कैंसर जैसी नामुराद बीमारी के शिकार डॉक्टर भी हो रहे हैं। जो डॉक्टर दिन-रात मरीजों की जिंदगी बचाने में लगे रहते हैं, एक दिन उनका ही इलाज अपने साथी डॉक्टरों के हाथ से होता है। भास्कर विशेष सीरीज में आज दो उन लेडी डॉक्टरों की कहानी… जिन्हें कैंसर रोगियों के बीच ड्यूटी करते हुए यह बीमारी हुई। कैसे वे फोर्थ स्टेज में पहुंचीं..फिर इस बीमारी को हराकर दोबारा मरीजों की जिंदगी बचाने के लिए एक नई जंग में उतरी हैं। ये डॉक्टर कैंसर रोगियों के दर्द को जानती हैं; कहती हैं- यह संक्रामक नहीं, किसी को भी हो सकता है डॉ. आकांक्षा दत्त। दो दशक से कैंसर मरीजों के इलाज से जुड़ी हैं। 2020 में उन्हें कैंसर का पता चला। चौथे स्टेज में ब्लड कैंसर को मात देकर अब फिर ऑनड्यूटी हैं। बीएमसीएचआरसी में सीनियर एनेस्थीसियोलॉजिस्ट हैं। करीब दस हजार कैंसर रोगियों को एनेस्थिसिया दे चुकी हैं। वे बताती हैं- अब जब किसी मरीज से मिलती हूं तो उसके मन का डर और असमंजस समझती हूं। एक डॉक्टर होने के नाते मैंने सिर्फ इलाज पर ध्यान दिया। मुझे बीमारी के लक्षण पहले ही दिखाई देने लगे थे, लेकिन गंभीर रोग की कल्पना नहीं की थी। शुरुआत में मेरा टीबी का इलाज हुआ। कई महीनों बाद पता चला कि कैंसर है। इलाज का कठिन दौर पूरा हुआ। आज स्वस्थ हूं। बीमारी के दौरान बेटियों की चिंता थी। उनकी खुशी के लिए मैं दुबारा से उठ खड़ी हुई। डॉ. श्रुति सिंघल। ब्लड कैंसर होने के बाद जुड़वां बेटियों को जन्म दिया। डिलीवरी के बाद ठीक हो गईं। श्रुति एनेस्थिसिया की सीनियर कंसलटेंट हैं। वह बताती हैं कि साल 2020 में कैंसर का पता चला। दो साल दिल्ली और जयपुर में इलाज चला। अब ठीक हूं। 2023 में गर्भ के पांचवें माह में दोबारा कैंसर डायग्नोस हुआ। डॉक्टरों ने गर्भ गिराने की सलाह दी। पति डॉ. गौरव से सलाह के बाद हमने डिलीवरी चुनी। जुड़वां बेटियों को जन्म दिया। डिलीवरी के दौरान हार्मोनल चेंजेज से कैंसर खत्म हो गया। हालांकि जुड़वां बेटियों में से एक का तीन माह बाद ही निधन हो गया। दूसरी बेटी गर्विता स्वस्थ है। 5 जनवरी को उसका जन्मदिन है। डॉ. श्रुति कहती हैं- कैसर ही नहीं, किसी भी बीमारी में आप तब तक नहीं हारते जब तक दिल से हार नहीं मान लेते।
