राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने जैसलमेर यूआईटी के एक रोड बनाने के टेंडर में अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट (बयाना राशि) निर्धारित तरीके से जमा न करने पर बोली रद्द किए जाने को चुनौती देने वाली स्पेशल अपीलें खारिज कर दी हैं। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने यह रिपोर्टेबल फैसला सुनाते हुए कहा कि टेंडर की अनिवार्य शर्त का उल्लंघन करने के बाद बोली रद्द करना न तो मनमाना है, न ही गैरकानूनी। कोर्ट ने अपने इस अंतिम फैसले में स्पष्ट किया है कि टेंडर प्रक्रिया में बयाना राशि निर्धारित तरीके से जमा नहीं करना एक गंभीर खामी है, जिसे बाद में सुधारा नहीं जा सकता। जैसलमेर में सड़क निर्माण के टेंडर से जुड़ा है मामला जैसलमेर के अमर सागर स्थित नया बास निवासी नखतसिंह भाटी की फर्म मैसर्स भाटी कंस्ट्रक्शन ने नगर विकास न्यास (यूआईटी) जैसलमेर के एक टेंडर में हिस्सा लिया था। यह निविदा 22 जुलाई 2025 को अंबेडकर चौक से जीएसएस जोधपुर रोड के नवीनीकरण और सुदृढ़ीकरण कार्य के लिए जारी की गई थी। फर्म ने ईएमडी को डिमांड ड्राफ्ट के बजाय फिक्स्ड डिपॉजिट रिसिप्ट (एफडीआर) के रूप में यूआईटी के पक्ष में ‘लियन-मार्क’ (ग्रहणाधिकार) करवाकर जमा किया था। तकनीकी बोली खुलने से पहले 23 अगस्त 2025 को फर्म ने समान राशि का डिमांड ड्राफ्ट भी जमा करवा दिया था, लेकिन यूआईटी ने अनिवार्य शर्त के उल्लंघन पर उनकी बोली खारिज कर दी। इसके खिलाफ अपीलकर्ता ने उसी दिन एक प्रतिवेदन दिया, जिसे 2 सितंबर को खारिज कर दिया गया। फर्म ने एकलपीठ के समक्ष रिट याचिकाएं दायर की थीं, जिन्हें 24 सितंबर 2025 को खारिज कर दिया गया। इसी फैसले को खंडपीठ में दो विशेष अपीलों के जरिए चुनौती दी गई थी। अपीलकर्ता फर्म का तर्क: ईएमडी माध्यम की अस्पष्टता अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एफडीआर से फर्म की वित्तीय सुरक्षा पूरी तरह सुरक्षित थी। वकील ने तर्क दिया कि बोली दस्तावेजों और निविदा के बीच ईएमडी के माध्यम को लेकर भारी अस्पष्टता थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अपीलकर्ता की वैध अपेक्षा थी कि तकनीकी मूल्यांकन से पहले इस सुधार योग्य खामी को दूर कर लेने पर उसे सीधे अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। वकील ने तर्क दिया कि अधिकारियों के इस कदम का उद्देश्य सबसे कम वित्तीय बोली लगाने वाले को बाहर करना था। वकील ने तर्क दिया कि 15 जुलाई 2025 के वित्त विभाग के सर्कुलर का उल्लंघन करने वाले अन्य ठेकेदारों को अनुमति दी गई, जो नियम का उल्लंघन है। यूआईटी का पक्ष: अर्नेस्ट मनी का माध्यम तय है यूआईटी और राज्य सरकार की ओर से वकीलों ने तर्क दिया कि राजस्थान पारदर्शी सार्वजनिक खरीद नियम के तहत ईएमडी का निर्धारित माध्यम में होना जरूरी है। बोली जमा होने के बाद इसमें बदलाव कानूनन मान्य नहीं है और इससे प्रक्रिया की पवित्रता भंग होती है। वकीलों ने कोर्ट को बताया कि 17 सितंबर 2025 को लेटर ऑफ एक्सेप्टेंस और 18 सितंबर को वर्क ऑर्डर जारी होने के बाद काम प्रगति पर है। कोर्ट: तय तरीका कोई सामान्य तकनीकी खामी नहीं कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में पाया कि ईएमडी का तय तरीका कोई सामान्य तकनीकी खामी नहीं, बल्कि वित्तीय गंभीरता सुनिश्चित करने वाली पात्रता ढांचे की एक अनिवार्य शर्त है। कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा – “यह न्यायालय पाता है कि अनिवार्य निविदा शर्त के निविदा जमा करने के बाद सुधार की अनुमति देने से बोलीदाताओं के बीच समान अवसर बदलने जैसा होगा और सार्वजनिक खरीद में निश्चितता और अनुशासन कमजोर होगा।” सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता द्वारा पेश किए गए ‘पोद्दार स्टील’ और ‘बी.एस.एन. जोशी’ मामलों में राहत केवल उन शर्तों में दी गई थी जो प्रकृति में सहायक थीं, जबकि यहां ऐसा नहीं है। कोर्ट ने यह भी पाया कि अपीलकर्ता भेदभाव के आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री पेश नहीं कर सका। ‘सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड’ और ‘विदर्भ इरिगेशन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन’ मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है और जब सार्वजनिक परियोजनाएं काफी आगे बढ़ चुकी हों तो अदालतों को संयम बरतना चाहिए। इन सभी आधारों पर कोर्ट ने दोनों विशेष अपीलें खारिज कर दीं।
