सर्वोच्च न्यायालय के साल 2022 के एक महत्वपूर्ण निर्णय के अनुपालन में अब देश भर में उन पवित्र भूमियों के संरक्षण की कवायद तेज हो गई है, जिनका गहरा सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है। इस मुहिम के तहत विशेष रूप से मंदिरों के आसपास स्थित उन जमीनों को चिन्हित किया जा रहा है, जहां प्राचीन और घने जंगल मौजूद हैं। राजस्थान सहित पूरे देश में इन क्षेत्रों के सर्वे का काम जोरों पर है, जिसका उद्देश्य इन बेशकीमती प्राकृतिक विरासतों को सुरक्षित करना है। नागौर में 6448 हेक्टेयर ओरण भूमि विभागीय जानकारी के अनुसार, अब तक राजस्व अभिलेखों के आधार पर लगभग 6448 हेक्टेयर ओरण भूमि की पहचान की जा चुकी है। सर्वे की यह प्रक्रिया वर्तमान में प्रगति पर है और कार्य पूर्ण होते ही इसकी अंतिम अधिसूचना जारी कर दी जाएगी। इस कदम का सबसे बड़ा प्रभाव यह होगा कि इन भूमियों का संरक्षण पूरी तरह सुनिश्चित हो सकेगा और भविष्य में इनके किसी अन्य उपयोग या व्यावसायिक आवंटन की राह कठिन हो जाएगी। इससे इन क्षेत्रों की वर्तमान प्राकृतिक स्थिति को लंबे समय तक बरकरार रखा जा सकेगा। न अतिक्रमण होगा न खेती ​प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह जमीनें पूरी तरह से वन विभाग के अधीन नहीं होंगी और न ही उन पर विभाग का सीधा मालिकाना हक होगा। वन विभाग यहां केवल एक नोडल एजेंसी के तौर पर अपनी भूमिका निभाएगा। जिसका मुख्य कार्य इन जमीनों की पहचान करना, वर्तमान स्थिति की जांच करना और सैटेलाइट डेटा के माध्यम से किसी भी तरह के बदलाव या अतिक्रमण की निगरानी करना होगा। विभाग यह भी सुनिश्चित करेगा कि इन जमीनों पर किसी प्रकार का अवैध आवंटन या कृषि कार्य न हो रहा हो। आमजन से मांगी आपत्तियां ​वर्तमान में नागौर जिले में ऐसी 1638 भूमियों को चिन्हित कर एक ड्राफ्ट प्रकाशित किया जा चुका है। इस ड्राफ्ट पर आमजन से आपत्तियां मांगी गई हैं, जिन्हें जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित विशेष समिति के समक्ष रखा जाएगा। इन आपत्तियों के निस्तारण के बाद उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप संरक्षण और विनियमन की अगली कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।