भिवाड़ी (खैरथल) के फेज थर्ड इलाके में जिंदगी किसी घड़ी की सुई की तरह तयशुदा रफ्तार से चलती थी। सुबह होते ही मजदूर फैक्ट्रियों की ओर निकल जाते। महिलाएं घरों के काम में लग जातीं। बच्चे स्कूल की तरफ दौड़ पड़ते। दोपहर में गांव जैसे थम-सा जाता और शाम ढलते ही चौपाल फिर से आबाद हो जाती। जाहिद भी इसी गांव का हिस्सा था। उम्र करीब 30 साल, पेशे से ट्रैक्टर ड्राइवर। सुबह खेतों में काम। कभी फैक्ट्री के लिए माल ढोना तो कभी किसी किसान की मदद। उसकी पहचान एक शांत आदमी की थी। वह ज्यादा बोलता नहीं था। किसी की पंचायत में नहीं पड़ता, न ही किसी विवाद में नाम आता। घर की जिम्मेदारियां उसके कंधों पर थीं। वही उसकी दुनिया थी। उस दिन भी सब कुछ बिल्कुल सामान्य था। जाहिद काम से लौटकर घर आया। खाना खाया और शाम होने से पहले किसी काम से गांव की बाहरी सड़क की ओर निकल पड़ा। वह सड़क गांव को इंडस्ट्रियल एरिया से जोड़ती थी। रात होते ही वहां आवाजाही बेहद कम हो जाती थी। आसपास झाड़ियां थीं। स्ट्रीट लाइट भी कुछ दूरी पर थी, जिसकी रोशनी अंधेरे से लड़ते-लड़ते हार जाती थी। शाम ढल चुकी थी। आसमान में हल्की-सी लालिमा बाकी थी और गांव धीरे-धीरे रात की चादर ओढ़ रहा था। उसी वक्त गांव की उस बाहरी सड़क पर एक तेज आवाज गूंजी। आवाज ऐसी थी कि कुछ लोगों को लगा जैसे पटाखा फूटा हो। पल भर के लिए सबने अनसुना कर दिया, लेकिन अगले ही क्षण एक दर्दनाक चीख सुनाई दी। वह चीख किसी आम आवाज जैसी नहीं थी। वह डर, दर्द और मौत के बीच की आवाज थी। गांव के कुछ लोग चौपाल से उठे और आवाज की दिशा में दौड़ पड़े। जब वे वहां पहुंचे तो उनकी आंखों के सामने जो मंजर था, उसने सबको जड़ (स्तब्ध) कर दिया। सड़क किनारे जाहिद जमीन पर पड़ा था। उसकी छाती से खून बह रहा था। किसी ने उसका नाम लेकर पुकारा, किसी ने कंधा हिलाया, लेकिन कोई हरकत नहीं हुई। कुछ ही पलों में यह साफ हो गया कि जाहिद अब इस दुनिया में नहीं था। गांव में अफरा-तफरी मच गई। महिलाएं चीखने लगीं, लोग एक-दूसरे से सवाल पूछने लगे। कोई समझ नहीं पा रहा था कि यह सब कैसे हुआ। आसपास नजर दौड़ाई गई, लेकिन वहां कोई नहीं था। न कोई हथियार दिखाई दिया, न कोई संदिग्ध व्यक्ति। बस सड़क, अंधेरा और एक लाश। कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने तेज आवाज सुनी थी, लेकिन किसी ने किसी को भागते हुए नहीं देखा। अंधेरा इतना घना था कि पहचान करना नामुमकिन था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पल भर में वार किया और फिर अंधेरे में गुम हो गया। जब जाहिद की मौत की खबर उसके घर पहुंची, तो वहां कोहराम मच गया। मां बदहवास होकर जमीन पर गिर पड़ी। परिवार के लोग रोते-चिल्लाते रहे। बार-बार एक ही सवाल उठता रहा- जाहिद ने किसी का क्या बिगाड़ा था? उसका कसूर क्या था? कुछ ही देर में पुलिस मौके पर पहुंची। इलाके को घेर लिया गया। शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया। गांव वालों से पूछताछ शुरू हुई। हर कोई डरा हुआ था। कोई खुलकर बोलने से बच रहा था, तो कोई सच में कुछ नहीं जानता था। पुलिस ने गांव में जाहिद की जिंदगी को खंगालना शुरू किया। पूछा गया- क्या किसी से दुश्मनी थी? क्या कोई पुराना विवाद था? लेकिन हर सवाल का जवाब एक ही था- नहीं। गांव में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। कोई कहता यह लूट का मामला हो सकता है तो कोई किसी पुराने झगड़े की बात करता। लेकिन न जाहिद से कुछ लूटा गया था, न कोई पुख्ता सुराग मिला। दिन बीतते गए, लेकिन जवाब नहीं मिला। गांव का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। सूरज ढलते ही लोग घरों में कैद हो जाते। बच्चों को बाहर खेलने से रोक दिया गया। चौपाल की रौनक खत्म हो गई। हर अजनबी शक के घेरे में था। क्योंकि सबको पता था- हत्यारा कोई बाहर से आया हुआ नहीं भी हो सकता था। वह यहीं, इसी गांव में कहीं मौजूद था। जाहिद की हत्या अब सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि गांव के लिए एक डर बन चुकी थी। केस दर्ज था, जांच चल रही थी, लेकिन सवाल जस के तस थे। गांव उस रात को भूल नहीं पा रहा था। हर अंधेरी गली, हर सुनसान सड़क पर वही सवाल गूंजता रहता- जाहिद को किसने मारा? कल राजस्थान क्राइम फाइल्स पार्ट-2 में पढ़िए आगे की कहानी…
