राजस्थान हाईकोर्ट में एक असाधारण स्थिति देखने को मिली, जब झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस प्रकाश टाटिया को खुद न्याय के लिए अपने ही पुराने हाईकोर्ट में फरियाद करनी पड़ी। राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने शनिवार को टाटिया की पेंशन संबंधी याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि दोहरी पेंशन का कोई कानूनी आधार नहीं है। खंडपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया कि “एक करियर, एक पेंशन” और पेंशन स्टैकिंग को रोकना राजकोषीय अनुशासन के लिए जरूरी है। RHC में वर्ष 2001 में नियुक्त हुए थे स्थायी न्यायाधीश जस्टिस प्रकाश टाटिया जनवरी 2001 में राजस्थान हाईकोर्ट के स्थायी न्यायाधीश नियुक्त हुए थे। वर्ष 2011 में झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। 3 अगस्त 2013 को वे सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्हें सशस्त्र सेना अधिकरण, नई दिल्ली का अध्यक्ष, वहां से मुक्त होने के बाद 11 मार्च 2015 को राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 18 फरवरी 2020 को पेंशन से इनकार जस्टिस टाटिया जब अपने पेंशन भुगतान आदेश का इंतजार कर रहे थे तो उन्हें 18 फरवरी 2020 को राजस्थान सरकार से पत्र मिला, जिसमें कहा गया कि वे मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवा के लिए पेंशन के हकदार नहीं हैं। सरकार का तर्क था कि वे पहले से ही हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में पेंशन ले रहे हैं और आयोग के अध्यक्ष को मिलने वाली पेंशन भी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बराबर ही है। इसके बाद उन्होंने राज्यपाल सहित कई अन्य अधिकारियों को लिखा, लेकिन कहीं से राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट में चुनौती इससे असंतुष्ट होकर जस्टिस टाटिया ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.एस. सिंघवी ने अभिषेक मेहता और केसर सिंह चौहान के साथ मिलकर तर्क दिया कि 18 फरवरी 2020, 26 फरवरी 2024 और 15 मार्च 2024 के पत्र गैरकानूनी, मनमाने और संविधान के अनुच्छेद 14, 16 व 21 का उल्लंघन करने वाले हैं। उनका कहना था कि नियम 4 में कोई ऐसी अपवाद शर्त नहीं है, जो पहले से पेंशन लेने वालों को दूसरी पेंशन से वंचित करे। सरकार: पहले से ले रहे अधिकतम पेंशन इस मामले में महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद और उनकी टीम ने राज्य सरकार की तरफ से तर्क दिया कि जस्टिस टाटिया पहले से ही सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश अधिनियम 1958 के तहत अधिकतम 1.25 लाख रुपये मासिक पेंशन ले रहे हैं। नियम 4 केवल सेवा शर्तों में समानता स्थापित करता है, दोहरी पेंशन को अधिकृत नहीं करता। मानवाधिकार आयोग के नियम और लोकायुक्त नियम समान नहीं हैं, क्योंकि लोकायुक्त नियमों में अलग पेंशन का स्पष्ट प्रावधान है। कोर्ट का फैसला- एक करियर-एक पेंशन का सिद्धांत हाईकोर्ट ने गहन कानूनी विश्लेषण करते हुए पेंशन के मौलिक सिद्धांतों को स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि पेंशन कोई दया दान नहीं, बल्कि सेवा के बदले मिलने वाला आस्थगित मुआवजा है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर पद के लिए अलग पेंशन मिले। भारतीय कानूनी व्यवस्था में “एक करियर, एक पेंशन” का सिद्धांत है और “पेंशन स्टैकिंग” को रोकने की नीति है। कोर्ट ने न्यायमूर्ति महेंद्र भूषण शर्मा बनाम राजस्थान राज्य के फैसले को अलग करार दिया। कोर्ट ने सशस्त्र सेना अधिकरण अधिनियम के नियम का उदाहरण दिया, जहां स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अध्यक्ष बनाया जाता है, तो उसके वेतन में पेंशन की राशि की कटौती की जाएगी। अधिकरण नियमों में तो यह भी कहा गया कि “अतिरिक्त पेंशन और ग्रेच्युटी स्वीकार्य नहीं होगी।” जस्टिस टाटिया खुद सशस्त्र सेना अधिकरण के अध्यक्ष रहे हैं, लेकिन उन्होंने कभी उस पद के लिए अलग पेंशन की मांग नहीं की। व्याख्या मान ली, तो तीन पेंशन के हकदार हो जाएंगे हाईकोर्ट ने राजकोषीय अनुशासन के महत्व पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि पेंशन राज्य की संचित निधि पर निरंतर दायित्व है, केवल व्यक्तिगत हकदारी का मामला नहीं। न्यायालयों को सावधानी बरतनी चाहिए कि कहीं न्यायिक व्याख्या से सरकारी खजाने पर ऐसा बोझ न पड़े, जिसे विधायिका ने सोच-समझकर नहीं बनाया। यदि जस्टिस टाटिया की व्याख्या मान ली जाए, तो वे तीन पेंशन के हकदार हो जाएंगे – मुख्य न्यायाधीश, सशस्त्र सेना अधिकरण अध्यक्ष और मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष के रूप में। अंतर्राष्ट्रीय न्यायशास्त्र की तुलना कोर्ट ने अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण भी दिए। ब्रिटेन, अमेरिका और कनाडा में “डबल डिपिंग” की अवधारणा को हतोत्साहित किया जाता है, जब तक कानून में स्पष्ट अधिकार न हो। जर्मनी में कुल पेंशन आय पर सख्त सीमा है। साइप्रस में पहले की पेंशन को नई नौकरी के दौरान समायोजित किया जाता है। पाकिस्तान में हाल ही में दोहरी पेंशन पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई है। यूरोपीय संगठनों में भी समानांतर पेंशन या पेंशन के साथ क्षतिपूर्ति का संयोजन प्रतिबंधित है।
