नमस्कार सदन में सत्ता पक्ष के विधायकों के बार-बार खड़े होने पर कांग्रेस के सीनियर नेता ने ऐसे ‘रोग’ का जिक्र कर दिया, जिस पर ठहाके भी लगे और गुस्सा भी भड़का। बूंदी की हवा माननीयों के बयानों से गर्म है। रोजड़ा (नीलगाय), मदारी और चांदनी जैसे शब्दों की बौछार हुई। कोटपूतली में थ्रेसर-जेसीबी से चूरमा तैयार हुआ और जयपुर में गूगल मैप सड़क-सीढ़ी का अंतर नहीं कर पाया। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. राजेंद्र पारीक ने किया ‘रोग’ का जिक्र यह ‘रोग’ बालकों में अक्सर होता है। इस रोग के कारण बालक चिड़चिड़े हो जाते हैं। एक जगह बैठ नहीं पाते। एक हाथ खुजाने में व्यस्त रहता है। सदन में इस ‘रोग’ का अभिनव इस्तेमाल सीकर विधायक राजेंद्र पारीक ने किया। बूंदी विधायक हरिमोहन शर्मा मनरेगा के मुद्दे पर बात रख रहे थे। इस दौरान सत्ता पक्ष के विधायक बार-बार खड़े होकर विरोध कर रहे थे। गुस्से में हरिमोहन शर्मा ने कहा- चुप रहिए। उन्होंने बार-बार कहा- चुप रहिए, चुप रहिए, चुप रहिए। इसके बाद उनके पाले के सीनियर नेता राजेंद्र पारीक की आवाज आई। जिसका सार यह था कि दो-तीन माननीय की सीट साफ कराई जाए। क्योंकि उन्हें विशेष प्रकार के कीड़े काट रहे हैं। इस कारण वे हर दो मिनट में खड़े हो रहे हैं। अगर इन कीड़ों की काटने की बीमारी है तो माननीय दवा लें। बार-बार व्यवधान क्यों डाल रहे हैं। इनकी सीटें साफ कराई जाएं। यह सुनकर सदन में मिजी-जुली प्रतिक्रिया दिखी। कुछ माननीय जो ‘रोग’ के लक्षण-समाधान जानते थे, वे हंसने लगे। कुछ माननीयों को भाषा असंसदीय लगी, वो भाषा पर गौर करने की नसीहत देने लगे। 2. बूंदी की राजनीति में रोजड़े, मदारी और चांदनी हाड़ौती क्षेत्र के बूंदी में कांग्रेस के माननीय आपस में गुत्थम-गुत्था हैं। एक पक्ष के साथ BSS प्रमुख नरेश मीणा भी पूरा जोर लगाए हुए हैं। पूर्व मंत्री अशोक चांदना और नरेश मीणा के बीच 36 का आंकड़ा चल रहा है। नरेश मीणा को हाल ही कांग्रेस के हाथों अंता में पटखनी मिली। इस चुनाव में चांदना ने कांग्रेस की कमान संभाली थी। नरेश मीणा ने चांदना को टारगेट किया और अगला चुनाव चांदना के विधानसभा क्षेत्र हिंडौली से लड़ने का ऐलान कर दिया। ऐलान ही नहीं किया। पहुंच भी गए। सभा भी कर दी। सभा में भीड़ भी जुटा ली। चांदना ने कहा- गांव में मदारी आता है, भीड़ तो तब भी जुटती है। मदारी अगर सरपंच का चुनाव लड़े तो एक वोट नहीं मिलेगा। मेरे क्षेत्र में आने वालों की मैं गेंद बना दूंगा। फसल अच्छी हो तो रोजड़े (नीलगाय) आने लगी हैं। वो फसल को चौपट कर देती हैं। चांदना के बयान के बाद नरेश मीणा ने शब्दों की पावर दिखाई। सभा में कहा- ये रोजड़े अगर हिंडौली में घुस गए तो आपकी राजनीति चौपट कर देंगे। नरेश मीणा ने यह भी बताया कि अशोक चांदना के मुताबिक खेतो में 4 रोजड़े घुस रहे हैं- प्रभुलाल सैनी, धीरज गुर्जर, प्रहलाद गुंजल और नरेश मीणा। चांदना को लेकर धीरज गुर्जर ने भी ऐलान किया- मैंने कई ‘चांदनी’ रातों को अंधकार में बदलते देखा है। गौर करने वाली बात ये है कि यहां उन्होंने श्लेष अलंकार का खूबसूरत प्रयोग किया। 3. थ्रेसर-JCB से बनाया चूरमे का ‘पहाड़’ थ्रेसर के जरिए फसल से दाना निकाला जाता है। जेसीबी का इस्तेमाल निर्माण कार्य में किया जाता है। लेकिन छपाला भैरूंजी के आशीर्वाद से कोटपूतली के लोग इन संसाधनों का प्रयोग भोग-प्रसादी बनाने के लिए करते हैं। भैरूंजी का यह मेला अब जेसीबी-थ्रेसर से बनने वाले चूरमे के कारण प्रसिद्ध होता जा रहा है। मेले में आने वालों को प्रसादी के तौर पर चूरमा परोसने की परंपरा रही है। साल-दर-साल मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी। भैरूंजी की प्रसादी की मात्रा भी बढ़ती गई। मेला लक्खी हो गया तो प्रसादी भी मणों से क्विंटलों में बनने लगी। कुछ साल पहले चूरमा बनाने के लिए थ्रेसर का इस्तेमाल किया गया। इसके साथ ही चूरमे के पहाड़ में घी मिलाने के लिए जेसीबी मशीनों का प्रयोग शुरू हुआ। सोशल मीडिया में प्रसादी बनने के ये वीडियो आने लगे तो बात दूर तक फैली। अब वीडियो देख लोग अचंभा करते हैं कि यह क्या हो रहा है। चूरमा देख कई लोग सोचते हैं कि बजरी का पहाड़ है। पहाड़ पर मजदूर चढ़े हुए हैं। लेकिन नहीं। ये सभी हलवाई हैं, जो इस खास प्रसादी को तैयार करने में 30 दिन लगाते हैं। पिछले साल 551 क्विंटल चूरमा बना था। इस बार 651 क्विंटल बना है। जय हो भैरूंजी महाराज की। 4. चलते-चलते.. मोती डूंगरी के किले के नीचे पेड़ों का झुरमुट। झुरमुट के साथ लगी दीवार। दीवार के सहारे एक रास्ता जो मोती डूंगरी गणेश मंदिर की ओर से श्रद्धालुओं को बिड़ला मंदिर ले जाता है। रास्ते से लगकर एक बगीचा। बगीचे से साथ लगती सीढ़ियां जो JLN मार्ग पर सटे चौक तक पहुंचती हैं। इन्हीं सीढ़ियों पर दो नवयुवक बैठकर ‘मानवीय क्षमता और AI की संभावनाओं’ पर संवाद जैसा विवाद कर रहे थे। एक ने कहा- कंप्यूटर या AI मानवीय दिमाग की होड़ नहीं कर सकता। वह दुख पर कविता लिख सकता है लेकिन दुख पर दुखी नहीं हो सकता। दूसरा कहता है- इंसान हर काम में अपनी भावनाएं, कामचोरी और बेइमानी घुसा देता है। एक घंटे के काम को पांच घंटे में करता है। पैसा देख लालच कर सकता है, जबकि एप में ये गुंजाइश नहीं। पहले वाला फिर कहता है- मशीन वही काम करेगी जो उसमें फीड होगी, उतनी ही जानकारी देगी जितना उसमें डाटा होगा। इंसान की संभावनाएं अनंत हैं। दिमाग बहुत जीनियस है और रहेगा। दूसरे वाला फिर कहता है-स्मार्ट फोन, एप और AI ने जीवन को आसान बनाया है। मान लो तुम इस शहर में नए हो। तुम्हें गणगौरी बाजार जाना है। किसी ने पूछने की जरूरत नहीं। गूगल मैप तुम्हें चट-पट पहुंचा देगा। इतने में एक कार लहराते हुए तेज गति से सीढ़ियों की तरफ आई। दोनों युवकों ने छलांग लगाकर जान बचाई। कार सीढ़ियों पर उतरकर रुक गई। भीड़ जुट गई। कार से निकले युवक ने कहा- सॉरी, जेएलएन मार्ग पर जाने के लिए गूगल मैप यही रास्ता बता रहा था। वहां मौजूद पुलिसवाला चिल्लाया-अरे, खुद की अक्ल तो लगा लेता भले आदमी। (इनपुट सहयोग- धर्मसिंह यादव (कोटपूतली), मुकेश नागर (बूंदी), महेंद्र सैनी (जयपुर)) वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी…
