देशभर में LPG सिलेंडर को लेकर जगह-जगह लंबी लाइनें लगी हुई हैं। वहीं, राजस्थान में एक ऐसा गांव है, जहां इस किल्लत का कोई असर नहीं है। ये है भीलवाड़ा की आसींद तहसील का गांव मोतीपुर। यहां के 120 परिवारों के पास घरेलू गैस के संकट से निपटने का एक नायाब बायोगैस मॉडल है। पूरे गांव वाले बिना किसी रोकटोक या कंजूसी के गैस इस्तेमाल कर रहे हैं। यहां न सिलेंडर खत्म होने का डर है न बुकिंग का कोई झंझट। आत्मनिर्भरता के इस मॉडल को जानने के लिए भास्कर टीम मोतीपुर पहुंची। पढ़िए ये रिपोर्ट.… ज्यादातर के पास पर्सनल बायोगैस प्लांट गांव में दाखिल होते ही गोपाल गोस्वामी (55) मिले। उन्होंने बताया- हमारी मोतीपुर पंचायत में करीब 200 परिवार हैं। लेकिन यहां घरों के बाहर बाड़ों में सबके पर्सनल बायोगैस प्लांट लगे हैं। घर में बायो गैस प्लांट लगाए हुए आज 3 साल से भी ज्यादा हो गए। इस दौरान एक भी एलपीजी सिलेंडर घर लाने की जरूरत नहीं पड़ी। परिवार का खाना बनाना हो, पानी गर्म करना हो या दुधारू जानवरों के लिए पशु आहार बनाना हो, सारे काम इस प्लांट की मदद से हो जाते हैं। कभी-कभी इतनी गैस बनती हैं कि चाहें तो पड़ोसी को भी इसकी सप्लाई कर सकते हैं। मेहमान आ जाए या घर में कोई बड़ा फंक्शन हो, तब भी LPG सिलेंडर की जरूरत नहीं पड़ती। गोपाल ने बताया- सरकार की मदद से ये गोबर गैस प्लांट लगाए हैं, ये हम किसानों के लिए बहुत ही फायदेमंद हैं। गैस के अलावा इससे खाद भी बनती है, जो खेतों में फसलों के लिए बहुत ही बेहतरीन और उत्पादन बढ़ाने वाली होती है। इस खाद से फसलों में कोई रोग भी नहीं लगता है। LPG सिलेंडर से तेज आंच, चुटकियों में बन गई चाय गोपाल गोस्वामी ने हमें चाय ऑफर की तो हम पूरी प्रोसेस समझने के लिए उनकी रसोई तक गए, क्योंकि आमतौर पर गौबर गैस को लेकर ये सवाल हमारे मन में थे कि प्रेशर कम आता होगा? खाना देर से पकता होगा? रसोई संभाल रही उनकी बेटी किरण गोस्वामी ने बताया कि बायो गैस प्लांट का कनेक्शन पाइप के जरिए चूल्हे से किया गया है। ये गैस सिलेंडर में स्टोर नहीं होती। बस पाइप पर लगे वॉल्व को ही रेग्यूलेटर की तरह ऑन-ऑफ करना होता है। किरण ने स्विच ऑन किया और बर्नर के पास माचिस की तिली को जला कर लगाया। बिल्कुल एलपीजी चूल्हे की तरह बर्नर में से आंच बाहर आने लगी। ये LPG सिलेंडर से तो कहीं तेज आंच थी। किरण ने अपना अनुभव शेयर करते हुए बताया कि इस पर खाना बहुत जल्दी तैयार होता है। उन्होंने उसी गैस पर चाय तैयार की जो बहुत ही जल्द तैयार हो गई। 3 पार्ट में बना प्लांट, सरस डेयरी करती है ऑपरेट गोपाल गोस्वामी का बेटे हेमराज गोस्वामी ने बताया कि 18×8 स्क्वायर फीट जगह में इसका सेटअप तैयार हुआ है। इसी दौरान भीलवाड़ा जिला सरस डेयरी के वरिष्ठ सहायक संदीप दाधीच भी पहुंच गए। उन्होंने बताया कि पूरे गांव में जितने भी प्लांट लगे हैं, उसे सरस डेयरी ही ऑपरेट करवा रही है। भीलवाड़ा जिला सरस डेयरी ने किसानों से बायो गैस प्लांट के वेस्ट को खरीदकर जैविक खाद को बनाने के लिए प्लांट लगा रखे हैं। दरअसल, प्लास्टिक के गुब्बारे में गोबर का घोल जमीन और बाहरी वातावरण के टेंपरेचर से गर्मी लेकर के गैस बनाता है। यहीं गैस पाइप से चूल्हे तक पहुंचती है। गुब्बारे में ज्यादा गैस जमा होने पर ऑटोमेटिक ओवरफ्लो के जरिए बाहर निकाल दी जाती है। दाधीच ने दावा किया कि ये सब कुछ शत प्रतिशत सुरक्षित होता है। हवा में ओवर फ्लो होकर निकलने वाली गैस हल्की होने से आग भी नहीं पकड़ती है। एक बार सुबह गोबर डालने के बाद दिन भर में करीब तीन किलो गैस का उत्पादन हो जाता है। घोल से जब पूरी गैस बन जाती है तो ये वेस्ट आउटपुट पाइप के जरिए वेस्ट टेंक में गिरता रहता है। वेस्ट टैंक पूरी तरह भरने पर डेयरी प्लांट के कर्मचारी को सूचना दी जाती है। इसके गोबर का टैंकर में भरकर डेयरी के प्लांट पर ले जाया जाता है। 4 साल से घर में नहीं आया LPG सिलेंडर, कचरे से भी कमाई बायो गैस प्लांट के सफल संचालन और बेहतर रखरखाव के चलते ग्रामीण रतन सिंह को कई बार सम्मानित किया जा चुका है। हम उनके घर पहुंचे। उनकी बेटी चित्रा कंवर राठौड़ से मुलाकात हुई। उन्होंने घर में लगे बायो गैस प्लांट को दिखाते हुए बताया- इस गुब्बारे का फुलाव ही ये बताने के लिए काफी है कि ये कितनी मात्रा में गैस बना रहा है। इसमें हम रोजाना एक बड़ी तगारी गोबर और एक बाल्टी पानी डालते हैं। सर्दियों में पूरे परिवार के नहाने लायक पानी भी इस पर आसानी से गर्म हो जाता है। चित्रा बताती हैं, प्लांट लगने के बाद से हमारे घर में पिछले 4 साल से LPG का एक भी सिलेंडर नहीं आया है। फिर जो वेस्ट मेटेरियल होता है इसका भी 75 पैसे प्रति किलो के हिसाब से पेमेंट मिलता है। जैविक खाद के लिए खेतों में डायरेक्ट पहुंचाते हैं गोबर किसान देवराज जाट के पास 10-12 गायें हैं। वे बताते हैं- हमारे पास गोबर ज्यादा होता है। बायोगैस प्लांट में एक दिन में 10 -15 किलो ही इस्तेमाल कर पाते हैं। एक्स्ट्रा गोबर से जैविक खाद बनाने के लिए उसे एक नाली के जरिए डायरेक्ट खेतों में पहुंचाते हैं। बायो गैस प्लांट के कारण हमारे घर में ईंधन की सभी समस्याएं ही खत्म हो गई हैं। गांव के ही ओमप्रकाश जाट बताते हैं- हमें आत्मनिर्भर बनाने के पीछे पूर्व मंत्री रामलाल जाट और भीलवाड़ा की सरस डेयरी की एडवांस्ड विजनरी सोच है। करीब 4 साल पहले पूर्व मंत्री जाट जब डेयरी चेयरमैन थे, तब उन्होंने गांव में लोगों को सब्सिडी से अपने घरों में बायो गैस प्लांट लगाने के लिए राजी किया। दरअसल, एक बायो गैस प्लांट लगाने का खर्च 40 हजार रुपए था। इसमें 30 हजार रुपए की सब्सिडी मिल गई, वहीं बाकी के 10 हजार रुपए भी हजार रुपए महीना किस्त से लिए गए। इस स्कीम में तब करीब 120 ग्रामीणों के यहां ये बायो गैस प्लांट लगे हैं। जैविक खाद के लिए आधुनिक प्लांट बायो गैस प्लांट से निकलने वाले वेस्ट से जैविक खाद बनाने के लिए गांव की डेयरी सहकारी समिति ने सरकार से करीब दो हैक्टेयर जमीन को 99 साल की लीज पर लिया। इसके लिए सभी रकम सोसाइटी ने दी। इसके बाद भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड से फंड के जरिए जैविक खाद प्लांट यहां लगाया गया। अब इस प्लांट से गांव के 5 लोगों को रोजगार भी मिला है। गांव का एक ट्रेक्टर भी कॉन्ट्रैक्ट पर लगा हुआ है। जिला कलेक्टर और संभागीय आयुक्त ने भी यहां दो-तीन बार दौरा किया है। भीलवाड़ा डेयरी के वरिष्ठ सहायक संदीप दाधीच ने बताया कि बायो वेस्ट से जैविक खाद बनाने का प्लांट पूरी तरह से साइंटिफिक है। आधुनिक मशीनों से जैविक खाद तैयार पैकिंग की जाती है। मार्केट में इस जैविक खाद का 25 किलो का एक बैग 375 रुपए के हिसाब से बेचा जाता है। इस जैविक खाद की डिमांड भी अच्छी है।
