया था कि हम जल्दी लौट आएंगे। मंगलवार को हुआ चारों भाइयों का अंतिम संस्कार घटना से नाराज जन प्रतिनिधियों और गांव के लोगों ने परिवार की मदद की मांग की। लोगों ने ड्राइवर की गिरफ्तारी और मुआवजे की मांग की। कुछ देर के लिए सड़क जाम भी किया। इसके बाद सारा दिन पटोदी सीएचसी के आगे धरने पर बैठे रहे। देर रात करीब 11 बजे प्रशासन के साथ हुई वार्ता में परिजनों की प्रमुख मांगों पर सहमति बनी। प्रशासन ने आर्थिक सहायता, रोजगार और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। इसके बाद परिजनों और ग्रामीणों ने धरना समाप्त कर दिया। बुधवार सुबह चारों भाइयों की अंतिम यात्रा में पूरा गांव शामिल हुआ। चारों को मिट्टी दी गई। मेघवाल समाज में किसी की मृत्यू होने पर मुखाग्नि नहीं दी जाती है, उन्हें मिट्टी में दफनाया जाता है। …. इस घटना से संबंधित ये खबर भी पढ़ें- रोडवेज बस-कार की भिड़ंत में 4 भाइयों की मौत:गाड़ी के उड़े परखच्चे, अंदर फंसे शव; रोजाना अलग-अलग जाते थे, आज एक साथ निकले बालोतरा जिले में मंगलवार को रोडवेज बस और कार की भिड़ंत में 4 सगे भाइयों की मौत हो गई। टक्कर इतनी भीषण थी कि कार के परखच्चे उड़ गए और चारों भाइयों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। (पूरी खबर पढ़ें)
