केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है। इनमें राजस्थान की तीन हस्तियों प्रसिद्ध भपंग वादक गफरुद्दीन मेवाती जोगी (65), अलगोजा वादक तगा राम भील (62) और ब्रह्म देव महाराज को पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की गई है। वहीं जयपुर मूल के पीयूष पांडे को मरणोपरांत पद्म भूषण देने की घोषणा की गई है। केंद्र सरकार ने पीयूष पांडे को महाराष्ट्र के कला क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए यह सम्मान देने की घोषण की है। गफरुद्दीन मेवाती जोगी डीग जिले के रहने वाले हैं। 20 साल से अलवर में रह रहे हैं। गफरुद्दीन भपंग वादक और पांडुन का कड़ा के लोक गायक हैं। वे पांडुन का कड़ा के एकमात्र कलाकार हैं। गफरुद्दीन को 2024 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप सम्मान मिल चुका है। उन्होंने देश-विदेश में कई जगह भपंग वादन और पांडुन का कड़ा की प्रस्तुतियां दी हैं। उन्हें पांडुन का कड़ा के 2500 से ज्यादा दोहे याद हैं। पिता से विरासत में मिली संगीत की शिक्षा
गफरुद्दीन का जन्म डीग के कैथवाड़ा गांव में मेवाती जोगी परिवार में हुआ है। उन्हें संगीत की शिक्षा विरासत में मिली। गफरुद्दीन मेवाती जोगी के पिता बुद्ध सिंह जोगी सारंगी के उस्ताद थे। गफरुद्दीन मेवाती जोगी रामायण, महाभारत, भगवान श्रीकृष्ण और हिंदू देवताओं की पौराणिक कहानियां अलग शैली में गाकर सुनाते हैं। 4 साल की उम्र से भपंग बजा रहे
गफरुद्दीन ने बताया- मेरे परिवार में पिछली आठ पीढ़ियों से सारंगी और भपंग वादन की परंपरा चली आ रही है, जिसे मैंने बचपन से ही अपना लिया। आज भी कला का जादू बरकरार है। भपंग की धुन के साथ लोग भाव-विभोर हो जाते हैं। माहौल उत्साह से भर उठता है। मैंने चार साल की उम्र में भपंग वादन सीख लिया था। सात साल की उम्र में पिता से पांडुन का कड़ा सीखना शुरू किया। पिता लगभग 20 मेवाती लोक वाद्यों का ज्ञान रखते थे। मैं भपंग की धुन के साथ पांडुन का कड़ा प्रस्तुत करता हूं। महाभारत की कथाओं को सुरों में पिरोता हूं। गफरुद्दीन को वर्ष 2016 में राज्य स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसके बाद 2024 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाजा गया। तगा राम पिता से छुपकर करते थे अलगोजा की प्रैक्टिस
जैसलमेर के मूलसागर गांव के रहने वाले तगा राम मशहूर अलगोजा वादक हैं। तगाराम भील ने अपनी अलगोजा वादन की शैली से यूरोप के देशों, रूस, अमेरिका और जापान तक कला प्रेमियों को प्रभावित किया है। अलगोजा के साथ मटका और बांसुरी बजाने में भी उन्हें महारत हासिल है। वे बचपन में पिता का अलगोजा बजाया करते थे। तगाराम ने बताया- पिता घर में नहीं होते तो चुपके से अलगोजा निकाल कर प्रैक्टिस करता था। महज 10 साल की उम्र में इसमें महारत हासिल कर ली थी। 11 साल की उम्र में अपना पहला अलगोजा खरीदा और फिर अपने सफर की शुरुआत की। 1981 में जैसलमेर के मरु महोत्सव शुरू हुआ मंच प्रदर्शन का सफर 1996 में फ्रांस तक पहुंचा। इसके बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मरु महोत्सव की शान
तगा राम की किस्मत ने तब करवट बदली, जब साल 1981 में 18 की उम्र में उन्हें जैसलमेर में पहली बार मंच पर प्रदर्शन करने का मौका मिला। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1981 से लेकर आज तक वे हर साल राजस्थान के प्रसिद्ध ‘मरु महोत्सव’ की शान बने हुए हैं। आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) जैसलमेर के लिए कई रिकॉर्डिंग की। नेहरू युवा केंद्र संस्थान (NYKS) ने उन्हें सम्मानित मंच प्रदान किया। 1996 में उन्होंने फ्रांस का अपना पहला दौरा किया। इसके बाद वे यूरोप, रूस, अमेरिका, जापान, सिंगापुर और अफ्रीका सहित 15 से अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं। सांसों का खेल है अलगोजा
अलगोजा बजाना पूरी तरह से ‘सांसों का खेल’ है। इसमें ‘सस्टेन्ड ब्रीदिंग’ की जरूरत होती है। जहां कलाकार को नाक से सांस लेनी होती है। बिना रुके मुंह से हवा बाहर निकालनी होती है ताकि धुन टूटे नहीं। श्री जगदंबा अंधविद्यालय के संस्थापक हैं स्वामी ब्रह्मदेव महाराज
समाज सेवी स्वामी ब्रह्मदेव महाराज श्री जगदंबा अंधविद्यालय के संस्थापक हैं। श्रीगंगानगर में 13 दिसंबर 1980 को श्री जगदंबा अंधविद्यालय की स्थापना की। यहां नेत्रहीन (अंध) बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। इन बच्चों के लिए यहां पर हॉस्टल भी है। संस्थान में मूक-बधिर बच्चों के लिए भी विद्यालय संचालित होता है। स्वामी ब्रह्मदेव महाराज ने श्री जगदंबा धर्मार्थ नेत्र चिकित्सालय की स्थापना की है। संस्थान की ओर से 25 साल से मुफ्त नेत्र जांच शिविर लगाकर उपचार किया जा रहा है। स्वामी ब्रह्मदेव महाराज के गुरु संत बाबा करनैल दास जी महाराज विवेक आश्रम जलाल, पंजाब के थे। अर्जुन राम मेघवाल, सतीश पूनिया, निहाल चंद समेत कई राजनेता उनके दर्शन कर चुके हैं। जयपुर मूल के पीयूष पांडे को मरणोपरांत पद्म ​भूषण
जयपुर मूल के पीयूष पांडे को महाराष्ट्र के कला क्षेत्र में योगदान के लिए मरणोपरांत पद्म ​भूषण देने की घोषणा की गई है। पीयूष पांडे ने विज्ञापन क्रिएटिविटी से लेकर एड फिल्मों तक अपने अंदाज का लोहा मनवाया था। उनका लिखा मिले सुर मेरा तुम्हारा गाना खूब चर्चित हुआ था। अबकी बार मोदी सरकार और अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे उन्हीं की देन है। पीयूष पांडे के तैयार विज्ञापनों में राजस्थानी कल्चर और राजस्थानी भाषा का पुट था। चर्चित ब्रांड्स के विज्ञापनों में राजस्थानी पंच लाइन उन्हीं की देन है।

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