बयाना–भुसावर मार्ग पर स्थित बारोली ग्राम पंचायत का काफी बड़ा हिस्सा कभी महान साहित्यकार डॉ. रांगेय राघव जी के पूर्वजों की जागीर हुआ करता था। मुर्दों का टीला, कब तक पुकारूं और लोई का ताना जैसी कालजयी कृतियों के लेखक रांगेय राघव के पुरखों को करीब 300 वर्ष पूर्व जयपुर महाराजा दक्षिण आरकाट से वैर लाए थे। वे रामानुजाचार्य परंपरा के तैलीय ब्राह्मण थे। बाद में भरतपुर संस्थापक महाराजा सूरजमल के भाई राजा प्रतापसिंह उन्हें वैर ले आए और वैर के निकट उन्हें बारोली की जागीर दी तथा वैर में सीताराम का मंदिर स्थापित करवाया। डॉ. रांगेय राघव को मंदिर और जागीर रास नहीं आए। उन्होंने अपनी आजीविका का आधार लेखन को बनाया। यद्यपि अब रांगेय राघव के परिवार का इस गांव से कोई रिश्ता नहीं है, लेकिन गांव के लोग अभी भी उनसे जुड़ाव रखते हैं और उनकी चर्चा करते हैं। जिला परिषद के सदस्य देशराज सिंह कहते हैं कि बचपन से साहित्यकार रांगेय राघव जी का जिक्र सुनते आ रहे हैं। गांव में रियासतकालीन हनुमान जी का मंदिर है। रांगेय राघव जी यहां आते थे। इसके अलावा यहां चामुंडा माता का भी मंदिर है, जिसकी दूर-दूर तक मान्यता है। वैर के सीताराम मंदिर के लिए बारोली जागीर की कुछ राशि कभी राग-भोग के लिए जाती थी। साहित्यकार रांगेय राघव ने अधिकांश साहित्य रचना इसी मंदिर में रहकर की। गांव का काफी इलाका बागवानी के लिए जाना जाता है। समस्या: न पानी पहुंचा, न सड़क दुरुस्त हुई बारोली गांव में जल जीवन मिशन सुविधा के बजाय दिक्कतों का कारण बन गया है। टंकी बन गई है और पाइपलाइन के लिए सड़क खोदी गई, लेकिन उनकी मरम्मत नहीं हुई। जिला परिषद सदस्य देशराज सिंह ने बताया कि पाइपलाइन कुछ जगह डैमेज है और पानी रिसता है। गांव में पानी नहीं पहुंचा है। मोड़ से बारोली तक की सड़क टूटी हुई है। एक किलोमीटर के इस रास्ते में गर्द उड़ती रहती है। बिजली कटौती की समस्या है। जीएसएस के लिए जमीन चिन्हित हो गई है, प्रस्ताव भी जा चुका है। गांव का लेखा-जोखा जनसंख्या : 6000साक्षरता : 70 प्रतिशतजिला मुख्यालय से दूरी : 60 किमीआवागमन : बस व निजी वाहनशिक्षा : सीनियर सेकेंडरी स्कूल साहित्यकार रांगेय राघव की जयंती कल महान साहित्यकार डॉ. रांगेय राघव की जयंती 17 जनवरी को मनाई जाएगी। सन 1923 में आगरा में जन्मे रांगेय राघव का बचपन वैर में बीता। उनका मूल नाम तिरूमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य था। उन्होंने 13 वर्ष की आयु में लिखना शुरू किया था और 18 वर्ष की उम्र में घरौंदा उपन्यास लिखा। वे एक दिन में दो कृतियों का लेखन करने की क्षमता रखते थे। उन्होंने उपन्यास, कहानी, जीवनी, नाटक, कविता, रिपोर्टाज, अनुवाद सहित 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं। बंगाल के अकाल पर आधारित तूफानों के बीच को हिंदी की पहली रिपोर्टाज पुस्तक माना जाता है। 12 सितंबर 1962 को उनका निधन हो गया। उन्होंने विषाद मठ, उबाल, राह न रुकी, बारी बरना खोल दो, देवकी का बेटा, रत्ना की बात, भारती का सपूत, यशोधरा जीत गई, घरौंदा, लोई का ताना, लखिमा की आंखें, मेरी भव बाधा हरो, कब तक पुकारूं, पक्षी और आकाश, चीवर, राई और पर्वत, आखिरी आवाज, बंदूक और बीन, पंच परमेश्वर, अवसाद का छल, गूंगे, प्रवासी, घिसटता कंबल, पेड़, नारी का विक्षोभ, काई, समुद्र के फेन, देवदासी, कठपुतले, तबेले का धुंधलका, जाति और पेशा, नई जिंदगी के लिए, ऊंट की करवट, बांबी और मंतर, गदल, कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेक्नीक्स, जानवर-देवता, भय, अधूरी मूरत आदि पुस्तकें लिखीं।
