राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्य पीठ ने पुलिस जांच के दौरान केस डायरी में जज के व्यक्तिगत व्यवहार को लेकर दिया गया बयान आपराधिक अवमानना नहीं माना। जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने क्रिमिनल कंटेम्प्ट पिटीशन को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने 7 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई खत्म कर दी। जानकारी के अनुसार- मामला जुलाई 2019 का है। मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) पुलिस ने जज के आपत्तिजनक व्यवहार को केस डायरी में दर्ज किया था। पुलिसकर्मियों का आरोप था कि पीठासीन अधिकारी (जज) व्यक्तिगत रूप से नाराज हैं और अक्सर दुर्व्यवहार करते हैं। पुलिसकर्मियों के केस डायरी में दर्ज इन तथ्यों को भीलवाड़ा के मांडलगढ़ के तत्कालीन सीनियर सिविल जज ( एसीजेएम) ने संस्था का अपमान माना था। उन्होंने हाईकोर्ट में अवमानना का संदर्भ भेज दिया था। अब राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने 17 मार्च को फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि पुलिस जांच के दौरान केस डायरी में पीठासीन अधिकारी (जज) के व्यक्तिगत व्यवहार को लेकर दिया गया बयान आपराधिक अवमानना नहीं है। इन पुलिसकर्मियों पर अवमानना कार्रवाई खत्म खंडपीठ ने इस रिपोर्टेबल फैसले के माध्यम से 7 पुलिस अधिकारियों- तत्कालीन एएसपी दिलीप कुमार सैनी, एसएचओ भूराराम खिलेरी, मेघाराम, नाथूसिंह, रामसिंह, गोपाललाल और सरोज के खिलाफ चल रही अवमानना कार्रवाई को खत्म कर दिया। पहले पढ़िए, क्या है पूरा मामला मांडलगढ़ थाने में दर्ज एफआईआर पर विवाद 1- विवाद मांडलगढ़ थाने में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। रेप, धोखाधड़ी और विशेष रूप से ‘लोक सेवक की ओर से कानून की अवहेलना’ और ‘महिला का अपमान’ जैसे गंभीर धाराओं में मामले की सुनवाई जांच चल रही थी। 2- आरोप था कि तत्कालीन थानाधिकारी भूराराम खिलेरी ने उनकी शिकायत दर्ज करने में आनाकानी की थी। इस पर तत्कालीन पीठासीन अधिकारी ने इस्तगासा के जरिए मामला दर्ज कर जांच का आदेश दिया था। 3- इसके बाद जांच की प्रोग्रेस से असंतुष्ट होकर कोर्ट ने 8 जुलाई 2019 को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) को एसएचओ की भूमिका की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था। कोर्ट के आदेश के बाद जांच हुई थी जांच में पुलिसकर्मियों ने जज पर लगाया था आरोप जज के आदेश की पालना में एएसपी ने सीनियर पुलिस अधिकारी के तौर पर जांच शुरू की थी। एसएचओ सहित अन्य पुलिसकर्मियों ने केस डायरी में अपना बयान दर्ज करवाया था। इन बयानों में पुलिसकर्मियों ने आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था- पीठासीन अधिकारी उनसे व्यक्तिगत रूप से नाराज हैं और अक्सर दुर्व्यवहार करते हैं। एक उदाहरण देते हुए कहा था- एक वारंटी को पकड़कर लाने वाले कॉन्स्टेबल को बिना किसी कारण के कोर्ट में काफी देर रोक लिया । उसका बेल बॉन्ड भरवाया। पुलिसकर्मी की विभागीय जमानत (श्योरिटी) लेने से इनकार कर दिया और किसी निजी व्यक्ति की श्योरिटी लाने पर जोर दिया। कॉन्स्टेबल ने अपने बयान में यहां तक कहा कि उसके साथ ‘वारंटी से भी बुरा बर्ताव’ किया गया। केस डायरी में दर्ज इन बयानों को पीठासीन अधिकारी ने संस्था का अपमान मानते हुए हाईकोर्ट में अवमानना का संदर्भ भेजा था। कोर्ट में पेश हुए थे पुलिसकर्मी मामले में पीठासीन अधिकारी पर बयान देने वाले पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित हुए थे। पुलिसकर्मियों ने अपने लिखित जवाब कोर्ट के सामने स्पष्ट किया था – उनके बयान केवल एक आधिकारिक जांच प्रक्रिया का हिस्सा थे। ये बातें बंद कमरे में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के सामने केस डायरी में दर्ज की गई थी, न कि किसी खुली विभागीय जांच या सार्वजनिक मंच पर। – उनका उद्देश्य कोर्ट की गरिमा गिराना या किसी न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करना कतई नहीं था, बल्कि जांच अधिकारी की ओर से पूछे गए सवालों का जवाब देना था। कोर्ट का फैसला: अवमानना के दायरे में नहीं… हाईकोर्ट ने न्यायालय अवमानना अधिनियम की धारा 2(c) और धारा 6 की व्याख्या की। कोर्ट ने कहा- सुप्रीम कोर्ट के केसों का अहम हवाला खंडपीठ ने अपने अंतिम फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ‘ब्रह्मा प्रकाश शर्मा’, ‘बाल ठाकरे’ और ‘इनडायरेक्ट टैक्स प्रैक्टिशनर्स एसोसिएशन बनाम आर.के. जैन’ जैसे अहम केसों का हवाला दिया। कोर्ट ने इन फैसलों के आधार पर कहा कि स्वतंत्र आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। हर कठोर आलोचना या असहमति में न्याय प्रक्रिया को बाधित करने की मंशा खोजना सही नहीं है।
