उदयपुर में गणगौर उत्सव की रौनक देखने को मिल रही है। उदयपुर शहर के भोईवाड़ा में शुक्रवार को माली समाज की ओर से ‘दातन हेला’ का आयोजन किया गया। इस आयोजन का मुख्य आकर्षण ‘भूत’ की डरावनी झांकी रही। परंपरा के अनुसार इसे ‘भोलेनाथ की चेली’ यानी भूत का रूप मानकर पूजा गया। इसे देखने के लिए गलियों में हजारों लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। इस झांकी की परंपरा पिछले 50 सालों से ज्यादा समय से चली आ रही है। इसमें समाज के ही एक युवक को भूत का रूप दिया गया। उसे रस्सियों से मजबूती से बांधकर पूरे क्षेत्र की गलियों में घुमाया गया। इसके पीछे की भावना बहुत नेक और सकारात्मक है। स्थानीय लोगों का मानना है कि नए साल की शुरुआत में इस तरह भूत को बांधकर पूरे मोहल्ले में घुमाने से इलाके की सारी नकारात्मकता, बीमारियां और बुरी शक्तियां दूर हो जाती हैं। देखिए भूत की झांकी की फोटोज… ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच झांकी निकली भोईवाड़ा के स्थानीय निवासी रवि माली ने बताया- दातन हेला का दृश्य अपने आप में बहुत रोमांचक और जीवंत होता है। जब ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच यह झांकी निकली तो पूरे मोहल्ले में एक अलग ही ऊर्जा भर गई। इस दौरान भांग और भुजिया का प्रसाद भी बांटा गया। भोईवाड़ा की तंग गलियों में जुलूस निकाला गया। रवि माली ने बताया- वे बचपन से इस परंपरा को देखते आ रहे हैं। उनके परिवार के बड़े बुजुर्गों को यह करते देख वे भी इस रिवाज को बारीकी से सीखे हैं और अब इसे आगे बढ़ा रहे हैं। भूत बने युवक को खिलाते-पिताले हैं लोग इस परंपरा का एक बहुत ही दिलचस्प पहलू यह भी है कि यह भूत का रूप बना युवक हर घर के दरवाजे तक जाता है। वहां उसे देखकर कोई डरता नहीं और न ही उसे भगाया जाता है। बल्कि मोहल्ले के लोग उसे बड़े प्यार से खिलाते-पिलाते हैं। पुरानी मान्यताओं को आज की युवा पीढ़ी ने भी उतने ही जज्बे के साथ संभाल कर रखा है। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने का एक बड़ा माध्यम है। इसे देखने के लिए आसपास के गांवों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। चार दिन घूमेगी शाही सवारी स्थानीय निवासी नीरज माली ने बताया- गणगौर उत्सव का मुख्य आकर्षण अभी बाकी है। शनिवार शाम चार बजे से भव्य शाही सवारी का आगाज होगा, जो अगले चार दिनों तक पूरी शानो-शौकत के साथ शहर में घूमेगी। इन चार दिनों में उदयपुर की महिलाएं पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में सज-धजकर और सिर पर गणगौर माता की प्रतिमा रखकर गणगौर घाट पहुंचेंगी। वहां पिछोला झील के किनारे पारंपरिक लोक गीतों के बीच माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। इस आयोजन ने स्थानीय युवाओं, महिलाओं और बच्चों में जबरदस्त जोश और उमंग का माहौल बना दिया है। भोईवाड़ा की यह अनोखी परंपरा हर साल सबका ध्यान अपनी ओर खींचती है। स्थानीय लोग कहते है कि भूत की यह प्रतीकात्मक झांकी समाज से बुराई को दूर करने और क्षेत्र में खुशहाली लाने के अटूट विश्वास से जुड़ी है। मेवाड़ की यह संस्कृति आज भी अपने पुराने और असली स्वरूप को बचाए हुए है, जो वाकई में काबिले तारीफ है।