भास्कर न्यूज | लुधियाना सरहिंद नहर की कंक्रीट लाइनिंग के दौरान हुए बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय नुकसान पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने पंजाब के सरकारी अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। जंगली क्षेत्र में अवैध निर्माण और पेड़ों की कटाई मामले में ट्रिब्यूनल ने सिंचाई विभाग और वन विभाग दोनों के दोषी अधिकारियों व ठेकेदारों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं। यह मामला पब्लिक एक्शन कमेटी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। कमेटी सदस्यों इंजीनियर कपिल अरोड़ा और डॉ. अमनदीप सिंह बैस ने बताया कि दिसंबर 2024 में नहर लाइनिंग का काम शुरू हुआ था। स्थानीय लोगों द्वारा जंगलों को नुकसान पहुंचाने की शिकायत के बाद कमेटी टीम ने स्थल का निरीक्षण किया। जांच में सामने आया कि रूपनगर डिवीजन के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने ठेकेदारों को बिना वन विभाग की अनिवार्य एनओसी के पेड़ काटने और जंगल क्षेत्र में अवैध तरीक़े से बैचिंग प्लांट लगाने की अनुमति दी थी। अवैध माइनिंग के कारण पेड़ों की जड़ें तक उजड़ गईं और श्रेणी-1 के दो दुर्लभ सांपों के मारे जाने की पुष्टि हुई। इसके बाद कमेटी ने मामला वन विभाग को सौंपा और याचिका दायर की। कुलदीप सिंह खैहरा और कर्नल गिल ने बताया कि एनजीटी द्वारा नियुक्त संयुक्त समिति ने कमेटी के सभी आरोपों को सही पाया। वन विभाग ने ट्रिब्यूनल को अवैध रूप से काटे गए पेड़ों की विस्तृत सूची सौंपी और कहा कि उन पेड़ों की लकड़ी तक गायब है। दोराहा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज होने के बावजूद पुलिस कार्रवाई शून्य रही। जसकीरत सिंह, गुरप्रीत सिंह और मोहित सग्गड़ ने बताया कि वन विभाग ने सिंचाई विभाग पर 40 लाख रुपए से अधिक का पर्यावरण मुआवजा लगाया है, जिसमें से 11.19 लाख रुपए जमा भी हो चुके हैं। कमेटी का तर्क था कि यह राशि सार्वजनिक धन है और अधिकारियों की लापरवाही का बोझ जनता पर नहीं डाला जा सकता। पैरा 20/21: संयुक्त समिति की रिपोर्ट के अनुसार, बैचिंग प्लांट वन विभाग से एनओसी और पीपीसीबी से सीटीओ लिए बिना लगाया गया, जो इंडियन फॉरेस्ट एक्ट 1927 का स्पष्ट उल्लंघन है। ट्रिब्यूनल ने वन विभाग को निर्देश दिया कि धारा 29, 30, 32 और 33 के तहत कार्रवाई तेज की जाए और चार महीने में रिपोर्ट पेश की जाए। पैरा 22: नहर निर्माण के दौरान ठेकेदार द्वारा नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होने पर जल संसाधन व वन विभाग दोनों को दोषी ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश। पैरा 23: ट्रिब्यूनल ने पाया कि विभागीय अधिकारी भी लापरवाह रहे और उनमें मिलीभगत की संभावना है। इसलिए पानी संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव को तीन महीने के भीतर दोषी अधिकारियों की पहचान कर कानूनी कार्रवाई की रिपोर्ट देने को कहा गया है। कमेटी सदस्यों के अनुसार यह निर्णय ऐतिहासिक है, क्योंकि यह पहली बार है जब पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में शामिल सरकारी अधिकारियों पर सीधे दंडात्मक कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं। यह हर उस अधिकारी के लिए सबक है जो विकास के नाम पर प्रकृति से समझौता करता है।
