नमस्कार रामजी’ को लेकर पीसीसी चीफ डोटासरा और भाजपा विधायक गोपाल शर्मा के बीच ‘करोड़ों की शर्त’ लग गई। बस ऑपरेटर्स के धरने पर पहुंचे पूर्व मंत्री खाचरियावास बोले- मैं राम का वंशज हूं। जयपुर कूच करने निकले नेताजी गाड़ी की छत पर डटे रहे और जोधपुर में निगम की तिजोरी से निकला 1 रुपया खजाने में जमा हो गया। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. ‘रामजी’ को लेकर माननीयों में ‘करोड़ों की शर्त’ जनवरी अपने आखिरी पड़ाव पर था। बजट सत्र चल रहा था। सदन शुरू होने से पहले माननीय धूप सेंक रहे थे। इस दौरान डोटासराजी और गोपालजी की छोटी सी मुलाकात हुई। डोटासरा कांग्रेस पार्टी संगठन के चीफ और गोपाल शर्मा कमल वाली पार्टी के विधायक। औपचारिक अभिवादन के आदान-प्रदान के बाद बात ‘रामजी’ पर अटक गई। डोटासराजी ने मनरेगा स्कीम का नाम बदलने, गांधी की जगह ‘रामजी’ जोड़ने का उलाहना दिया। गोपालजी के पास जवाब तैयार था। बोले- गांधीजी तो खुद रामजी को प्रेम करते थे। रामराज्य की बात करते थे। डोटासराजी कहां मानने वाले थे। पलटवार किया- लेकिन रामजी कहां हैं? ग्राम है वो तो। रामजी बिल में लिख दो, मैं आपको लाख रुपए दूंगा। गोपालजी राजनीति विषय छोड़ अर्थव्यवस्था की तरफ मुड़े। कहा- आजकल लाख रुपए की क्या कीमत है? डोटासराजी आमादा थे, शर्त की रेट बढ़ाई- मैं आपको करोड़ रुपए दे दूंगा। आप तो उस बिल में रामजी लिख दो। ग्राम लिख रखा है और उसको आप रामजी बना रहे हो। लगे हाथ डोटासराजी ने इसमें एक शिकायत और जोड़ दी। बोले- हमारा इंडिया गठबंधन सही है, उसको आप इंडी गठबंधन बना रहे हो। गोपाल शर्मा ने सरेंडर नहीं किया। कहा- वो है ही इंडी। इंडी अलायंस। इसके बाद दोनों नेताओं ने ठहाका लगाकर हाथ मिलाया और अपनी-अपनी दिशा में बढ़े। 2. प्रताप सिंह खाचरियावास बोले- मैं राम का वंशज शहीद स्मारक पर बस ऑपरेटर्स का धरना चल रहा था। एक हादसे के बाद सरकार सख्त हो गई थी। सरकार सख्त होती है तो कानून-कायदे का थोड़ा ज्यादा ख्याल रखा जाता है। इससे परेशानी होने लगती है। पूर्व परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास को बस ऑपरेटर्स ने कुछ ‘गुर’ सीखने के लिए बुलाया। वे पहुंचे। ऑपरेटर्स ने समस्या बताई- हर जिले में अफसर अपना नियम लगाते हैं। बताइये एक जगह से पास हुई RC को अजमेर में निरस्त कर दिया। समस्या सुनकर पूर्व मंत्रीजी को ‘अपने दिन’ याद आ गए। बोले- हमारे राज में ऐसा होता था क्या? फोन पर ऑनलाइन ही काम हो जाते थे। तुम्हीं लोगों ने दूसरी पार्टी को मजे दे दिए। चुनाव में सनातन की बातें की गईं। भाई मैं मैं राम का वंशज हूं। कछावा वंश का क्षत्रिय हूं। शक्ल नहीं दिख रही क्या? लगता नहीं क्या राम का वंशज? सभा में एक यूनियन पदाधिकारी ने फिर पूर्व मंत्रीजी के कार्यकाल की बात छेड़ी- आपने तो परमिट 9 साल कर दी थी। अब घटा दी गई है। पूर्व मंत्रीजी को फिर जोश आया। बोले- बताओ, हमारी सरकार ने जो सुविधाएं दी थीं, वो भी कम कर दी? उन्होंने वादा किया था कि चुनाव के बाद हर किसी को 1 लाख देंगे। एक लाख मिले क्या? अब तक चुपचाप भाषण सुन रहा एक ऑपरेटर बड़ी मायूसी से बोला- एक लाख तो नहीं मिले, हां एक लाख के चालान जरूर भर चुके हैं। इस पर सभा में ठहाका गूंज उठा। 3. नरेश मीणा का कूच और सहमति जब-जब विधानसभा चलती है, तब-तब मुद्दों की हवा भी चलती है। सोए हुए गण जाग जाते हैं। बुझी हुई यूनियनें जागृत हो जाती हैं। संगठनों के आंदोलन आकार लेने लगते हैं। भूली-चूकी मांगें हिनहिनाने लगती हैं। कुल मिलाकर यह ‘सीजन’ होता है। बजट पेश होने से ठीक पहले नेताजी ने 12 मांगें गिनाईं और मासूमियत से कहा- चूंकि ये मांगे जिला स्तर की नहीं हैं, प्रदेश स्तर की हैं। इसलिए हम राजधानी कूच करेंगे। कूच का नाम सुनते ही समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई। तय समय और तय स्थान पर लोग अपने-अपने वाहन लेकर जुट गए। कूच शुरू हो गया। कार का सनरूफ खोलकर नेताजी अवतरित हुए। कूच शोभायात्रा बन गया और मांगों की झांकी निकलने लगी। प्रशासन पहले से तैयार था। कूच को हाईवे पर चढ़ने से पहले रोक दिया गया। इसके बाद नेताजी कार की छत पर जम गए। ताकि जो कुछ हो जनता के सामने हो और दूर तक की जनता को वे नजर आते रहें। नेताजी के छत पर बने रहने का एक लाभ यह हुआ कि रील बनाने वालों को उन्हें ढूंढने में मशक्कत नहीं करनी पड़ी। नेताजी ने कार की छत पर ही भोजन किया। पुलिस के आला अफसरों को कार की छत पर बैठकर ही लेटर सौंपा। कार की छत पर से ही कलेक्टर साहिबा से सहमति वाली दूरभाष वार्ता कर ली। कूच में शामिल बसों की छतों पर जमे समर्थक धमाल गा-गाकर वातावरण को छतमय करते रहे। सहमति के बाद कूच का वहीं से विसर्जन हो गया। 4. चलते-चलते.. नगर निगम के पुराने दफ्तर में 2 दशक से बंद पड़ी तिजोरी पर सबकी निगाहें थीं। आंखें सैकड़ों, सवाल एक-तिजोरी में क्या है? अफसरों में उत्सुकता थी लेकिन वे चेहरे से झलकने नहीं दे रहे थे। कर्मचारियों के चेहरे पर उत्सुकता थी और वे इसे झलका भी रहे थे। जिस हिसाब से तिजोरी भारी-भरकम थी, उस हिसाब से अंदाजा लगाया जा रहा था कि तत्कालीन बजट कितना अनसेफ रहा होगा। जिसे सुरक्षित रखने के लिए इसका इंतजाम करना पड़ा। तिजोरी की चाबी गायब थी और रिकॉर्ड से भी गायब थी। इसलिए मिस्त्री को बुलाने का फैसला लिया गया। तिजोरी का साइज और वजन देख मिस्त्री ने मेहनताना चांदी के स्तर तक बढ़ा दिया। बोला-ढाई हजार लगेंगे। मेहनताना तय रहा। इसके बाद मिस्त्री छेनी-हथौड़ा लेकर डट गया। अफसरों-कार्मियों की जिज्ञासा और धड़कनें समान अनुपात में बढ़ती जा रही थी। हथौड़े के मुकम्मल प्रहार से तिजोरी का पल्ला खुल गया। कैमरे में वीडियो बना रहा कार्मिक मोबाइल की बत्ती जलाकर लगभग तिजोरी में घुस गया। तिजोरी खाली थी। लेकिन अंदर एक और लॉकर था। सुई से हाथी निकल चुका था और पूंछ फंस गई थी। मिस्त्री ने ‘पूंछ’ पर भी हथौड़े से प्रहार किया और अंदरूनी लॉकर ने सरेंडर कर दिया। अंदर के लॉकर से 1 रुपए का कलदार खनखनाते हुए लुढ़का। अफसर एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। एक कार्मिक ने बढ़कर सिक्का उठाया और गौर फरमाते हुए आर्केलॉजिस्ट की तरह बोला-1982 का है सर। किसी ने शगुन के तौर पर रखा होगा। तिजोरी खाली नहीं रहनी चाहिए न। कर्मचारी दबी हंसी हंसने लगे। एक ने अधिकारी से पूछा-सिक्के का क्या करें सर? सर ने सोच-विचार करने के बाद कहा-खजाने में जमा करा दो। सन्नाटे को मिस्त्री की मांग ने तोड़ा। बोला- साहब, मेरा पेमेंट कर दो। इनपुट सहयोग- महावीर बैरवा (टोंक), अंकित ढाका (जोधपुर)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार को मुलाकात होगी…