हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने तलाकशुदा पत्नी को मिलने वाले स्थायी गुजारा भत्ते को 25 लाख से बढ़ाकर 40 लाख रुपए कर दिया है। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने 1 अप्रैल को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि पत्नी 16 सालों से अकेले बच्चों का पालन-पोषण कर रही है। महिला के पास न आय है, न अपना घर। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पति एक सरकारी डॉक्टर है, तो फैमिली कोर्ट का 25 लाख रुपए का पुराना फैसला न्यायोचित नहीं था। कोर्ट ने कहा- गुजारा भत्ता अमीरी का जरिया नहीं है, बल्कि सम्मान का अधिकार है।
31 साल पुराने विवाह का दर्दनाक सफर यह मामला जोधपुर निवासी शोभा कंवर और डॉ. नरपतसिंह के बीच चल रहे विवाद का है। दोनों की शादी 23 अप्रैल 1994 को मारवाड़ जंक्शन में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। इनके 2 बेटे है। पत्नी ने 2 मार्च 2015 को फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। पत्नी का आरोप है कि 2004 में पति और उसके परिवार पर पिता का मकान और जमीन बेचकर पैसे लाने का दबाव बनाया। इनकार करने पर 1 मई 2009 को पीटा गया और बच्चों सहित घर से निकाल दिया गया। इस मामले में दहेज प्रताड़ना, आपराधिक विश्वासघात, मारपीट और षड्यंत्र के तहत एफआईआर भी दर्ज है। फैमिली कोर्ट, जोधपुर ने तलाक की डिक्री जारी करते हुए पति को पत्नी को 25 लाख रुपए देने का आदेश दिया था, और भुगतान होने तक 45 हजार रुपए प्रति माह देने के लिए कहा था। पत्नी ने इस राशि को अपर्याप्त मानते हुए 2 करोड़ रुपये की मांग की, जबकि पति ने इसे अत्यधिक बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी। पति की आय बनाम पत्नी की वकालत महिला के वकील ने पैरवी करते हुए बताया- पति ईएनटी विशेषज्ञ और सरकारी अस्पताल पाली में वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी हैं। वेतन के अलावा निजी प्रैक्टिस, आरटीओ फिटनेस सर्टिफिकेट और मेडिकल एजेंसी से मिलाकर उनकी 8-10 लाख रुपए मासिक आय है। पत्नी के पास आय का कोई साधन नहीं है। वह 16 साल से बच्चों को अकेले पाल रही है। वहीं, पति की ओर से वकील ने तर्क दिया कि पत्नी बीए एलएलबी, एलएलएम और पीएचडी योग्यताधारी वकील है। 50 हजार रुपए मंथली कमाती है। पति की बूढ़ी मां बीमार हैं और विकलांग भाई आश्रित है, जबकि दोनों वयस्क पुत्र इंजीनियरिंग कॉलेज में कार्यरत हैं। ऐसे में पति पर ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी है। गुजारा भत्ता सम्मानजनक जीवन के लिए दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर खंडपीठ ने माना कि विवाह लगभग 15 साल तक चला और पत्नी 16 वर्षों से बच्चों को अकेले पाल रही है। कोर्ट ने पाया कि पति का वेतन लगभग 2 लाख रुपए मासिक प्रमाणित है। उसके पास स्वअर्जित मकान और पैतृक संपत्ति है। इसके विपरीत, पत्नी के पास कोई स्वतंत्र आवास नहीं है। कोर्ट ने माना कि पत्नी की निजी प्रैक्टिस संबंधी आय के दस्तावेज 2011 से पुराने हैं और उसकी वर्तमान आय साबित नहीं होती है। साथ ही, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी की 2 करोड़ की मांग अत्यधिक और असमर्थित है, क्योंकि गुजारा भत्ता समृद्धि का जरिया नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने का माध्यम है। कोर्ट ने पत्नी की अपील स्वीकार और पति की अपील खारिज करते हुए स्थायी गुजारा भत्ता 25 लाख से बढ़ाकर 40 लाख रुपए कर दिया है।
