जिले में इस बार खरीफ की फसल की सरकारी खरीद में हुई देरी किसानों के लिए ‘कोढ़ में खाज’ साबित हुई है। जब किसानों को रबी की बुवाई और पारिवारिक आयोजनों के लिए नकदी की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब सरकारी खरीद केंद्र बंद पड़े थे। नतीजा यह हुआ कि जिले के लगभग 45 प्रतिशत से ज्यादा किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ लेने से वंचित रह गए और उन्हें अपनी मेहनत की उपज खुले बाजार में कम दामों पर बेचनी पड़ी। 8
जिले के पंजीकृत 7805 किसानों में से करीब 3248 किसान खरीद केंद्रों पर नहीं पहुंचे हैं। वजह साफ है—उनके पास अब बेचने के लिए फसल बची ही नहीं है। पहले ही अपनी फसल बेच चुके थे।
समय पर नहीं खुले कांटे, बाजार की मंदी ने तोड़ी कमर खरीद प्रक्रिया 1 नवंबर से शुरू होनी चाहिए थी, लेकिन नवंबर के लास्ट तक खरीद शुरू नहीं हुई। अक्टूबर और नवंबर के महीनों में जब किसान अपनी फसल लेकर मंडी पहुंचा, तो वहां भावों में भारी मंदी थी। सरकारी कांटों के इंतजार में किसान ज्यादा दिन रुक नहीं सके, क्योंकि सिर पर अगली फसल (रबी) की बुवाई का खर्च और शादियों का सीजन खड़ा था।
मजबूरी की मार, हजारों का नुकसान
किसानों के केंद्रों पर न पहुंचने की पड़ताल की गई तो दर्द छलक उठा। आर्थिक तंगी ने उन्हें सरकार का इंतजार करने की मोहलत ही नहीं दी। रामस्वरूप मीणा (किसान): “मैंने 10 क्विंटल मूंगफली की पैदावार की थी। रबी की बुवाई के लिए खाद-बीज का इंतजाम करना था। सरकारी खरीद शुरू नहीं हुई तो मजबूरन 5000 रुपये प्रति क्विंटल में फसल बेचनी पड़ी, जबकि MSP 7263 रुपये था। प्रति क्विंटल 2263 रुपये का सीधा घाटा हुआ। राजेश कुमार (किसान): “घर में मायरा (शादी का शगुन) भरना था। पैसों की सख्त जरूरत थी, इसलिए 7200 रुपये के भाव में मूंग बेचना पड़ा। सरकार ने मूंग का भाव 8769 रुपये तय किया है, लेकिन देरी की वजह से मुझे प्रति क्विंटल करीब 1600 रुपये से ज्यादा का नुकसान झेलना पड़ा। समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए पंजीकरण का लक्ष्य तो पूरा हो गया था, लेकिन बार-बार सूचना देने के बाद भी कई किसान अपनी उपज लेकर नहीं आ रहे हैं। हमने सभी पंजीकृत किसानों को सूचित करने के प्रयास किए हैं। विभा खेतान, उप रजिस्ट्रार (सहकारी समितियां)
पंजीकरण और खरीद कुल पंजीकृत किसान 7,805 लाभ उठाने वाले किसान 4,567 वंचित/अनुपस्थित किसान 3,248 कुल खरीदी गई मूंग 93,844 क्विंटल कुल खरीदी गई मूंगफली 37,397 क्विंटल
