सरकारी सिस्टम की लेट-लतीफी के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में की गई सरकार की बजट घोषणाएं अब तक धरातल पर नहीं उतर पाई हैं। राज्य सरकार ने 2024-25 की बजट घोषणा में बज्जू सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को उप जिला अस्पताल में क्रमोन्नत किया था। नया भवन नहीं बनने के कारण यह अस्पताल दो साल से सीएचसी में ही चल रहा है। नियमानुसार ट्रॉमा सेंटर भी है, लेकिन उसके लिए जरूरी स्टाफ ही नहीं है। बज्जू उप जिला अस्पताल के लिए 44 करोड़ का बजट मंजूर हुआ था। इसके लिए 20 बीघा जमीन मांगी गई थी, लेकिन आईजीएनपी से जमीन आवंटन में ही दो साल लग गए। नए भवन निर्माण के लिए हाल ही में टेंडर हुए हैं, जबकि लूणकरणसर में उप जिला अस्पताल का शिलान्यास सीएम के हाथों हो चुका है। इसकी घोषणा पिछले बजट में की गई थी। उप जिला अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर के निर्माण के लिए 44 करोड़ का बजट स्वीकृत है। निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। इसके अलावा धीरेंरा, करणीसर राजासर भाटियान, श्रीरामसर और स्वरूपदेसर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए नया भवन एक साल बीत जाने पर भी नहीं बना। यह चारों पीएचसी सब सेंटर पर ही चल रही हैं। प्रत्येक पीएचसी भवन के लिए 1.45 करोड़ का बजट स्वीकृत है। इनका निर्माण नाबार्ड के तहत होगा। टेंडर हो चुके हैं। मुक्ता प्रसाद और गंगाशहर सीएचसी में प्रसव की सुविधा शुरू होगी पिछले साल बजट घोषणा में मंजूर हुई मुक्ता प्रसाद और गंगाशहर सीएचसी शुरू हो गई हैं। दोनों में ही एनएचएम के तहत नर्सिंग स्टाफ लगाया गया है, लेकिन डॉक्टर नहीं हैं। दोनों में ही प्रसव की सुविधा शुरू करने के लिए आगामी बजट में गायनाकोलॉजिस्ट और पीडिया डॉक्टर लगाने के लिए प्रस्ताव सरकार को भेजा गया है। इसके साथ ही अणचाबाई अस्पताल को सीएचसी में अपग्रेड और गंगाशहर सीएचसी में ट्रॉमा सेंटर के प्रस्ताव भी भेजे गए हैं। ट्रॉमा दिया, पर डॉक्टर नहीं सरकार ने सड़क हादसों को देखते हुए सभी उप जिला अस्पतालों में ट्रॉमा सेंटर अनिवार्य कर दिए हैं, लेकिन ट्रॉमा सेंटर के लिए जरूरी स्टाफ दिया ही नहीं गया। एक ट्रॉमा सेंटर में जनरल सर्जरी, ऑर्थो, एनेस्थीसिया के डॉक्टर सहित ऑपरेशन थिएटर होना जरूरी है। जिले में नोखा जिला अस्पताल सहित कोलायत, बज्जू, पूगल, खाजूवाला, लूणकरणसर और श्रीडूंगरगढ़ के उप जिला अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर में स्टाफ की समस्या सबसे बड़ी है। गंभीर घायलों को पीबीएम हॉस्पिटल ही लाना पड़ता है। कई बार घायल रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।