जोधपुर की मेहरानगढ़ दुखांतिका केस में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसफर याचिका खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर बेंच को ही मामले का निपटारा करने का निर्देश दिया है। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने याचिकाकर्ता ईश्वर प्रसाद की ओर से पेश ट्रांसफर पिटीशन में यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता ईश्वर प्रसाद ने राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर बेंच में लंबित मेहरानगढ़ दुखांतिका से संबंधित जनहित याचिका को गुजरात हाईकोर्ट अहमदाबाद में ट्रांसफर करने की मांग की थी। उन्होंने इसके समर्थन में कई आधार प्रस्तुत किए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मामले को राजस्थान हाईकोर्ट से गुजरात हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने का कोई भी आधार विचारणीय या स्वीकार्य नहीं है। 2008 की घटना, 2011 में जांच रिपोर्ट, अब तक कोई कार्रवाई नहीं
कोर्ट के सामने रखे गए तथ्यों के अनुसार, जस्टिस जसराज चोपड़ा की अध्यक्षता में वर्ष 2008 में एक जांच आयोग का गठन किया गया था, जो उसी वर्ष घटित हुई एक घटना की जांच के लिए था। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि मई 2011 में आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी थी। रिट याचिका में मुख्य शिकायत यह है कि प्रतिवादी (राज्य सरकार) ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जांच रिपोर्ट को विधानसभा में पेश नहीं किया है, जो स्पष्ट निष्क्रियता को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू पर विशेष ध्यान देते हुए कहा- यह मामला 2008 की घटना से संबंधित है और जांच रिपोर्ट 2011 में ही सौंपी जा चुकी है, लेकिन अभी तक उस पर कोई उचित कार्रवाई नहीं हुई है। यह स्थिति न केवल न्याय में देरी को दर्शाती है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही के सवाल भी उठाती है। राज्य ने दिया सहयोग का आश्वासन
अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवमंगल शर्मा ने याचिका ट्रांसफर का विरोध करते हुए निर्देशों के आधार पर कहा- राज्य सरकार न केवल जनहित याचिका बल्कि संबंधित दूसरे मामले के निपटारे में भी हाईकोर्ट को पूर्ण सहयोग देगी। यह आश्वासन कोर्ट के रिकॉर्ड पर दर्ज किया गया है। याचिकाकर्ता ईश्वर प्रसाद ने भी कोर्ट को आश्वासन दिया कि चूंकि वे इस मामले को आगे बढ़ाने में रुचि रखते हैं, इसलिए वे हाईकोर्ट में रिट याचिकाओं के निपटारे में पूर्ण सहयोग करेंगे और उनकी ओर से स्थगन की कोई मांग नहीं होगी। हाईकोर्ट करे शीघ्र निपटारा
दोनों पक्षों के बयानों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ट्रांसफर याचिका को स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा- राजस्थान हाईकोर्ट इस मामले में आवश्यक कार्रवाई करेगा। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों के बयानों को रिकॉर्ड पर रखते समय मामले की मेरिट पर कोई विचार नहीं किया गया है। भगदड़ में गई थी 216 लोगों की जान
30 सितंबर 2008 को नवरात्रि के पहले दिन जोधपुर के ऐतिहासिक मेहरानगढ़ दुर्ग स्थित चामुंडा माता मंदिर में दर्शन के लिए उमड़ी भारी भीड़ में भगदड़ मच गई, जिसमें 216 लोगों की मौत हो गई थी। यह जोधपुर के इतिहास का सबसे बड़ा दुखद हादसा था। इस घटना की जांच के लिए तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार ने 2 अक्टूबर 2008 को न्यायमूर्ति जसराज चोपड़ा की अध्यक्षता में एक न्यायिक जांच आयोग का गठन किया, जिसे भगदड़ के कारणों और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपायों का पता लगाने का जिम्मा सौंपा गया। आयोग ने ढाई साल तक गहन जांच की। 222 पीड़ित परिवारों और 59 अधिकारियों के बयान दर्ज किए और 11 मई 2011 को तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार को 860 पृष्ठों की अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी, जिस पर करीब 5 करोड़ रुपए खर्च हुए। हालांकि, 17 साल बीत जाने के बाद भी यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है और न ही विधानसभा में पेश की गई है, जिससे मृतकों के परिजन आज तक न्याय और जवाबदेही की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
