राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रलोभन या दबाव के जरिए धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश से जुड़े मामले में निचली अदालत के संज्ञान आदेश को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि जबरन धर्म परिवर्तन को मौलिक अधिकार के रूप में नहीं माना जा सकता। मामले में निचली अदालत की ओर से लिए गए संज्ञान को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने धर्मांतरण मामले में निचली अदालत के संज्ञान आदेश के खिलाफ याचिका खारिज की। जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने कहा कि पुलिस जांच के सबूतों से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है। यह मामला श्रीगंगानगर के श्रीकरणपुर थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 290/2025 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता शरद गुंबर ने 19 दिसंबर 2025 को आरोप लगाया कि कुछ लोग अंधविश्वास और प्रलोभन से धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। अनुच्छेद 25 देता है धार्मिक स्वतंत्रता पुलिस ने जांच बाद राजस्थान धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2025 की धारा 3/5 के तहत आरोप-पत्र पेश किया। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 23 फरवरी 2026 को मामले में संज्ञान लिया। याचिकाकर्ताओं ने प्रार्थना सभाएं करने की बात कही। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है, पर जबरन या प्रलोभन से धर्म परिवर्तन मौलिक अधिकार नहीं। कोर्ट ने पर्याप्त आधार माने।