राजस्थान क्राइम फाइल्स पार्ट–1 में आपने पढ़ा 36 वर्ष पुराना केस। हनुमानगढ़ में तीन भाइयों का परिवार। आधी रात को एक भाई के परिवार के चार लोगों की हत्या हो जाती है। हत्यारा फरार हो जाता है। अन्य भाई जब सुबह उठते हैं तो देखते हैं कि 4 सदस्य दम तोड़ चुके होते हैं। 2 को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया जाता है। हर कोई हैरान था कि ऐसी क्या दुश्मनी थी कि पूरे परिवार पर हमला कर दिया। पूरे मामले में सिर्फ एक बात अजीब थी। वारदात के बाद से तीसरा भाई नजर नहीं आ रहा था। शक की सुई उस पर घूम जाती है। अब पढ़िए आगे की कहानी… पुलिस सुरजाराम की तलाश में जुट जाती है। इधर हॉस्पिटल में राजीराम की बेटी सुदेश को होश आता है। वह पुलिस को बताती है कि उसके चाचा सुरजाराम ने पूरे परिवार पर कुल्हाड़ी से वार किया। वह भी घर के बाहर मां के साथ सो रही थी। घर के आंगन में उसके पिता और दोनों भाई व पिता की बुआ सो रही थी। देर रात नींद में उसके चाचा सुरजाराम ने सभी पर कुल्हाड़ी से वार किया। बाहर आकर मां फूला और उसपर भी कुल्हाड़ी से वार किया और भाग गया। सुदेश के इस बयान के बाद पुलिस ने सुरजाराम की खोज तेज कर दी और उसे गांव के बाहर से गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने जांच की तो सामने आया कि तीनों भाइयों के माता–पिता जमीन का बंटवारा कर पंजाब में शिफ्ट हो गए थे। बड़े बेटे दलीप राम और छोटे बेटे सुरजाराम को 13–13 एकड़ जमीन दी थी। मंझले बेटे राजीराम को 14 एकड़ जमीन दी थी। घटना से 6 माह पहले आपस में अनबन हुई थी। सरपंच चंद्रपाल के हस्तक्षेप से विवाद सुलझ गया था। तीनों भाइयों का मकान पास–पास था। पहले दलीप फिर राजीराम और फिर सुरजा राम का मकान था। सुरजाराम से पुलिस ने पूछताछ की तो सामने आया कि वह अपनी जमीन पर कंटीली बाड़ लगाना चाहता था, लेकिन राजीराम ने मना कर दिया। इस पर वह गुस्से में आकर उसने पूरे परिवार की हत्या कर दी। हत्या के खुलासे के बाद हनुमानगढ़ कोर्ट में सुनवाई चली। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हनुमानगढ़ ने जनवरी 1991 में सुरजाराम को मृत्युदंड दिया। सुरजाराम की ओर से इस आदेश के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट की मुख्यपीठ जोधपुर में याचिका दायर की गई। 18 जनवरी 1996 को हाईकोर्ट ने सुरजाराम की अपील खारिज कर दी और मृत्युदंड की सजा बरकरार रखी। इसके बाद सुरजाराम की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई । सुरजाराम के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि मामला मृत्युदंड जैसी सजा देने का नहीं है, दुर्लभतम मामलों में नहीं आता ऐसे में उचित सजा पर विचार किया जाए। सुप्रीम कोर्ट 25 सितंबर 1996 को आदेश देते हुए सुरजाराम की मृत्युदंड की सजा को बरकरार रखा। …. ये खबर भी पढ़िए… आधी रात घर में घुसकर 4 का गला काटा:2 जिंदगी-मौत से लड़ रहे थे, पूरा गांव सदमे में…किसने की हत्या? पार्ट-1