अजमेर की महिला उत्पीड़न कोर्ट ने चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन पर एक साल पहले मां-बेटी पर तेजाब से हमला करने वाले आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। तेजाब के हमले से 12 साल की बच्ची की एक आंख की रोशनी चली गई और दूसरी आंख से कम दिखाई देता है। कोर्ट ने आरोपी पर 2 लाख का जुर्माना भी लगाया है। जज उत्तमा माथुर ने टिप्पणी करते हुए कहा- तेजाब का हमला शरीर को ही नहीं जलाता, पीड़ित के भविष्य, सपनों और परिवार को भी जला देता है। अब सिलसलिवार पढ़ें पूरा मामला… सरकारी एडवोकेट नरेश कुमार धूत ने बताया- मध्य प्रदेश की रहने वाली एक महिला अपनी 12 साल की बेटी और परिवार के साथ धार्मिक यात्रा पर आई थी। 25 अप्रैल 2025 को अजमेर से चित्तौड़गढ़ पहुंचकर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 4 पर सभी रुके हुए थे। 26 अप्रैल की सुबह मां-बेटी टॉयलेट के लिए प्लेटफार्म नंबर-एक से आगे लगभग 200 मीटर दूर पटरी के पास झाड़ियों में गई थी। सरकारी वकील ने बताया- इसी दौरान आरोपी मोहम्मद इस्माइल वहां पहुंचा। आरोपी को अपनी ओर बढ़ता देखकर बच्ची ने उसे रोका। तभी आरोपी ने बोतल में रखा तेजाब निकालकर नाबालिग के चेहरे पर फेंक दिया। बच्ची की मां पकड़ने के लिए भागी तो उस पर भी तेजाब फेंककर बस स्टैंड की ओर भाग गया। दोनों मां-बेटी को चित्तौड़गढ़ के अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। मामले में जीआरपी थाना पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया था। सीसीटीवी चेक करते हुए आरोपी की पहचान कर पुलिस ने मध्य प्रदेश के इंदौर के रहने वाले आरोपी मोहम्मद इस्माइल को गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस की ओर से कोर्ट में चालान पेश किया गया था। इसके बाद कोर्ट में ट्रायल शुरू हुई थी। आरोपी को आजीवन कारावास की हुई सजा सरकारी वकील नरेश कुमार ने बताया- अजमेर की महिला उत्पीड़न कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। अभियोजन पक्ष की ओर से 17 गवाह और 57 दस्तावेज पेश किए गए थे। इस पर जज उत्तमा माथुर ने आरोपी मोहम्मद इस्माइल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। आरोपी पर 2 लाख का जुर्माना भी लगाया है। इसके साथ कोर्ट ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण चित्तौड़गढ़ को पीड़ित पक्ष को एक-एक लाख रुपए आर्थिक सहायता देने की अनुशंसा की। सुप्रीम कोर्ट के केस का दिया हवाला जज उत्तमा माथुर ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के एक केस का हवाला दिया। इसमें बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘लक्ष्मी बनाम भारत संघ’ (2014) 4 SCC 427 के मामले में कहा है कि तेजाब का हमला शरीर को ही नहीं, बल्कि पीड़ित के भविष्य, सपनों और पूरे परिवार को जला देता है। यह एक ऐसा घाव है, जो उम्रभर पीड़ित को अंदर ही अंदर मारता रहता है। यदि ऐसे विकृत मानसिकता वाले अपराधियों को शरीर के जलने वाले भाग के कम प्रतिशत होने के तकनीकी आधार पर दंडादेश में कोई भी छूट दी जाती है तो इससे समाज में अपराधियों के हौसले बढ़ेंगे और आम लोगों, महिलाओं, बच्चियों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। इसके अलावा मामले में घटना की डिजिटल रिकॉर्डिंग (पेन ड्राइव) के माध्यम से कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की गई है, जिनके साथ धारा 63(4) भारतीय साक्ष्य अधिनियम का सर्टिफिकेट संलग्न है। साथ ही पीड़िता के कपड़ों और घटनास्थल पर मिली बोतल से हाइड्रोक्लोरिक एसिड मिलने की पुष्टि एफएसएल रिपोर्ट से भी हुई है। कोर्ट ने लिखा- ऐसे मामलों के तथ्यों और परिस्थितियों में सभी पीड़िताओं के भविष्य पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव एवं आरोपी के अपराध की गंभीर प्रकृति देखते हुए उसे दंडित किया जाता है।