दिव्यांग आरक्षण में फर्जी सर्टिफिकेट से नौकरी हासिल करने वालों की एसओजी जांच के बीच हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि एक बार विभागीय निर्देश पर दिव्यांगता का पुनर्मूल्यांकन हो जाने के बाद किसी व्यक्ति को बार-बार जांच के लिए बुलाना उचित नहीं है। जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह टिप्पणी कुलदीप चौधरी की याचिका को निस्तारित करते हुए की। अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPWD)-2016 के तहत सरकार का कर्तव्य है कि वह कानून का दुरुपयोग रोके। लेकिन अगर किसी व्यक्ति की विकलांगता का आकलन विभाग के निर्देश पर किया जाता है तो उसे बार-बार पुनर्मूल्यांकन के लिए उपस्थित होने को नहीं कहा जा सकता। सरकार को जांच के दौरान निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए। सरकार ने कहा- पुनर्मूल्यांकन से नहीं रोक सकते याचिकाकर्ता कुलदीप चौधरी के वकील मिर्जा फैसल बेग ने कोर्ट को बताया कि उनके क्लाइंट को ‘लो विजन’ कैटेगरी में 60% विकलांगता का प्रमाण-पत्र मिला था। विभागीय मेडिकल बोर्ड ने पुनर्मूल्यांकन कर इसे 40% से ज्यादा ही माना। लेकिन अब एक बार फिर से किसी शिकायत पर एसओजी ने उसे नोटिस जारी करके पुर्नमूल्यांकन के लिए उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। वहीं सरकार की ओर से कहा गया कि राज्य को याचिकाकर्ता द्वारा दावा की गई विकलांगता का दोबारा आकलन करने का पूरा अधिकार है। विभागीय अधिकार को किसी भी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। … यह खबर भी पढ़ें… राजस्थान लोक सेवा आयोग का स्टेनोग्राफर गिरफ्तार:फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र से तीन साल तक करता रहा नौकरी, RPSC ने दर्ज कराई थी FIR अजमेर की सिविल लाइंस थाना पुलिस ने राजस्थान लोक सेवा आयोग में कार्यरत स्टेनोग्राफर अरुण शर्मा को गिरफ्तार कर लिया। उसके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज था। आरोप है कि शर्मा ने 2018 की संयुक्त सीधी भर्ती परीक्षा में सरकारी नौकरी पाने के लिए फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र का इस्तेमाल किया था। आरोपी से पुलिस पूछताछ कर रही है। (पूरी खबर पढ़ें)
