थाईलैंड में डेटा एंट्री ऑपरेटर की मोटी तनख्वाह वाली नौकरी का झांसा दिया जाता है। फिर युवाओं को म्यांमार की सीमा पर अवैध साइबर कैंपों में ले जाते है। वहां उन्हें जबरन ऑनलाइन ठगी का काम करवाते है। मना करने पर इलेक्ट्रिक शॉक दिए जाते हैं। पीटा जाता है और कई बार जान से मारने की धमकी तक दी जाती है। यह खुलासा किया है झुंझुनूं जिले के पौंख गांव के अक्षय मीणा और मणकसास के शैलेष मीणा ने। दरअसल, दोनों भी उन्हीं 500 भारतीय युवाओं में शामिल रहे, जिन्हें शुक्रवार को केंद्र सरकार के प्रयासों से विशेष विमान द्वारा दिल्ली लाया गया। शनिवार को गुढ़ा गौड़जी पुलिस ने दोनों युवकों को उनके परिजनों को सौंप दिया। अब सिलसिलेवार पढ़िए पूरा मामला 1. टेलीग्राम पर लिंक मिला, फिर थाईलैंड बुलाया: अक्षय मीणा ने बताया- 3 महीने पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टेलीग्राम पर एक लिंक मिला। इसमें थाईलैंड में डाटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी और 80 हजार रुपए मासिक वेतन का ऑफर दिया गया था। लिंक पर क्लिक करने के बाद उनसे नाम, पासपोर्ट और अन्य जानकारी मांगी गई। कुछ दिन बाद गुजरात के एक एजेंट का कॉल आया। उसने कहा कि कंपनी वीजा, टिकट और रहने की पूरी व्यवस्था खुद करेगी, उन्हें बस काम करना है। अक्षय ने बताया- ऑफर सुनकर हमें भरोसा हो गया। अगस्त में हम दिल्ली से थाईलैंड के बैंकाक पहुंचे। वहां कंपनी के लोग हमें रिसीव करने आए और बोले- आपको दूसरे शहर ले जाया जा रहा है। लेकिन गाड़ी जंगल के रास्ते चली गई। कुछ देर बाद हमें एहसास हुआ कि यह कोई सामान्य यात्रा नहीं है। 2. रास्ते में मोबाइल छीन लिए, म्यांमार में ले गए: दोनों ने बताया- रास्ते में मोबाइल छीन लिए गए और बंदूकधारी गार्डों ने दोनों को एक ऊंची दीवारों वाले कम्पाउंड में पहुंचा दिया। वहां पहले से ही सैकड़ों युवा बंद थे। हमें बताया गया कि यह केके पार्क है, जो म्यांमार का इलाका है। यहां अब तुम्हें कंप्यूटर पर काम सीखना होगा। दोनों ने बताया कि उन्हें दिन-रात विदेशी नागरिकों से ऑनलाइन ठगी करवाने का दबाव बनाया गया। मना करने पर मारपीट और बिजली के झटके देकर टॉर्चर किया जाता था। पहले 10 दिन तक ट्रेनिंग दी गई। इसमें सिखाया गया कि कैसे विदेशी नागरिकों को चैटिंग एप्स पर फंसाना है, फिर फर्जी क्रिप्टो ट्रेडिंग वेबसाइट या निवेश स्कीम में उनका पैसा लगवाना है। बाद में बिटकॉइन अकाउंट हैक करके रकम निकाल ली जाती थी। 3. हर दिन 15 लाख ठगी करने का टारगेट, इनकार पर इलेक्ट्रिक शॉक दिए जाते: हर दिन 10 से 15 लाख रुपए की ठगी का टारगेट दिया जाता था। जो पूरा नहीं करता, उसे बिजली का झटका दिया जाता या खाना नहीं दिया जाता। कई बार तो हमें कमरे में बंद कर मारपीट की जाती। शैलेष ने बताया- हमारे सामने कई युवकों को टॉर्चर किया गया। एक युवक ने विरोध किया तो गार्ड ने राइफल की बट से मारा। वहां कोई सरकार नहीं है, सिर्फ हथियारबंद लोग हैं। वे बंदूक की नोक पर काम करवाते हैं। 4. बमबारी के बाद मची भगदड़, दीवार फांदकर भागे: करीब 15 दिन पहले म्यांमार की आर्मी ने उस इलाके में बमबारी की। केके पार्क में धमाकों के बाद भगदड़ मच गई। अक्षय बताते हैं- जब चारों ओर गोलीबारी हो रही थी, तभी हम दो साथी दीवार फांदकर बाहर निकल गए। कई युवक वहीं मारे गए या नदी में बह गए। हम जैसे-तैसे एक स्थानीय व्यक्ति की मदद से नदी पार कर थाईलैंड पहुंचे। उसे हमने जो कुछ बचा था, वो पैसा दे दिया। थाईलैंड पहुंचने के बाद दोनों सीधे भारतीय दूतावास गए और अपनी आपबीती बताई। वहां पहले से ही दर्जनों भारतीय मौजूद थे, जो उन्हीं अवैध कैंपों से भागकर आए थे। दूतावास ने तुरंत केंद्र सरकार से संपर्क किया। 5. विशेष विमान से 500 भारतीयों को भारत लाए
केंद्र सरकार ने थाईलैंड और म्यांमार प्रशासन के साथ समन्वय बनाते हुए रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। शुक्रवार को विशेष विमान से करीब 500 भारतीय युवाओं को दिल्ली लाया गया। इनमें झुंझुनूं जिले के अक्षय मीणा और शैलेष मीणा भी शामिल थे। दिल्ली से दोनों को जयपुर साइबर सेल को सौंपा गया, जहां से गुढ़ागौड़जी पुलिस ने उन्हें लेकर झुंझुनूं पहुंचाया। शनिवार को मेडिकल जांच के बाद परिजनों को सौंप दिया गया। गुढ़ा गौड़जी थाने के एसआई भीवा राम ने बताया- म्यांमार में फंसे 500 भारतीयों में झुंझुनूं जिले के दो युवक भी शामिल थे। गृह मंत्रालय के निर्देश पर उन्हें जयपुर से लाकर परिजनों को सुरक्षित सुपुर्द किया गया है। मिलते ही परिजन फूट-फूट कर रो पड़े: दो महीने की भयावह कैद के बाद जब अक्षय और शैलेष अपने गांव लौटे तो परिजन फूट-फूटकर रो पड़े। परिजनों ने कहा- उन्होंने बेटों से संपर्क टूटने के बाद समझ लिया था कि शायद वे लौट नहीं पाएंगे। शनिवार को जब पुलिस उन्हें लेकर पहुंची तो पूरे गांव के लोग इकट्ठा हो गए। अक्षय की मां ने कहा- हम रोज भगवान से प्रार्थना करते थे कि वो लौट आए। जब फोन बंद हुआ तो दिल बैठ गया था। शैलेष के पिता बोले- अब किसी एजेंट की बातों में आने से पहले सौ बार सोचेंगे। दोनों युवकों का कहना है कि वे अब गांव में ही रहकर काम करेंगे। अब दूसरों को भी बताएंगे कि विदेशी नौकरी के लालच में अपनी जान खतरे में न डालें। पहले पूरी जांच करें और सिर्फ सरकारी या मान्यता प्राप्त एजेंसियों के जरिए ही जाएं। म्यांमार में चीन समर्थित कंपनियों के साइबर कैंप
अक्षय और शैलेष ने बताया- चाइनीज कंपनियां इन साइबर कैंपों को चलाती हैं। उनके लिए मुख्य टारगेट अमेरिका और यूरोप के नागरिक होते हैं, जिनसे करोड़ों डॉलर की ऑनलाइन ठगी करवाई जाती है। हजारों भारतीय, नेपाली और फिलीपीनी युवक वहां जबरन काम कर रहे हैं। जो विरोध करता है, उसे या तो गोली मार दी जाती है या 5 लाख रुपए की फिरौती मांगते हैं। दोनों ने बताया कि म्यांमार के पूर्वी हिस्से में चीन की सीमा से सटे इलाके में केके पार्क, शेवी कोको और यताई न्यू सिटी जैसे इलाकों में ठगी के कैंप सक्रिय हैं। यहां कोई वैधानिक सरकार नहीं है, बल्कि स्थानीय सशस्त्र गिरोहों और माओवादियों का कब्जा है। साइबर एक्सपर्ट बोले- ट्रांसनेशनल साइबर क्राइम मॉडल
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार- यह एक नया ट्रांसनेशनल साइबर क्राइम मॉडल बन चुका है, जो एशिया के कई देशों में फैल रहा है। पहले चीन, वियतनाम और फिलीपींस में ऐसे कैंप चलते थे, अब म्यांमार इसका नया ठिकाना बन गया है। यहां स्थानीय मलेशियन और चीनी कंपनियों की मिलीभगत से पूरा नेटवर्क चल रहा है। ये कंपनियां सोशल मीडिया और जॉब पोर्टल्स पर आकर्षक ऑफर डालती हैं। लिंक पर क्लिक करने वाले युवाओं का डेटा पहले इकट्ठा किया जाता है, फिर एजेंटों के जरिए उन्हें फ्री वीजा और टिकट का झांसा देकर ले जाया जाता है। एक बार बॉर्डर पार करने के बाद उनसे पासपोर्ट छीन लिया जाता है और मजबूरन ठगी के धंधे में लगाया जाता है।