पिता की रुकी हुई पेंशन के लिए बेटे ने वकालत की। इसके बाद पिता का केस संभाला और बेटे ने 4 साल केस लड़कर पिता को न्याय दिलाया। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने बीएसएफ के पूर्व जवान रामजी लाल (58) की 29 साल रुकी हुई पेंशन बहाल की। जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी की एकल पीठ ने 2 अप्रैल को सुनवाई कर फैसला दिया। इस फैसले में याचिकाकर्ता को पेंशन पेमेंट ऑर्डर (पीपीओ) जारी करने और सभी बकाया राशि का भुगतान तीन महीने में करने के निर्देश दिए। इस कानूनी लड़ाई का सबसे प्रेरणादायक पहलू यह रहा कि विचित्र चौधरी ने अपने पिता को न्याय दिलाने के संकल्प के साथ वर्ष 2019 में वकालत की पढ़ाई पूरी की और खुद ही उनकी केस की पैरवी की। इस्तीफा स्वीकार होने के बाद पेंशन का कानूनी पेंच याचिकाकर्ता रामजी लाल (58) पुत्र झुहारा राम निवासी हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गांव ललाना के हैं। उन्होंने बीएसएफ में कॉन्स्टेबल के रूप में 10 वर्ष सेवा देने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले ली। प्रकरण के अनुसार- रामजी लाल ने BSF रूल्स-1969 के नियम 19 के अंतर्गत अपना त्यागपत्र दिया था। इसे विभाग ने 6 दिसंबर 1997 को स्वीकार कर लिया था। याचिकाकर्ता ने सीसीएस (पेंशन) रूल्स के तहत अनुपातिक पेंशन की मांग की थी। इसके लिए सरकार के 27 दिसंबर 1995 के उस आदेश का संदर्भ दिया गया, जिसमें पेंशन पात्रता की न्यूनतम सेवा सीमा को 20 वर्ष से घटाकर 10 वर्ष कर दिया गया था। इसी आधार पर रामजी लाल का पेंशन भुगतान आदेश (PPO) 6 दिसंबर 1997 को जारी भी हो गया था, लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनों के कारण वे तीन दशक तक इस लाभ से वंचित रहे। वकील बेटे ने पिता के संघर्ष देखते हुए की लॉ की पढ़ाई
मामले में एडवोकेट विचित्र चौधरी ने पिता के संघर्ष को देखते हुए लॉ की पढ़ाई पूरी की और खुद पैरवी शुरू की। उन्होंने कोर्ट में तर्क दिया कि उनके पिता का मामला ‘बनवारी लाल बनाम भारत संघ’ जैसे नजीरी फैसले से कवर्ड है। चौधरी ने संवैधानिक आधार पर दलील दी- एक सैनिक को केवल तकनीकी आधार पर पेंशन से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्रदत्त समानता और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पेंशन की कमी के कारण उनके पिता ने दशकों तक मानसिक और सामाजिक आघात झेला है। सरकार का आदेश और ‘रेट्रोस्पेक्टिव’ यू-टर्न
कोर्ट के संज्ञान में यह भी लाया गया कि सरकार ने 1995 में 10 साल की सेवा पर पेंशन देने का उदार आदेश निकाला था, लेकिन वर्ष 1998 में नए परिपत्रों के माध्यम से स्थिति बदलने का प्रयास किया गया। विभाग इस नियम को ‘रेट्रोस्पेक्टिव’ (पिछली तारीख से) प्रभावी कर पेंशन रोकना चाहता था। हाईकोर्ट ने इस पर पूर्व में पारित जस्टिस फर्जंद अली के फैसले का हवाला देते हुए माना कि नियम 19 के तहत त्यागपत्र असल में ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ है और एक बार सुरक्षित हो चुके हक को बाद के किसी स्पष्टीकरण से नहीं छीना जा सकता। तीन महीने में भुगतान और एरियर के निर्देश जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी ने याचिका स्वीकार करते हुए निर्देश दिए कि संबंधित अधिकारी तत्काल प्रभाव से 9 अगस्त 1996 के पीपीओ को लागू करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को 6 दिसंबर 1997 (इस्तीफा स्वीकार होने की तिथि) से अब तक की सभी बकाया राशि (एरियर) का भुगतान किया जाए। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों की गणना आदेश की प्रति मिलने के 3 महीने में सुनिश्चित करने को कहा है, ताकि पेंशन की निरंतरता बनी रहे। बेटे ने कहा- पिता का आत्मसम्मान लौटाना था
एडवोकेट और याचिकाकर्ता के बेटे विचित्र चौधरी ने कहा- पिता की आंखों में बेबसी और इस अंतहीन संघर्ष को देखकर ही मैंने वकालत करने का संकल्प लिया था। मेरा मकसद सिर्फ कानूनी मुकदमा जीतना नहीं था, बल्कि फौजी पिता का छीना हुआ आत्मसम्मान और गरिमा वापस लौटाना था। हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ हमारे परिवार की जीत नहीं है, बल्कि यह उन सभी पूर्व सैनिकों के लिए एक उम्मीद है, जो अपने हकों के लिए लड़ रहे हैं।
697 लोग अलग-अलग कोर्ट में लड़ रहे केस, 170 लोग सुप्रीम कोर्ट में
सरकार के 10 साल की न्यूनतम सेवा के नियम के बाद उस दौर में करीब 1990 लोगों ने इस्तीफे दिए थे। इनमें 697 अभी भी अलग-अलग कोर्ट में केस लड़ रहे हैं। इनमें से तकरीबन 170 लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है।
सुप्रीम कोर्ट के करम बीर सिंह और अन्य वर्सेज केंद्र सरकार (2007) और करण सिंह वर्सेज केंद्र सरकार (2008) जैसे कई फैसलों में यह तथ्य दर्ज है कि री-जॉइनिंग की बढ़ी हुई डेडलाइन तक भी 697 कर्मी वापस सेवा में नहीं लौटे थे। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक- कुछ कर्मचारी शारीरिक रूप से अक्षम हो चुके थे। जैसे बनवारी लाल, जिनका एक हाथ और पैर दुर्घटना में कट गया था और वे मेडिकली अनफिट घोषित हुए थे। वहीं कुछ लोगों की इस बीच मृत्यु हो गई। इसके अलावा शेष 697 अलग-अलग कारणों से वापस नहीं लौट सके। ये सभी इतने दशकों से कोर्ट में संघर्ष कर रहे हैं।
