श्री रावल मल्लीनाथ–श्री राणी रूपादे संस्थान, तिलवाड़ा की न्यासी मंडल और प्रबंधन समिति की महत्वपूर्ण बैठकें श्री राणी रूपादे मंदिर, पालिया परिसर में हुईं। संस्थान अध्यक्ष रावल किशन सिंह जसोल की अध्यक्षता में हुई इन बैठकों में आगामी श्री रावल मल्लीनाथ मंदिर और श्री चक्रेश्वरी माता मंदिर सहित अन्य मंदिरों के प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव की तैयारियों पर विस्तृत चर्चा हुई। महोत्सव को भव्य, दिव्य और जनभागीदारीपूर्ण स्वरूप देने पर विचार-विमर्श किया गया। 13 सितंबर को होगी सभी मंदिरों की प्राण-प्रतिष्ठा
बैठक में बताया गया कि मालाजाल परिसर में निर्माणाधीन श्री रावल मल्लीनाथ मंदिर और दक्षिणमुखी श्री हनुमानजी मंदिर का कार्य तेजी से चल रहा है। इसी तरह, पालिया परिसर में श्री नर्बदेश्वर महादेव मंदिर, श्री चक्रेश्वरी माता मंदिर और श्री जोगमाया मंदिर का निर्माण कार्य भी प्रगति पर है। इन सभी मंदिरों की प्राण-प्रतिष्ठा 13 सितंबर 2026 को संपन्न होगी। यह आयोजन संपूर्ण मालाणी क्षेत्र, राठौड़ वंश, सनातन धर्मावलंबी समाज और श्रद्धालुओं के लिए एक ऐतिहासिक धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक महोत्सव के रूप में आयोजित किया जाएगा। संस्थान अध्यक्ष रावल किशन सिंह जसोल ने इस अवसर पर कहा कि श्री रावल मल्लीनाथ मालाणी क्षेत्र के संस्थापक, धर्मरक्षक और लोकनायक थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में सनातन धर्म, संस्कृति और जनमानस की रक्षा के लिए विधर्मियों के खिलाफ पांच धर्मयुद्धों का नेतृत्व किया। रावल मल्लीनाथ ने मालाणी क्षेत्र में धर्म, न्याय, सुरक्षा और लोककल्याण की गौरवशाली परंपरा स्थापित की। उनके व्यक्तित्व में भक्ति, शक्ति, तप, त्याग, लोकसेवा और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत समन्वय था, जिसके कारण संपूर्ण मालाणी क्षेत्र उन्हें श्रद्धापूर्वक “मालाणी के महादेव” के रूप में स्मरण करता है। अध्यक्ष रावल किशन सिंह जसोल ने कहा कि मालाणी की पावन धरती भक्ति, शक्ति, संत परंपरा, शौर्य, लोकसंस्कृति, पर्यावरण चेतना एवं सनातन धर्म की साधना स्थली रही है। राजस्थान की मरू गंगा के रूप में पूजित लूणी नदी इस क्षेत्र की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं पर्यावरणीय चेतना की आधारशिला रही है। इसी मरू गंगा के तट पर श्री रावल मल्लीनाथ ने जनकल्याण, गौसंरक्षण, जल संरक्षण, प्रकृति संवर्धन एवं सामाजिक समरसता की परंपराओं को सुदृढ़ किया। मरू गंगा के इसी पावन तट पर सनातन धर्म की रक्षा के लिए विधर्मियों के विरुद्ध पांच विजयी धर्मयुद्ध लड़े गए तथा धर्म, संस्कृति एवं जनमानस की रक्षा का गौरवशाली इतिहास रचा गया। इसी भूमि पर अनेक वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान देकर सनातन धर्म एवं स्वाभिमान की रक्षा की। यह क्षेत्र शौर्य, त्याग, तपस्या एवं लोकमंगल की अमर गाथाओं का साक्षी रहा है। उन्होंने कहा कि मरू गंगा के तट पर संत परंपरा का भी अद्वितीय संगम देखने को मिलता है। लोकपरंपराओं के अनुसार श्री राणी रूपादे, उनके गुरु श्री उगमसी भाटी, गुरु भाई मेघधारुजी, लोकदेवता बाबा रामदेवजी महाराज, संत जैसलजी एवं उनकी राणी तोरल, मेवाड़ के महाराणा कुम्भा सहित अनेक संत, महापुरुष एवं धर्माचार्य इस क्षेत्र में पधारे थे। इन संत समागमों ने मालाणी क्षेत्र को आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता एवं सनातन संस्कृति के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित किया। आज भी यह भूमि भक्ति, शक्ति, संत परंपरा, पर्यावरण संरक्षण एवं सनातन धर्म की गौरवशाली विरासत का प्रतिनिधित्व करती है। मंदिर सनातन सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बनेगा
रावल किशन सिंह जसोल ने कहा कि निर्माणाधीन श्री रावल मल्लीनाथ मंदिर मालाणी के गौरवशाली इतिहास, संत परंपरा, वीरता, लोकआस्था, पर्यावरण संरक्षण एवं सनातन सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक बनेगा और आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति, धर्मरक्षा, लोककल्याण, समाजसेवा एवं प्रकृति संरक्षण की प्रेरणा प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि राठौड़ वंश का गौरवशाली इतिहास प्राचीन राष्ट्रकूट साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। राष्ट्रकूट शासकों ने भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन एवं कला के संरक्षण में अमूल्य योगदान दिया। विश्वविख्यात एलोरा स्थित कैलाश मंदिर राष्ट्रकूटों की स्थापत्य प्रतिभा, सांस्कृतिक वैभव एवं धार्मिक आस्था का अद्भुत उदाहरण है, जिसे विश्व की महान धरोहरों में स्थान प्राप्त है। राष्ट्रकूट परंपरा दक्षिण भारत के कर्नाटक क्षेत्र से कन्नौज तक पहुंची और बाद में राव सीहाजी के नेतृत्व में राठौड़ों का मारवाड़ में आगमन हुआ। राव आस्थानजी के समय राठौड़ शक्ति का विस्तार हुआ तथा खेड़ पर उनका आधिपत्य स्थापित हुआ, जिससे मालाणी एवं मारवाड़ क्षेत्र में उनकी गौरवशाली परंपरा और अधिक सुदृढ़ हुई। ‘मंदिरों, तीर्थों और धार्मिक संस्थानों को संरक्षण प्रदान किया’
उन्होंने कहा कि राष्ट्रकूट एवं राठौड़ शासकों का जैन धर्म से भी ऐतिहासिक संबंध रहा है। अनेक जैन मंदिरों, तीर्थों एवं धार्मिक संस्थानों को संरक्षण प्रदान किया गया, जिसके अभिलेख आज भी विभिन्न जैन मंदिरों में सुरक्षित हैं। अनेक धार्मिक स्थलों का संरक्षण भारतीय संस्कृति की समन्वयवादी परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। श्री रावल मल्लीनाथ की राजधानी क्षेत्र में स्थित श्री नाकोड़ा जैन तीर्थ राठौड़ वंश एवं जैन समाज के मध्य धार्मिक सहअस्तित्व, संरक्षण एवं सांस्कृतिक समन्वय का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इतिहासकारों, ख्यातों एवं लोकपरंपराओं के अनुसार राठौड़ों का मारवाड़ में आगमन कन्नौज से हुआ था। विभिन्न लोकश्रुतियों में वर्णित है कि सारस्वत ब्राह्मण लहोड़ा लुंब ऋषि द्वारा श्री चक्रेश्वरी माता की प्रतिमा एवं शक्ति परंपरा को कर्नाटक क्षेत्र से कन्नौज लाया गया था। बाद में राव धूहड़जी इस शक्ति परंपरा को मारवाड़ लेकर आए और नागणेच्या माता के रूप में स्थापित किया। कालांतर में यही शक्ति स्वरूप राठौड़ वंश तथा उससे उद्भूत विभिन्न शाखाओं एवं उपशाखाओं की आराध्य कुलदेवी श्री नागणेच्या माता के रूप में विख्यात हुआ। श्री नागणेच्या माता का मूल स्वरूप श्री चक्रेश्वरी माता है। इसी ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक परंपरा के सम्मान में श्री चक्रेश्वरी माता मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। उन्होंने संपूर्ण राठौड़ वंश, उसकी समस्त शाखाओं, समाजों एवं सर्व समाज से आह्वान किया कि वे अपनी गौरवशाली परंपरा, कुलसंस्कृति एवं आध्यात्मिक विरासत से जुड़े इस ऐतिहासिक पंच-मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव में सहभागी बनकर इसे भव्य एवं अविस्मरणीय स्वरूप प्रदान करें। बैठक के दौरान श्री नर्बदेश्वर महादेव मंदिर, जसोल के महंत गणेश पुरी महाराज एवं संस्थान के प्रबंधन उपाध्यक्ष हरिशचंद्र सिंह जसोल का विशेष स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। बैठक में जानकारी दी गई कि कर्नाटक राज्य के हासन जिले के मर्कुली ग्राम स्थित प्राचीन एवं पवित्र श्री चक्रेश्वरी माता मंदिर से पूज्य दिव्य ज्योत को मालाणी क्षेत्र तक लाने का संपूर्ण संकल्प, समन्वय एवं आयोजन हरिशचंद्र सिंह जसोल के निर्देशन में संपन्न हुआ। संत परंपरा के अनुरूप महंत गणेश पुरी महाराज ने दिव्य ज्योत के आध्यात्मिक संरक्षण एवं धार्मिक मर्यादाओं के निर्वहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जानकारी दी गई कि दिव्य ज्योत के जसोलधाम पहुंचने पर वैदिक मंत्रोच्चार, पूजन एवं स्वागत समारोह आयोजित किया गया तथा तत्पश्चात इसे श्री राणी रूपादे जी मंदिर, पालिया परिसर लाया गया, जहां वर्तमान में श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ स्थापित है। प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के अवसर पर इस पूज्य दिव्य ज्योत को विधिवत रूप से श्री चक्रेश्वरी माता मंदिर में स्थापित किया जाएगा। यह दिव्य ज्योत मंदिर की आध्यात्मिक परंपरा, शक्ति उपासना एवं सांस्कृतिक निरंतरता का विशेष प्रतीक बनेगी। कर्नाटक स्थित श्री चक्रेश्वरी माता मंदिर से मालाणी क्षेत्र तक दिव्य ज्योत लाने की इस ऐतिहासिक यात्रा में पंचदशनाम जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता, दिल्ली एनसीआर संत महामंडल के अध्यक्ष एवं श्री नर्बदेश्वर महादेव मंदिर, गाजियाबाद के पीठाधीश्वर महंत नारायण गिरी महाराज का विशेष मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त हुआ। प्रबंधन उपाध्यक्ष हरिशचंद्र सिंह जसोल ने कहा कि प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के पूर्व संपूर्ण मालाणी क्षेत्र, जैसलमेर एवं सोढ़ाण क्षेत्र के गांवों में व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया जाएगा। समाजबंधुओं एवं श्रद्धालुओं से व्यक्तिगत संपर्क स्थापित कर उन्हें इस ऐतिहासिक आयोजन में पुण्य लाभ लेने का आव्हान किया जाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसे अवसर युगों में एक बार आते हैं और यह हम सभी का सौभाग्य है कि हमें इस पुण्य कार्य में योगदान देने का अवसर प्राप्त हो रहा है। उन्होंने कहा कि प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव संपूर्ण राठौड़ वंश, मालाणी क्षेत्र एवं सनातन समाज की आस्था, एकता एवं सांस्कृतिक चेतना का महोत्सव होगा। यह आयोजन समाज को अपनी जड़ों, परंपराओं, इतिहास एवं आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने का कार्य करेगा। जनसंपर्क अभियान के माध्यम से प्रत्येक गांव, ढाणी एवं प्रवासी समाजबंधुओं तक पहुंचकर उन्हें इस महोत्सव से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। इस अवसर पर महंत गणेश पुरी महाराज ने अपने आशीर्वचन में कहा कि धर्म एवं संस्कृति के ऐसे आयोजन समाज को एकसूत्र में बांधते हैं। प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव सनातन परंपरा, संत संस्कृति, भक्ति, शक्ति एवं आध्यात्मिक चेतना के प्रेरणास्रोत बनेगा। मंदिर श्रद्धा, संस्कार, संस्कृति, सेवा, समरसता एवं सामाजिक जागरण के प्रमुख केंद्र होते हैं। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं एवं समाजबंधुओं से तन, मन एवं धन से सहयोग प्रदान कर इस ऐतिहासिक आयोजन को सफल बनाने का आह्वान किया। बाड़मेर के रावत त्रिभुवन सिंह ने कहा कि संपूर्ण मालाणी क्षेत्र में प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव को लेकर उत्साह एवं श्रद्धा का वातावरण है। समाज के प्रत्येक वर्ग में इस आयोजन के प्रति विशेष उत्सुकता दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि जनसंपर्क अभियान के माध्यम से अधिकाधिक लोगों को इस ऐतिहासिक आयोजन से जोड़ा जाएगा तथा बाड़मेर क्षेत्र में वे स्वयं भी सक्रिय रूप से सहभागिता निभाएंगे। कोटड़ा राणा नरेंद्र सिंह ने कहा कि निर्माणाधीन मंदिर धार्मिक आस्था, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना, पर्यावरण संरक्षण एवं सनातन मूल्यों के सशक्त केंद्र बनेंगे। उन्होंने कहा कि यह महोत्सव मंदिरों की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ-साथ समाज को अपनी गौरवशाली विरासत, संत परंपरा एवं सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा। उन्होंने संपूर्ण राठौड़ वंश एवं सर्व समाज से इस ऐतिहासिक आयोजन में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया। इस अवसर पर बैठक में जानकारी दी गई कि पंच-मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के इस पुण्य एवं ऐतिहासिक कार्य में समुंद्र सिंह नौसर, पृथ्वी सिंह कोलू, दिलीप सिंह बुड़ीवाड़ा तथा दिलीप सिंह खेलाना ने उल्लेखनीय योगदान एवं सहयोग प्रदान किया है। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि मंदिर निर्माण, धर्मकार्य, प्राण-प्रतिष्ठा आयोजन एवं संस्थान की विभिन्न गतिविधियों में सहयोग देने वाले सभी भामाशाहों, दानदाताओं एवं सहयोगकर्ताओं को संस्थान द्वारा प्रशस्ति-पत्र प्रेषित कर सम्मानित किया जाएगा, ताकि उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जा सके तथा समाज में सेवा, समर्पण एवं सहयोग की भावना को और अधिक प्रोत्साहन मिले। बैठक में उपस्थित सभी न्यासियों एवं प्रबंधन समिति सदस्यों ने विश्वास व्यक्त किया कि प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव मालाणी क्षेत्र के इतिहास में एक स्वर्णिम एवं अविस्मरणीय अध्याय के रूप में स्थापित होगा तथा समाज की आस्था, संस्कृति, एकता, गौरव, पर्यावरण संरक्षण, संत परंपरा एवं सनातन मूल्यों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का माध्यम बनेगा। ये महोत्सव आने वाली पीढ़ियों को धर्म, संस्कृति, इतिहास, पर्यावरण संरक्षण, लोकपरंपराओं एवं आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने वाला एक युगांतकारी आयोजन सिद्ध होगा।