राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला देते हुए कहा- भ्रष्टाचार के मामले में किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए केवल ट्रैप की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए स्पष्ट डिमांड, बरामदगी और लंबित काम का होना जरूरी है। जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत ने यह फैसला रेलवे सुरक्षा बल (RPF)इंस्पेक्टर और 2 कॉन्स्टेबलों की अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। तीनों को एसीबी ने करीब 18 साल पहले 22 जुलाई 2007 को 5 हजार रुपए की रिश्वत लेने के मामले में गिरफ्तार किया था। एसीबी कोर्ट-1 जयपुर ने 29 मई 2023 को तीनों को दोषी मानते हुए 1-1 साल की सजा सुनाई थी। सजा के खिलाफ तीनों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। हाईकोर्ट ने एसीबी कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए तीनों को बरी कर दिया। फर्श से रुपए बरामद होना रिश्वत नहीं
कोर्ट ने कहा- भ्रष्टाचार से जुड़े किसी भी मामले में रिश्वत की स्पेसिफिक और क्लियर डिमांड होनी चाहिए। इस मामले में एसीबी की ऑडियो रिकॉर्डिंग में स्पष्ट डिमांड नहीं है। दूसरा, ट्रैप की कार्रवाई में एसीबी का कहना है कि RPF रींगस थानाधिकारी कैलाशचंद सैनी के इशारा करने पर शिकायतकर्ता ने कॉन्स्टेबल सांवरमल मीणा को रिश्वत की राशि दी, लेकिन शक होने पर उसने यह राशि जेब से निकालकर जमीन पर फेंक दी। एसीबी ने यह राशि फर्श से बरामद की, लेकिन कॉन्स्टेबल सांवरमल के हाथों से नोटों पर लगाया गया रंग नहीं छूटा। तीसरा, शिकायतकर्ता का कहना था कि थानाधिकारी ने उसे टिकट ब्लैक करने के केस से निकालने की एवज में रिश्वत मांगी थी, जबकि फाइल में मौजूद तथ्यों के आधार पर शिकायतकर्ता के केस की जांच थानाधिकारी के पास नहीं थी। उसने केवल जांच को चार्जशीट के लिए उच्चाधिकारियों को रेफर किया था। वहीं ट्रैप की कार्रवाई से पहले ही चार्जशीट तैयार हो चुकी थी। ऐसे में तीनों के पास शिकायतकर्ता का कोई भी काम लंबित नहीं था। एसीबी ने कोई स्वतंत्र गवाह नहीं बनाया
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा- एसीबी ने यह ट्रैप की कार्रवाई सीकर रेलवे कोर्ट परिसर में की। ट्रैप कार्रवाई के समय रेलवे मजिस्ट्रेट कोर्ट परिसर में मौजूद थे, लेकिन एसीबी ने न तो मजिस्ट्रेट को और न ही किसी अन्य स्वतंत्र व्यक्ति को अभियोजन पक्ष का गवाह बनाया। सभी गवाह एसीबी के कर्मचारी थे और उन्होंने भी अभियोजन की कहानी की पुष्टि नहीं की। वहीं, तीनों आरोपियों के खिलाफ जारी अभियोजन स्वीकृति के अलग-अलग आदेशों की समान भाषा भी संदेह पैदा करती है। 2007 में हुई थी ट्रैप की कार्रवाई
दरअसल, शिकायतकर्ता चिरंजीलाल और उसके भाई को RPF रींगस ने फर्जी नामों से टिकट बुक करवाकर ब्लैक करने के मामले में पकड़ा था। उसने एसीबी में शिकायत दी थी कि आरोपी पुलिस वाले उसका नाम केस से हटाने के लिए 5 हजार रुपए की रिश्वत मांग रहे हैं। कॉन्स्टेबल जगवीर सिंह ने उससे थानाधिकारी के नाम पर 2 हजार रुपए की रिश्वत ले ली है और अब शेष 3 हजार रुपए देने के लिए कह रहे हैं। इस पर एसीबी ने 26 जुलाई 2007 को ट्रैप कार्रवाई की और कॉन्स्टेबल सांवरमल से रिश्वत की राशि बरामद होना बताया। हाईकोर्ट में आरोपी पुलिसकर्मियों की ओर से वरिष्ठ वकील माधव मित्र, वकील गिर्राज प्रसाद शर्मा और वकील राजीव सोगरवाल ने पैरवी की। रिश्वत से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए…
जोधपुर में हरियाणा पुलिस का ASI रिश्वत लेते गिरफ्तार:रिमांड में परेशान नहीं करने की एवज में मांगे थे 3 लाख रुपए जोधपुर में एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने हरियाणा पुलिस के एएसआई को 3 लाख रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया। आरोपी ने पुलिस रिमांड में परेशान न करने और मदद करने के बदले में रिश्वत की डिमांड की थी। पढ़े पूरी खबर

You missed