प्रदेश में उच्च शिक्षा की डिग्रियां दे रहे सरकारी विश्वविद्यालयों की हालत चिंताजनक है। सरकारी विश्वविद्यालयों में न तो शिक्षक हैं और ना ही कामकाज करने वाले बाबू। भास्कर ने 18 सरकारी विश्वविद्यालयों की पड़ताल की तो सामने आया कि 10 सरकारी विश्वविद्यालयों में तो एक भी नियमित शिक्षक या कर्मचारी नहीं हैं, मतलब 100 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। ऐसी काम चलाऊ व्यवस्था का खमियाजा छात्रों को उठाना पड़ रहा है। विश्वविद्यालयों ने भर्ती की डिमांड राज्य सरकार को भेज रखी है, लेकिन ज्यादातर में पिछले दो साल में कोई भर्ती नहीं हुई है। ऐसे में विश्वविद्यालयों में नई शिक्षा नीति कैसे लागू हो रही है, कैसे छात्रों को पढ़ाया जा रहा है और किस तरह डिग्रियां बांटी जा रही हैं, इन सब पर सवाल खड़े होते हैं। कहीं रोस्टर तो कहीं वित्तीय व प्रशासनिक स्वीकृति से अटकी प्रदेश के विश्वविद्यालय शैक्षणिक और अशैक्षणिक पदों पर भर्तियों के लिए लगातार सरकार से मांग कर रहे हैं। सरकार की ओर से सेंक्शन पोस्ट के लिए भी वित्तीय व प्रशासनिक स्वीकृतियां जारी नहीं हो पा रही है। दूसरी ओर विश्वविद्यालयों का रोस्टर भी सिंडिकेट से पारित नहीं हो रहा। सरकार ने स्वीकृतियां दे दी हैं, वहां भी विश्वविद्यालयों द्वारा भर्ती में लेटलतीफी हो रही है। संस्कृत विवि को अक्टूबर, 2024 में 16 शैक्षणिक व अशैक्षणिक पदों को भरने की स्वीकृति जारी हुई थी। लेकिन नतीजा जीरो है। “राज्य वित्त पोषित विश्वविद्यालयों में शिक्षकों व कर्मचारियों के पद बड़ी संख्या में खाली होना चिंताजनक है। कोठारी कमीशन के अनुसार शिक्षक- छात्र अनुपात 1:20 होना चाहिए। नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन तभी हो सकता है, जब सरकार चरणबद्ध तरीके से खाली पदों को भरे।”
– प्रो. आर. के. कोठारी, पूर्व कुलपति, राजस्थान विवि