शहर में टीनएज तक के बच्चों में पेट दर्द, उल्टियां, घबराहट और बेहोशी जैसी शिकायतें तेजी से बढ़ रही हैं। चिंताजनक बात यह है कि अधिकतर मामलों में पैरेंट्स बच्चों को पहले पेट के डॉक्टरों के पास ले जाते हैं, जहां एंडोस्कोपी तक करवाई जाती है, लेकिन रिपोर्ट्स नॉर्मल आती हैं। इसके बाद जब महीनों तक कोई राहत नहीं मिलती, तब जाकर मानसिक कारणों की तरफ ध्यान जाता है। मनोचिकित्सकों के अनुसार यह साइकोसोमैटिक समस्या है, जिसमें एंग्जायटी, डर, स्कूल का दबाव और पारिवारिक तनाव शरीर के जरिए बीमारी की तरह सामने आता है। ऐसे मामलों में दवा से ज्यादा जरूरी काउंसलिंग, भावनात्मक सपोर्ट और माहौल में बदलाव होता है। डॉक्टरों का कहना है कि हर महीने औसतन 30 से ज्यादा बच्चे ऐसे पहुंच रहे हैं, जिनकी तकलीफ पेट की नहीं, बल्कि मन की होती है। केस 1: स्कूल बदलने का डर बना बीमारी : एक लड़की का स्कूल बदला गया, लेकिन वह नए माहौल में खुद को एडजस्ट नहीं कर पाई। न दोस्त बन पाए, न क्लास में घुल-मिल सकी। जो बच्ची पहले हमेशा फर्स्ट आती थी, उसकी परफॉर्मेंस अचानक गिरने लगी। अटेंडेंस कम हो गई और पेट दर्द की शिकायत शुरू हो गई। यह स्थिति करीब आठ से दस महीने तक बनी रही। पैरेंट्स ने हर तरह की मेडिकल जांच करवाई, सभी रिपोर्ट्स नॉर्मल आईं। आखिरकार काउंसलिंग शुरू हुई और एक महीने में बच्ची की हालत सुधरी। केस 2: टीचर की डांट से टूटा आत्मविश्वास : 13 साल के बच्चे को स्कूल में टीचर की डांट इतनी गहरी लगी कि उसके बाद उसे रोज घबराहट और उल्टियां होने लगीं। पेट दर्द लगातार बढ़ता गया और वजन तेजी से घटने लगा। पैरेंट्स ने एंडोस्कोपी तक करवाई, लेकिन कोई शारीरिक कारण सामने नहीं आया। बाद में यह साइकोलॉजिकल वोमिटिंग का केस निकला, जिसकी वजह एंग्जायटी थी। काउंसलिंग और भरोसे के माहौल से बच्चे में धीरे-धीरे सुधार आने लगा। केस 3 : बुली का असर, पेट बना दर्द की वजह : नौवीं क्लास का एक लड़का स्कूल में बुली का शिकार हुआ। डर और तनाव उसने किसी को बताया नहीं, लेकिन पेट दर्द के जरिए परेशानी सामने आने लगी। पैरेंट्स ने हर तरह का इलाज करवाया, लेकिन आराम नहीं मिला। बाद में पता चला कि बच्चा लंबे समय से मानसिक दबाव में था और वही उसकी बीमारी की वजह बन गया। केस 4 : घर का क्लेश, बच्चे की बेहोशी : एक बच्चे के परिवार में लगातार क्लेश था। उसका असर बच्चे पर इस कदर पड़ा कि वह स्कूल में बेहोश होने लगा। पैरेंट्स घबरा गए और एमआरआई समेत कई महंगी जांचें करवाईं। पचास हजार रुपये खर्च हो गए, लेकिन रिपोर्ट्स नॉर्मल रहीं। आखिरकार डॉक्टर की सलाह पर काउंसलिंग शुरू हुई, तब पता चला व उसकी हालत में सुधार आया।
