नमस्कार शिक्षा मंत्रीजी फिर ‘जेल’ की बात छेड़ी तो पीसीसी चीफ साहब ने भी भविष्यवाणी कर दी-‘जेल में आपसे मिलने आऊंगा’। उदयपुर में राजनीति विज्ञान से MA करने वाले विधायकजी से पत्रकार ने MLA की फुलफॉर्म पूछ ली। नागौर में पूर्व विधायक ने शोकसभा में गीत गाकर नेताजी को भावुक कर दिया और छोटे बच्चे ने ‘मोरू’ के जरिए दिया बड़ा मैसेज। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. मंत्री-PCC चीफ ने की ‘जेल’ वाली बात ईरान-अमेरिका की जंग का तो पता नहीं, लेकिन दिलावर और डोटासरा के बीच भयंकर शीतयुद्ध लंबे काल से चल रहा है। परिसीमन को लेकर पीसीसी चीफ ने सवाल उठाए थे। इस पर शिक्षा मंत्री दिलावर जी ने कोटा में यह भविष्यवाणी कर दी कि बहुत जल्द डोटासरा जेल में होंगे। उन्होंने कहा- उल्टा चोर कोतवाल को डांटे। कांग्रेस ने अपने राज में परिसीमन में खूब गड़बड़ की। जहां उन्हें वोट मिल सकते थे वो वार्ड छोटे कर दिए। हमारे वार्ड बड़े कर दिए ताकि हम जीत न पाएं। ये बेइमानी हम नहीं करते। हमारे राज में सिर्फ सही काम होता है। परिसीमन की बात के बीच ही मंत्रीजी ने मुद्दा एजुकेशन की तरफ मोड़ा। कहा- आपको बताऊं डोटासरा जी, आप जेल के बाहर नहीं रहने वाले। 2018 की भर्ती में आपने गड़बड़ की थी। सारी पोल खुल रही है। एसओजी आपके गुर्गे पकड़ रही है। अब वो दिन दूर नहीं जब आप जेल में होंगे। चुनाव की क्या चिंता? रिजल्ट तो आप जेल से ही सुनेंगे। आपके मित्र जिन्होंने पीएचईडी में करोड़ों का घोटाला किया, उन्हें जेल हुई। ऐसे ही आप भी जेल में रहने वाले हैं। इसके बाद बारी आई पीसीसी चीफ की। उन्होंने जवाबी हमला किया। मंत्रीजी को ‘भला मानुष’ कहते हुए बोले- मेरे दादाजी कहते थे कीचड़ में पत्थर मत फेंकना। छींटे तुम्हीं पर पड़ेंगे। मंत्रीजी में दम है तो चोर, पेपर माफिया, अपराधी और बेइमानों को पकड़ें। बल्कि खुद पर जो मुकदमे हैं, उनमें जमानत करा लें। क्योंकि पौने तीन साल बाद कांग्रेस की सरकार आ रही है। मदन दिलावर जी से जेल में मिलने मैं जाऊंगा। बाकी गोविंद सिंह डोटासरा यहीं रहेगा, कहीं नहीं जाएगा। 2. MLA की फुलफॉर्म जनसेवा इससे क्या फर्क पड़ता है कि आपको कितना ज्ञान है। बात तो तब है जब आप लोगों की सेवा करें। अच्छाई-नेकी करें। सद्भावना और इंसानियत दिखाएं। आर्थिक दशा खराब होने के कारण उन्होंने 15 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी थी। ऊपरवाले की मेहरबानी हुई और राजनीति में चमक गए। बेटियां बड़ी हुईं तो उन्होंने पिता को दोबारा पढ़ाई वहीं से शुरू करने के लिए प्रेरित किया जहां से पढ़ाई छूटी थी। नेताजी विधायक बन चुके थे। बेटियों की मनुहार के आगे झुक गए। 55 साल की उम्र में 10वीं का एग्जाम दिया। पास हो गए। फिर तो ऐसी अलख जगी कि हर साल एग्जाम देने लगे। 67 साल की उम्र होते-होते राजनीति विज्ञान से एमए पास कर ली। उनकी पढ़ाई की परीक्षा लेने एक पत्रकार विधायकजी के पास पहुंचीं। कहा- अब तो MA कर चुके हैं, जरा MLA की फुलफॉर्म बताइये। सवाल संदर्भ का तो था, लेकिन आउट ऑफ सिलेबस। घुमा-फिराकर विधायकजी ने सरलता से कहा- जनता की सेवा करना ही MLA के लिए सब कुछ है। कुल मिलाकर विधायकजी जनता के काम करते हैं। जनता उन्हें पसंद करती है। तीन बार विधायकी का चुनाव जिता चुकी है। इस उम्र में पढ़ाई ही नहीं, डांस भी करते हैं। क्रिकेट खेलते हैं तो शानदार शॉट्स लगाते हैं। नेताजी खुद ‘फुल फॉर्म’ में हैं। तो परिभाषा का क्या अचार डालना है? 3. पूर्व विधायक ने गीत गाकर दी श्रद्धांजलि पूर्व विधायकजी गाने के शौकीन हैं। गीत वही जो दिल की गहराइयों को छू ले। आदमी दुख में हो तो गीत का असर बढ़ जाता है। नागौर के दिग्गज नेता पीरू सिंह जी नहीं रहे। उनके बेटे भंवर सिंह पलाड़ा भी सीनियर नेता। भंवर सिंह को दिलासा देने कई मंत्री, दोनों डिप्टी सीएम, कई विधायक, पूर्व विधायक शोकसभा में पहुंचे और सांत्वना दी। गायकी के शौकीन पूर्व विधायकजी भी श्रद्धांजलि देने पहुंचे। शोकसभा में भंवर सिंह जी को पूर्व सांसद सुमेधानंद सरस्वती दिलासा दे रहे थे। पूर्व विधायकजी ने भी संबल दिया। कुछ देर बातें की। माहौल गमगीन था। जीवन के क्षणभंगुर होने के चर्चे चल रहे थे। इस अवसर पर पूर्व विधायकजी ने एक गीत सुनाने की बात छेड़ी। उन्होंने वहां एक थाली को उल्टा कर उसकी ढपली बनाई और गाने लगे- क्या ले के आया बंदे, क्या ले के जाएगा
दो दिन की जिंदगी है, दो दिन का मेला
इस जगत सराय में रहना है दो दिन का,
क्यों व्यर्थ करे मरोड़ तू इस धन और जोबन का
नहीं है भरोसा पल का, कल मर जाएगा
दो दिन की जिंदगी है दो दिन का मेला 4. बच्चे ने ‘मोरू’ के जरिए दिया संदेश किसी शहर के किसी पॉश एरिया में किसी पूरी तरह वातानुकूलित इमारत में किसी राष्ट्रीय स्तर की संस्था ने पर्यावरण से जुड़े किसी विषय पर देशभर के पर्यावरणविदों को बुलाया। अपने NGO को मोटी रकम मिलने का सपना देखते हुए एक सज्जन बड़ी स्क्रीन पर स्लाइड शो दिखाकर दावा करते हैं कि यही है पर्यावरण को बचाने की सही तरकीब। जिस पर समोसा-चिप्स खाते हुए बाकी के लोग बुझा सा रिएक्शन देते हैं। एक- दुनियाभर में ग्लोबल वार्मिंग की बात करता है। दूसरा- दिल्ली के AQI पर दीपावली को दोष देता है। तीसरा- नए गारे गढ़कर हर दीवार पोतने का आइडिया देता है। चौथा- सूखी नदियों के कैचमेंट एरिया में बनी गननचुंबी इमारतें ढहाने का सुझाव देता है। पांचवां- हरे पेड़ काटकर सोलर प्लांट लगाने पर रोने लगता है। छठा- पहाड़ काटकर मेगा हाईवे और सुरंगें निकालने पर छाती पीटता है। सातवें-आठवें-नौवें के बीच समोसे के आकार और प्रति प्लेट चिप्स की संख्या को लेकर बहस छिड़ी है। इसी हॉल की खिड़की से सैकड़ों किलोमीटर दूर किसी गांव की किसी ढाणी के किसी छप्परपोश घर के बाहर चबूतरे पर कोई बच्चा कटोरी में मक्का के दाने लेकर बैठा है। बच्चा भाषा की बोलियों की किसी उपबोली में मोर को प्यार से ‘मोरू’ कहकर बुलाता है। मोर बेझिझक आता है। बच्चे की कटोरी में भरा मक्का ‘टक-टक’ करके खाता है। बच्चा खुशी से झूमकर कहता है-‘मोरू मेरे साथ खाना खाता है।’ कटोरी खाली होने के बाद मोर पेड़ों की झुरमुट की ओर चला जाता है। उधर, शहर में मुद्दे को हल होने की कगार तक पहुंचाकर पर्यावरण संरक्षण की सेमिनार खत्म हुई। दूर से आए पर्यावरणविद यह चिंता करते हुए लंबे डग भरते हुए मुख्य कक्ष की ओर चले कि भोजन में क्या होगा? (इनपुट सहयोग- शक्ति सिंह (कोटा), अनूप पाराशर (उदयपुर)।) वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार को मुलाकात होगी…