दौसा में सिलिकोसिस के फर्जी सर्टिफिकेट जारी करने के मामले में 2 डॉक्टर और 1 रेडियोग्राफर को गिरफ्तार किया है। इसके बाद कोर्ट के आदेश पर तीनों को जेल भेज दिया गया। तीनों ने दौसा में 413 सिलिकोसिस के फर्जी सर्टिफिकेट जारी कर सरकार को 12.39 करोड़ चूना लगाया था। फर्जी सिलिकोसिस सर्टिफिकेट जारी करने के मामले में ये पहली गिरफ्तारियां हैं। कमेटी की रिपोर्ट में सबसे ज्यादा 45% अकेले दौसा में सर्टिफिकेट जारी हुए थे। ऐसे में जयपुर और दौसा में जांच कमेटियां बनाई गई थी। इसमें पूरे प्रदेश में 22 कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई थी। इसमें अकेले 13 लोग दौसा जिले से थे। इन डॉक्टर्स ने सिलिकोसिस नहीं था उन्हें भी सर्टिफिकेट जारी कर दिए गए थे। वहीं रेडियोग्राफर बार-बार एक ही एक्सरे से का इस्तेमाल कर फाइल में लगा देते। साइबर थाना प्रभारी बृजेश ने बताया- मामले में सोमवार 30 मार्च 2026 शाम करीब 7 बजे डॉ. मनोज ऊंचवाल (चेस्ट-टीबी कनिष्ठ विशेषज्ञ), डॉ. डीएन शर्मा (प्रमुख विशेषज्ञ मेडिसिन) और रेडियोग्राफर मनोहर लाल को गिरफ्तार किया है। इसके बाद कोर्ट के आदेश पर इन्हें जेल भेज दिया गया है। इनके खिलाफ दौसा में 29 जनवरी 2024 को शिकायत दर्ज करवाई थी। अब 3 पॉइंट्स में समझिए क्या था मामला 1. अकेले दौसा में बने थे सबसे ज्यादा कार्ड साइबर थाना प्रभारी बृजेश ने बताया- सिलिकोसिस कार्ड नवंबर 2022 में ऑनलाइन बनना शुरू हुए थे। तब अकेले दौसा में 10 महीने में सर्वाधिक 2453 सिलिकोसिस कार्ड बनाए गए थे। यह पूरा आंकड़ा प्रदेश में बनाए गए कार्ड का करीब 46 फीसदी था। दौसा में ज्यादा संख्या में कार्ड बनाने पर आंकड़ा सामने आया तो प्रदेश स्तर की टीम को इस पर शक हुआ और जांच कमेटी गठित की गई। 29 जनवरी 2024 में करौली, चूरू, सीकर, भीलवाड़ा, चौमूं, अलवर और दौसा में कुल 22 डॉक्टरों और रेडियोग्राफर के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। इसके बाद जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज की कमेटी बनाई गई। इसमें डॉ. सीपी सावरकर, डॉ. मुकेश मित्तल और डॉ. सुनील जाखड़ शामिल ने जांच की। वहीं तत्कालीन दौसा कलेक्टर की ओर से भी कमेटी बनाई गई थी। 2. फर्जी सर्टिफिकेट बनाए जांच में सामने आया कि दौसा में सबसे ज्यादा फर्जी सर्टिफिकेट बनाए गए थे। दोनों कमेटियों की रिपोर्ट में साफ हुआ कि फर्जी प्रमाण पत्र बनाकर सरकार को आर्थिक नुकसान पहुंचाया जा रहा था। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ चिकित्सा अधिकारियों की मिलीभगत से लोगों को गलत तरीके से सिलिकोसिस के कार्ड दिए गए। जांच में सामने आया कि जिन मरीजों को सिलिकोसिस नहीं था, उन्हें भी प्रमाण पत्र जारी किए गए। वहीं जो मरीज वास्तव में सिलिकोसिस से पीड़ित थे, उनके प्रमाण पत्र रिजेक्ट कर दिए गए। 3. एक एक्सरे का बार-बार यूज करते थे जांच में सामने आया कि रेडियोग्राफर द्वारा अपलोड किए गए एक्स-रे में भी गड़बड़ी मिली। एक ही एक्स-रे का कई बार इस्तेमाल कर फर्जी प्रमाण पत्र बनाए गए। दौसा के मामले में कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर 413 मामलों में ऑटो अप्रूवल प्रक्रिया के जरिए 12.39 करोड़ रुपए का गलत भुगतान होना सामने आया। इसके बाद पुलिस ने डॉ. मनोज ऊंचवाल, डॉ. डीएन शर्मा और रेडियोग्राफर मनोहर लाल को गिरफ्तार किया है। सभी पर फर्जी प्रमाण पत्र जारी करने के आरोप हैं। इनके खिलाफ दर्ज हुई थी FIR सिलिकोसिस पेशेंट कौन होते हैं सिलिकोसिस डिजीज खदानों में लगातार काम करने वाले श्रमिकों में अधिक सामने आती है। इस बीमारी में सिलिका युक्त धूल सांस के जरिए फेफड़ों में जाती है, जिससे फेफड़े खराब हो जाते हैं। मरीजों को राहत देने के लिए राज्य सरकार ने 2019 में सिलिकोसिस नीति लागू की थी, जिसके तहत आर्थिक सहायता दी जाती है। सिलिकोसिस कार्ड पर मिलती है आर्थिक मदद 2019 की सिलिकोसिस नीति के तहत कार्ड बनने पर मरीज को 3 लाख रुपए दिए जाते हैं। मरीज की मौत होने पर परिवार को 2 लाख रुपए और अंतिम संस्कार के लिए 10 हजार रुपए दिए जाते हैं। इसके अलावा मरीज को 1500 रुपए मासिक पेंशन भी मिलती है।
