महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए पेस्टिसाइड-रहित खेती के लिए किसानों को जोड़ रहा है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत आदिवासी अंचल के जयसमंद, कुराबड़ क्षेत्र के 500 किसानों को इसमें जोड़ा गया है। उन्हें टमाटर, चना, मक्का की फसल में कीट नियंत्रण के बारे में जानकारी दी जाएगी। इसमें जैविक पद्धति से फसलों के प्रकोप को रोका जाएगा। इसके साथ ही बायो-पेस्ट से खेती करवाई जाएगी। यहां से रिजल्ट आने के बाद जिले के अन्य किसानों को भी जोड़ा जाएगा। खेती में कीटनाशकों के ज्यादा प्रयोग से लोगों में कई तरह की बीमारियां होने लगी हैं। खेत की मिट्टी से ही तैयार किए जा रहे बायो-पेस्टिसाइड खेती में रासायनिक दवाओं के बढ़ते दुष्प्रभावों को रोकने के लिए जमीन से लाभदायक फंगस निकालकर उन्हें संवर्धित कर बायो-पेस्टिसाइड के रूप में उपयोग किया जा रहा है। खेती की मिट्टी से ट्राइकोडर्मा, मेटाराइजियम और विवेरिया बेसियाना जैसे उपयोगी फंगस एकत्र किए जाते हैं। इन्हें प्रयोगशाला में कल्चर करके इनकी संख्या बढ़ाई जाती है। इसके बाद इन्हें सोपस्टोन (टैल्क पाउडर) में मिक्स कर खेतों में उपयोग के लिए तैयार किया जाता है। ये लाभदायक फंगस फसलों की जड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले रोगों पर प्रभावी नियंत्रण करते हैं। खासतौर पर जड़ गलन, जड़ जलन जैसे रोगों के साथ-साथ रस चूसने वाले और काटने वाले कीटों पर भी इनका असर देखा जा रहा है। पहले भी राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मा मिल चुका एमपीयूएटी को पहले भी देश में प्राकृतिक खेती पर कोर्स बनाने का जिम्मा मिल चुका है। इसमें बीएससी नेचुरल फार्मिंग ऑनर्स का 4 साल का कोर्स, बीएससी नेचुरल फार्मिंग डिग्री का 3 साल का कोर्स और डिप्लोमा इन नेचुरल फार्मिंग का 2 साल का कोर्स तैयार किया गया था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी कोर्स तैयार करने का जिम्मा सौंपा था।