राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद (राजीविका) में करीब 15 हजार ग्राम संगठन बनाकर 5,259 करोड़ का स्टार्टअप फंड बनाया गया था। प्रोडक्ट ऑनलाइन बेचने की ट्रेनिंग के लिए 10 करोड़ का बजट अलग से रखा गया था। 3 साल बाद केवल 310 प्रोडक्ट राजसखी ब्रांड के नाम से ऑनलाइन लिस्टेड हो पाए हैं। उनमें भी सिर्फ 66 प्रोडक्ट ही बेचे जा रहे हैं। भास्कर ने जब भरतपुर के मल्लाह गांव में महिलाओं से बात की तो उन्होंने बताया कि राजीविका से जुड़े अधिकारी-कर्मचारी महीनों तक गांवों में पहुंचते ही नहीं हैं। पिछले एक साल से महिलाओं को पशुपालन, डेयरी, सिलाई जैसी कोई ट्रेनिंग तक नहीं दी गई है। सबसे पहले जानिए- क्या है योजना? राजीविका के तहत राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र की गरीब महिलाओं को रोजगार के लिए ट्रेनिंग दी जाती है। गांवों में महिलाओं के स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाए जाते हैं। इसके बाद समूहों को ब्याज मुक्त लोन उपलब्ध कराया जाता है। उन पैसों से उन्हें छोटे उद्योग, पशुपालन, डेयरी, सिलाई जैसे कार्यों की ट्रेनिंग मिलती है। राजीविका के अधिकारी स्वयं सहायता समूहों के जरिए यह ट्रेनिंग करवाते हैं। फिर उनके तैयार उत्पादों को ऑनलाइन और ऑफलाइन मार्केट से जोड़ा जाता है। प्रदेशभर में ऐसे 14,946 ग्राम संगठन बनाए गए थे। ब्याज मुक्त ऋण देने के लिए 5,259 करोड़ रुपए से अधिक का स्टार्टअप फंड दिया गया था। महिला SHG उत्पादों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग और ई-कॉमर्स सपोर्ट के लिए 10 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। Amazon पर इस ब्रांड के सिर्फ 66 ही लाइव हैं। वहीं, Flipkart पर भी केवल 70 प्रोडक्ट मौजूद हैं। सवाल यह है कि जब हजारों समूहों को फंड मिला, तो ऑनलाइन बाज़ार में गिनती के उत्पाद ही क्यों दिखाई दे रहे हैं? ऑफलाइन बाजार भी बदहाल ऑनलाइन के साथ-साथ ऑफलाइन मार्केटिंग की स्थिति भी कमजोर है। पूरे राजस्थान में महिला सेल्फ हेल्प ग्रुप (SHG) के लिए केवल 11 मार्केटिंग आउटलेट खोले गए हैं। कई जिलों में एक भी स्थायी SHG स्टोर नहीं है। ऐसे में उनके बने प्रोडक्ट स्थानीय मेलों या अस्थायी स्टॉल तक सीमित रह जाते हैं। 3 साल से ट्रेनिंग नहीं कराने का आरोप मल्लाह गांव की कांता (45) ने बताया कि- राजीविका की तरफ से न कोई मीटिंग हुई, न कोई ट्रेनिंग मिली। रोजगार के बारे में तो किसी ने कुछ बताया ही नहीं। बस पैसे जमा होते रहते हैं। जरूरत पड़ने पर उसी में से लोन ले लेते हैं और फिर किश्तों में भरते रहते हैं। वो हर महीने अपने स्वयं सहायता समूह (SHG) के लिए पैसे जमा करती हैं, लेकिन तीन साल बाद भी उन्हें यह नहीं पता कि यह समूह असल में बना क्यों था। कांता बताती हैं कि करीब तीन साल पहले भरतपुर शहर से दो युवतियां गांव आई थीं। उन्होंने कहा था- महिला स्वयं सहायता समूह बना रहे हैं, हर हफ्ते 20 रुपए जमा करने होंगे, आगे चलकर फायदा होगा। भरोसे में आकर गांव की कई महिलाएं जुड़ गईं। शुरुआत में साप्ताहिक जमा हुआ, फिर इसे मासिक कर दिया गया। लेकिन तीन साल बाद भी नहीं पता कि काम मिलेगा या नहीं। इस योजना में बने समूह से केवल नुकसान का दावा थोड़ी दूरी पर ही बैठी गांव की दूसरी महिला ओमवती बताती हैं- हमें कहा गया था कि 20 रुपए हर हफ्ते जमा करो, तभी फायदा होगा। इसलिए हम जुड़ गए। जरूरत पड़ने पर पैसा तो मिलता है, लेकिन तीन साल में सिर्फ दो बार ही मीटिंग हुई। उसके बाद कोई नहीं आया। ओमवती कहती हैं कि उन्हें इस समूह से कोई लाभ नहीं मिला, उल्टा नुकसान ही महसूस हुआ। अब बस यही सोचते हैं कि जो पैसे दिए हैं, वो वापस मिल जाएं, वही बहुत है। अगर रोजगार की ट्रेनिंग मिलती तो कुछ काम आ जाता, लेकिन यहां तो कोई बताने वाला ही नहीं है। मेला लगता है, ऐसा सुना है, पर हमें कभी कोई सूचना ही नहीं दी गई। न रोजगार मिला और न ही ट्रेनिंग- ग्रामीण राजनदेवी का अनुभव और भी गंभीर सवाल खड़े करता है। वह बताती हैं कि उनके समूह में दस महिलाएं हैं। न कोई रोजगार खुलवाया गया, न ट्रेनिंग दी गई। राजनदेवी के अनुसार, समूह में अगर कोई गड़बड़ी दिखे और महिलाएं हटना चाहें, तो उनसे जेब से पैसे भरने की बात कही जाती है। उन्होंने बताया कि समूह के जरिए एक लाख रुपए का लोन लिया गया, जिसे आपस में बांट दिया गया। मैंने 15 हजार रुपए लिए थे, दस महीने तक 1,650 रुपए महीना किश्त चुकाई। कोई रोजगार नहीं मिला हमें तो ना हमें आज तक कुछ बनाना सिखाया। सवालों के घेरे में राजीविका विभाग की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि महिला SHG को डिजिटल बाज़ार से जोड़ा गया, उत्पादों की ब्रांडिंग और पैकेजिंग सुधारी गई है। Amazon-Flipkart जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिक्री के लिए करार किए गए। राजसखी जैसे ब्रांड भी लॉन्च किए गए। लेकिन ग्रामीण इलाकों की ज्यादातर महिलाएं यह तक नहीं जानतीं कि उनके समूह का कोई ब्रांड है या उनके उत्पाद ऑनलाइन बेचे जा रहे हैं। कागजों में 31 हजार निष्क्रिय SHG राजीविका की 2025 की प्रगति रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2025 तक राजस्थान में करीब 4.05 लाख SHG पंजीकृत हैं। इनमें 18,120 समूह Defunct और 13,069 Dormant श्रेणी में दर्ज हैं। यानी कागज़ों में ही 31 हजार से ज्यादा ऐसे समूह हैं, जहां लेन-देन बंद या बेहद धीमा है। लेकिन मल्लाह गांव जैसी ज़मीनी हकीकत बताती है कि निष्क्रिय या नाममात्र सक्रिय समूहों की संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। अधिकारी बोले- जल्द ही परिणाम आएंगे सामने आनंद शर्मा ने बताया- हम ऑनलाइन पोर्टल और ऑनलाइन मार्केट पर काम कर रहे हैं और जल्द ही इसके परिणाम सामने आएंगे। ऑफलाइन कितने मार्ट संचालित हैं, इसकी सटीक संख्या फिलहाल मैं नहीं बता सकता। लेकिन हमारी ओर से पूरी कोशिश की जा रही है कि महिलाओं को रोजगार के साधन उपलब्ध कराए जाएं। यदि कोई स्वयं सहायता समूह निष्क्रिय है, तो उसकी भी पूरी जानकारी हमारे पास रहती है और उसकी नियमित मॉनिटरिंग की जाती है। राजीविका लगातार अच्छा काम कर रही है, यही वजह है कि आज हर गांव की महिलाएं जानती हैं कि राजीविका क्या है।
