मुझे सिर्फ 25 प्रतिशत ही दिखाई देता है। बचपन से लोग मुझे ‘अंधा-अंधा’ कहकर चिढ़ाते थे। नॉर्मल स्कूल में पढ़ने जाता था, तो ब्लैक बोर्ड के बिल्कुल पास खड़ा होकर ही टीचर जो लिखते थे, वो पढ़ पाता था। कबड्डी खेलने जाता तो सब ताना मारते थे कि दिखता नहीं, तो खेलेगा कैसे? लेकिन मैंने हार नहीं मानी। यह कहना है जोधपुर आंगन ब्लाइंड स्कूल से कबड्डी खेलने आए बिरदा राम जाट (16) का। वे सोमवार को ब्लाइंड स्टूडेंट्स की राज्य स्तरीय कबड्डी प्रतियोगिता का फाइनल मैच खेलने आए थे। मुकाबले में जोधपुर आंगन ब्लाइंड स्कूल की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए उदयपुर टीम को हराकर ट्रॉफी अपने नाम कर ली। जीत के बाद बिरदा राम की आंखों में खुशी साफ झलक रही थी। उन्होंने कहा कि ये जीत सिर्फ मेरे लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए है जो खुद को कमजोर समझते हैं। बिरदा राम ने बताया कि शुरुआत में लोगों की बातों से मन टूट जाता था, लेकिन परिवार और शिक्षकों ने हमेशा हौसला बढ़ाया। अब उनका सपना है कि वे आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करें। 25 प्रतिशत ही है नजर की रोशनी नागौर जिले के रहने वाले बिरदा राम बचपन से सिर्फ 25 प्रतिशत ही देख पाते हैं। आंखों की कमजोरी के कारण उन्हें हमेशा लोगों के ताने सुनने पड़ते थे, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनके परिवार की स्थिति भी आसान नहीं रही। मां भी केवल 10 प्रतिशत ही देख पाती हैं और साल 2020 में पिता कानाराम का एक हादसे में हाथ कट गया, जिससे वे भी दिव्यांग हो गए। मुश्किल हालातों में भी नहीं टूटा हौसला बिरदा बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही कबड्डी खेलने का बहुत शौक था, लेकिन जब भी मैदान में उतरते तो लोग उनका मज़ाक उड़ाते और कहते कि “दिखता नहीं है, खेलने आया है।” इन बातों से दुख तो होता था, लेकिन उन्होंने इन्हें अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। 6वीं क्लास तक उन्होंने नागौर में ही पढ़ाई की। इस दौरान उनके टीचर सुजीत सर ने उन्हें समझाया कि उन्हें जोधपुर ब्लाइंड स्कूल में पढ़ना चाहिए, जहां उनकी प्रतिभा को सही दिशा मिल सके। जोधपुर ब्लाइंड स्कूल से हुई नई शुरुआत सुजीत सर की सलाह मानकर बिरदा राम ने 7वीं क्लास में जोधपुर ब्लाइंड स्कूल में एडमिशन लिया। यहां पहुंचकर उनकी जिंदगी बदल गई। स्कूल ने न केवल उन्हें आत्मनिर्भर बनना सिखाया, बल्कि उनके खेल के सपनों को भी नई उड़ान दी। उनके माता-पिता ने भी हर कदम पर उन्हें हिम्मत दी। पिता हमेशा कहते थे कि “तू काबिल है, तुझे कबड्डी खेलनी चाहिए।” कबड्डी में लहराया जीत का परचम बिरदा राम ने अपने खेल से यह साबित कर दिया कि हौसला हो तो कोई कमी रास्ता नहीं रोक सकती। उन्होंने जिला स्तर पर सिल्वर मेडल जीता, स्टेट लेवल पर तीन गोल्ड और एक सिल्वर जीता, जबकि नेशनल लेवल पर गोल्ड, सिल्वर और ब्रोन्ज मेडल हासिल किए। अब पैरा ओलिंपिक में भारत को दिलाना है गौरव बिरदा राम का सपना अब भारत का नाम दुनिया में रोशन करना है। वे पैरा ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं। बिरदा कहते हैं- मैं चाहता हूं कि मेरी जीत से ऐसे सभी लोग प्रेरित हों, जो खुद को कमजोर समझते हैं। अगर हम ठान लें, तो अंधकार में भी अपनी रोशनी ढूंढ सकते हैं।